FDA की कार्रवाई पर कोर्ट की दो टूक- नियम लागू करें, लेकिन हद से ज्यादा सख्ती न करें

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मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताते हुए पुणे की एक मिठाई और डेयरी दुकान का लाइसेंस बहाल करने का आदेश दिया है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि दुकान को लंबे समय तक बंद रखने से हुए नुकसान की भरपाई के लिए FDA को दुकान संचालकों को ₹5 लाख का मुआवजा देना होगा। अदालत की यह टिप्पणी उस मामले में आई, जिसमें दोबारा निरीक्षण के दौरान प्रतिष्ठान को खाद्य सुरक्षा और स्वच्छता संबंधी मानकों का करीब 98 प्रतिशत अनुपालन करते हुए पाया गया था।

मामला पुणे स्थित गुरुनानक डेयरी एंड स्वीट्स से जुड़ा है। रिपोर्टों के अनुसार, 12 जून 2026 को FDA को इस प्रतिष्ठान से संबंधित खाद्य विषाक्तता की शिकायत मिली थी। शिकायत के बाद खाद्य सुरक्षा अधिकारियों ने दुकान का निरीक्षण किया। निरीक्षण में स्वच्छता, रखरखाव और कर्मचारियों की हाइजीन से जुड़ी कुछ कमियां सामने आने के बाद FDA ने उसी दिन दुकान का खाद्य लाइसेंस निलंबित कर दिया था। इसके बाद दुकान संचालकों ने कमियों को दूर करने और अपना कारोबार फिर से शुरू करने के लिए विभाग के समक्ष अनुपालन रिपोर्ट पेश की।

दुकान संचालकों की ओर से कमियों को दूर किए जाने का दावा किए जाने के बाद 13 जुलाई को FDA की टीम ने दोबारा निरीक्षण किया। इस निरीक्षण में प्रतिष्ठान ने 36 में से 35 अंक हासिल किए, जो लगभग 98 प्रतिशत अनुपालन के बराबर था। इसके बावजूद लाइसेंस तत्काल बहाल नहीं किया गया और दुकान को अपना कारोबार शुरू करने की अनुमति नहीं मिली। यही स्थिति बाद में हाईकोर्ट के सामने मुख्य विवाद का कारण बनी।

FDA की ओर से अदालत में दलील दी गई कि लाइसेंस निलंबन के खिलाफ दुकान संचालकों की अपील संबंधित अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष लंबित थी। रिपोर्टों के मुताबिक, अपील पर सुनवाई पूरी हो चुकी थी और मामला आदेश के लिए लंबित था। विभाग का कहना था कि जब तक अपीलीय प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक लाइसेंस निलंबन प्रभावी रह सकता है। हालांकि, हाईकोर्ट इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुआ।

अदालत ने सवाल उठाया कि जब विभाग की अपनी दोबारा की गई जांच में प्रतिष्ठान को लगभग पूरी तरह अनुपालन में पाया गया था, तो फिर उसे कारोबार करने से रोकने का औचित्य क्या है। पीठ ने माना कि खाद्य सुरक्षा मानकों को लागू करना FDA की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है, लेकिन नियामकीय शक्तियों का इस्तेमाल परिस्थितियों के अनुपात में और उचित प्रक्रिया के तहत होना चाहिए। अदालत ने लाइसेंस को लंबे समय तक निलंबित रखने की कार्रवाई को अत्यधिक सख्त बताया।

मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र वी. घुगे और न्यायमूर्ति गौतम ए. अंखड की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने FDA की कार्रवाई पर तीखी टिप्पणी की और कहा कि जब प्रतिष्ठान ने कमियों को दूर कर लिया था तथा दोबारा निरीक्षण में 98 प्रतिशत अनुपालन सामने आया था, तब लाइसेंस बहाल करने की दिशा में कार्रवाई होनी चाहिए थी। अदालत ने यह भी सवाल किया कि केवल अपील लंबित होने की वजह से किसी व्यवसाय को लंबे समय तक बंद रखना उचित कैसे हो सकता है।

दुकान संचालकों ने अदालत को बताया कि लाइसेंस निलंबित रहने के कारण उनका कारोबार करीब 34 दिनों तक बंद रहा। इस अवधि में उन्हें लाखों रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ। रिपोर्टों में दुकान की सामान्य दैनिक आय करीब ₹25,000 बताई गई है और कुल नुकसान लगभग ₹8.5 लाख से ₹8.74 लाख के बीच बताया गया। संचालकों ने इसी नुकसान को आधार बनाकर अदालत से राहत और मुआवजे की मांग की थी।

हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों, दोबारा किए गए निरीक्षण और सामने आए अनुपालन स्तर को ध्यान में रखते हुए FDA के लाइसेंस निलंबन आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने दुकान को दोबारा कारोबार शुरू करने की अनुमति दी। इसके साथ ही FDA को दुकान संचालकों को ₹5 लाख का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया। रिपोर्टों के अनुसार, विभाग को यह राशि एक महीने के भीतर देने को कहा गया है।

इस मामले में FDA आयुक्त तुकाराम मुंढे का भी पक्ष सामने आया है। उन्होंने कहा कि विभाग अदालत के आदेश की समीक्षा करेगा और उसके बाद इस पर प्रतिक्रिया दी जाएगी। इससे संकेत मिलता है कि विभाग फैसले के कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं का अध्ययन कर आगे की कार्रवाई पर निर्णय ले सकता है।

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब महाराष्ट्र में खाद्य सुरक्षा मानकों को लेकर FDA की जांच और कार्रवाई तेज हुई है। होटल, रेस्तरां, डेयरी, मिठाई की दुकानों और अन्य खाद्य प्रतिष्ठानों में स्वच्छता एवं खाद्य गुणवत्ता की जांच की जा रही है। हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस मामले के जरिए यह स्पष्ट संकेत दिया है कि खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है, लेकिन नियामक कार्रवाई मनमानी या अनुपातहीन नहीं होनी चाहिए।

इस फैसले का महत्व इसलिए भी है क्योंकि अदालत ने खाद्य सुरक्षा और कारोबारी अधिकारों के बीच संतुलन की जरूरत पर जोर दिया है। किसी प्रतिष्ठान में गंभीर खाद्य सुरक्षा खामी मिलने पर प्रशासन को कार्रवाई करने का अधिकार है, लेकिन यदि बाद की जांच में कमियां दूर कर दी जाती हैं और प्रतिष्ठान निर्धारित मानकों का पालन करता हुआ पाया जाता है, तो कार्रवाई की समीक्षा भी आवश्यक है। गुरुनानक डेयरी एंड स्वीट्स मामले में ₹5 लाख मुआवजे का आदेश इसी व्यापक सिद्धांत की ओर इशारा करता है कि प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल उचित, अनुपातिक और निष्पक्ष तरीके से किया जाना चाहिए।

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