CNG बिक्री विवाद में सुप्रीम कोर्ट का फैसला, BPCL-HPCL की बढ़ी मुश्किलें

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सीएनजी बिक्री से जुड़े एक महत्वपूर्ण पुराने सेवा कर विवाद में भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (HPCL) के खिलाफ फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि महानगर गैस लिमिटेड (MGL) की सीएनजी को अपने पेट्रोल पंपों के माध्यम से बेचने के बदले तेल कंपनियों को मिलने वाली कमीशन राशि को केवल सामान्य खरीद-बिक्री से होने वाली आय नहीं माना जा सकता। अदालत के अनुसार, इस व्यवस्था में BPCL और HPCL ने MGL की ओर से सीएनजी की बिक्री को सुविधाजनक बनाने वाली सेवा प्रदान की और इसके बदले कमीशन प्राप्त किया। इसलिए उस समय लागू सेवा कर कानून के तहत इस कमीशन पर सर्विस टैक्स देय होगा।

यह विवाद उस अवधि से जुड़ा है, जब देश में वस्तु एवं सेवा कर यानी GST लागू नहीं हुआ था और विभिन्न सेवाओं पर अलग-अलग सेवा कर लगाया जाता था। मामले में सेवा कर विभाग ने BPCL और HPCL से सीएनजी बिक्री से प्राप्त कमीशन पर सर्विस टैक्स की मांग की थी। हालांकि, CESTAT की मुंबई पीठ ने वर्ष 2014 में तेल कंपनियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए माना था कि यह मामला सेवा प्रदान करने का नहीं, बल्कि सीएनजी की खरीद और बिक्री से संबंधित है। इसके बाद सेवा कर विभाग ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

सुप्रीम कोर्ट ने अब CESTAT के पुराने फैसले को रद्द कर दिया है। रिपोर्टों के अनुसार, अदालत के फैसले के बाद BPCL और HPCL के खिलाफ 16 करोड़ रुपये से अधिक की सेवा कर मांग फिर से प्रभावी हो गई है। इसके अलावा, लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार ब्याज और अन्य वैधानिक देनदारियों का भी सवाल उठ सकता है। हालांकि, अंतिम भुगतान और कर निर्धारण की प्रक्रिया संबंधित विभागीय कार्यवाही और कानूनी आदेशों के आधार पर तय होगी।

मामले की पृष्ठभूमि में MGL और तेल कंपनियों के बीच हुए समझौते शामिल हैं। इस व्यवस्था के तहत BPCL और HPCL के पेट्रोल पंपों पर MGL की सीएनजी ग्राहकों को बेची जाती थी। बिक्री के आधार पर तेल कंपनियों को एक निश्चित रकम या कमीशन मिलता था। BPCL और HPCL का तर्क था कि वे MGL से सीएनजी खरीदकर उसे अपने ग्राहकों को बेचती हैं। इसलिए दोनों कंपनियों के बीच संबंध स्वतंत्र खरीदार और विक्रेता यानी ‘प्रिंसिपल-टू-प्रिंसिपल’ का है। तेल कंपनियों का कहना था कि इस स्थिति में उन्हें मिलने वाली रकम पर सर्विस टैक्स नहीं लगाया जा सकता।

दूसरी ओर, कर विभाग ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। विभाग का कहना था कि BPCL और HPCL वास्तव में MGL की सीएनजी को अपने पेट्रोल पंप नेटवर्क के माध्यम से ग्राहकों तक पहुंचाने और उसकी बिक्री में सहायता कर रही थीं। इसके बदले मिलने वाली रकम को सेवा के बदले प्राप्त कमीशन माना जाना चाहिए। विभाग ने इस गतिविधि को उस समय लागू सेवा कर कानून के तहत ‘Business Auxiliary Service’ की श्रेणी में रखने की मांग की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में पक्षों के बीच हुए समझौतों और वास्तविक कारोबारी व्यवस्था को महत्वपूर्ण माना। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि किसी लेनदेन की कर प्रकृति तय करते समय केवल दस्तावेजों में इस्तेमाल किए गए शब्दों को नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह भी जांचना जरूरी है कि संबंधित पक्ष वास्तव में क्या भूमिका निभा रहे हैं। अदालत के अनुसार, BPCL और HPCL की गतिविधियां MGL की सीएनजी को अंतिम ग्राहकों तक पहुंचाने और उसकी बिक्री को आगे बढ़ाने से जुड़ी थीं। इस वजह से उनकी भूमिका को केवल स्वतंत्र खरीदार के रूप में नहीं देखा जा सकता।

अदालत के निष्कर्ष के मुताबिक, तेल कंपनियां MGL की ओर से सीएनजी बिक्री को बढ़ावा देने वाली एजेंसी जैसी भूमिका निभा रही थीं और बिक्री के आधार पर कमीशन प्राप्त कर रही थीं। इसलिए यह गतिविधि उस समय लागू सेवा कर कानून के तहत ‘Business Auxiliary Service’ के दायरे में आती है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने सेवा कर विभाग की दलील को स्वीकार करते हुए BPCL और HPCL के खिलाफ कर मांग को बहाल कर दिया।

यह फैसला मुख्य रूप से उस समय लागू पुराने सेवा कर कानून से संबंधित है, इसलिए इसे सीधे तौर पर वर्तमान GST व्यवस्था में हर प्रकार की सीएनजी बिक्री पर लागू होने वाला नया कर नियम नहीं माना जा सकता। हालांकि, फैसले का व्यापक महत्व यह है कि अदालत ने किसी लेनदेन को केवल ‘बिक्री’ कहे जाने के आधार पर सेवा कर से बाहर रखने के बजाय समझौते की वास्तविक शर्तों और संबंधित पक्षों की वास्तविक व्यावसायिक भूमिका को महत्व दिया है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कर विभाग को संबंधित आदेशों और कानूनी प्रक्रिया के अनुसार आगे की कार्रवाई करनी होगी। BPCL और HPCL के खिलाफ सेवा कर की मांग, ब्याज और अन्य वैधानिक पहलुओं पर आगे की प्रक्रिया संबंधित कर निर्धारण के आधार पर पूरी की जाएगी। यह फैसला सीएनजी वितरण और पेट्रोल पंप नेटवर्क के माध्यम से उत्पादों की बिक्री से जुड़े पुराने सेवा कर विवादों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि किसी कंपनी को किसी अन्य संस्था के उत्पाद की बिक्री को बढ़ावा देने या उसे ग्राहकों तक पहुंचाने के बदले मिलने वाली कमीशन राशि की कर प्रकृति तय करते समय वास्तविक कारोबारी भूमिका और समझौते की पूरी संरचना को ध्यान में रखना जरूरी है।

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