हसीना से तीस्ता तक… भारत-बांग्लादेश के बीच किन मुद्दों पर फंसी कूटनीति?

SHARE:

भारत और बांग्लादेश के रिश्ते इस समय एक बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहे हैं। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के भारत दौरे को दोनों देशों के बीच संबंधों को नए सिरे से पटरी पर लाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा था। पहले उनके 20 से 25 अगस्त के बीच भारत आने की संभावना की खबरें सामने आई थीं, लेकिन अब यात्रा को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। बांग्लादेश की ओर से भारत के साथ बेहतर कूटनीतिक माहौल की जरूरत बताई गई है। इसी बीच शेख हसीना का प्रत्यर्पण, जमात-ए-इस्लामी का बढ़ता प्रभाव, सीमा और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे तथा तीस्ता नदी परियोजना जैसे विषय भारत-बांग्लादेश संबंधों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

तारिक रहमान के सत्ता संभालने के बाद भारत और बांग्लादेश दोनों ने रिश्तों को सामान्य बनाने में रुचि दिखाई है। भारत ने उन्हें द्विपक्षीय यात्रा के लिए औपचारिक निमंत्रण दिया था। इसके अलावा, बांग्लादेश के BIMSTEC अध्यक्ष होने के कारण उन्हें नई दिल्ली में होने वाले BRICS आउटरीच कार्यक्रम के लिए भी अलग से आमंत्रित किया गया था। ऐसे में तारिक रहमान का भारत दौरा केवल एक सामान्य राजनयिक यात्रा नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच पिछले कुछ वर्षों में पैदा हुए अविश्वास को कम करने का अवसर माना जा रहा था।

हालांकि, यात्रा के रास्ते में सबसे बड़ी राजनीतिक अड़चन पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का मुद्दा बना हुआ है। 2024 में बांग्लादेश में हुए बड़े राजनीतिक आंदोलन के बाद शेख हसीना भारत आ गई थीं। इसके बाद ढाका ने उनके प्रत्यर्पण की मांग की। बांग्लादेश में हसीना को कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है और उन्हें एक मामले में मौत की सजा भी सुनाई जा चुकी है, जिसे वह राजनीतिक रूप से प्रेरित बताती रही हैं। भारत ने प्रत्यर्पण अनुरोध मिलने की पुष्टि की है और कहा है कि मामले को अपने कानूनी ढांचे के तहत देखा जा रहा है।

हसीना की भारत में मौजूदगी और उनकी सार्वजनिक राजनीतिक गतिविधियां भी दोनों देशों के बीच तनाव का कारण बनी हैं। अगस्त की शुरुआत में दिल्ली से उनके एक कार्यक्रम को लेकर ढाका ने भारत से स्पष्टीकरण मांगा था। बांग्लादेश सरकार ने इस तरह की गतिविधियों पर आपत्ति जताई, जबकि भारत ने स्पष्ट किया कि वह निजी कार्यक्रम का आयोजक नहीं था और वहां व्यक्त विचारों से उसका कोई संबंध नहीं है। इस पूरे घटनाक्रम ने दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद विश्वास की कमी को और गहरा किया।

इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में जमात-ए-इस्लामी फैक्टर भी महत्वपूर्ण हो जाता है। बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में जमात का प्रभाव बढ़ने से भारत के लिए सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़े सवाल अहम हो गए हैं। जमात नेता शफीकुर रहमान ने भारत के साथ संबंधों को लेकर कई मौकों पर अपनी बात रखी है, लेकिन सीमा, सुरक्षा और भारत की नीतियों को लेकर पार्टी की आलोचनात्मक टिप्पणियां भी सामने आती रही हैं। जुलाई में शफीकुर रहमान ने भारत पर सीमा पर तनाव पैदा करने का आरोप लगाया था। ऐसे बयानों से यह संकेत मिलता है कि बांग्लादेश की नई राजनीतिक व्यवस्था में भारत को कई अलग-अलग राजनीतिक ताकतों के साथ संबंधों का संतुलन बनाना होगा।

भारत के लिए चिंता केवल जमात के राजनीतिक प्रभाव तक सीमित नहीं है। नई दिल्ली की प्राथमिकताओं में यह भी शामिल है कि बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों, कट्टरपंथ या सीमा पार सुरक्षा चुनौतियों के लिए न हो। दूसरी ओर, बांग्लादेश अपनी विदेश नीति को अधिक विविध बनाने की कोशिश कर रहा है और भारत के अलावा चीन, पाकिस्तान तथा अन्य देशों के साथ भी संबंधों को विस्तार दे रहा है। यही कारण है कि तारिक रहमान सरकार के सामने भारत के साथ सहयोग और घरेलू राजनीतिक दबावों के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है।

इन तमाम राजनीतिक मुद्दों के बीच तीस्ता नदी का पानी और तीस्ता परियोजना भारत-बांग्लादेश संबंधों का एक बेहद महत्वपूर्ण और लंबे समय से लंबित विषय है। तीस्ता नदी भारत से होकर बांग्लादेश में प्रवेश करती है और इसके जल बंटवारे को लेकर दोनों देशों के बीच वर्षों से बातचीत होती रही है। बांग्लादेश स्थायी जल-बंटवारा समझौते की मांग करता रहा है, जबकि भारत में खासकर पश्चिम बंगाल सरकार की अपनी चिंताएं हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लंबे समय से तीस्ता जल बंटवारे के प्रस्ताव का विरोध करती रही हैं, जिससे केंद्र और राज्य के बीच भी इस विषय पर मतभेद सामने आते रहे हैं।

तीस्ता का मुद्दा अब केवल पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं रह गया है। इसमें चीन की भूमिका ने इसे रणनीतिक महत्व भी दे दिया है। जून 2026 में प्रधानमंत्री तारिक रहमान की चीन यात्रा के दौरान बांग्लादेश और चीन ने तीस्ता तथा अन्य नदियों के प्रबंधन में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की थी। चीन ने बांग्लादेश की तीस्ता प्रबंधन परियोजना में सहयोग का समर्थन भी जताया।

भारत के लिए तीस्ता परियोजना में चीन की बढ़ती भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह क्षेत्र भारत के उत्तर बंगाल और पूर्वोत्तर से जुड़े संवेदनशील भू-रणनीतिक क्षेत्र के करीब है। यदि चीन को इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे या जल प्रबंधन परियोजनाओं में भूमिका मिलती है, तो नई दिल्ली इसे केवल एक विकास परियोजना के रूप में नहीं देखेगी। यही वजह है कि भारत ने पहले ही बांग्लादेश को तीस्ता परियोजना को लेकर अपना रुख बता दिया है और कहा है कि इस विषय पर आगे की नीति तय करते समय सभी संबंधित घटनाक्रमों को ध्यान में रखा जाएगा।

हालांकि, हालिया संकेतों से यह भी पता चलता है कि बांग्लादेश तीस्ता विवाद को भारत के साथ व्यापक संबंधों पर हावी नहीं होने देना चाहता। 18 अगस्त को बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री शाहिदुद्दीन चौधरी ने कहा कि उनका देश तीस्ता विवाद के कारण भारत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध खराब नहीं करना चाहता। इससे यह संकेत मिलता है कि ढाका इस मुद्दे पर चीन के साथ सहयोग की संभावना तलाशते हुए भी भारत के साथ संवाद का रास्ता खुला रखना चाहता है।

भारत के लिए बांग्लादेश का महत्व बहुत व्यापक है। दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा, सड़क और रेल संपर्क, सीमा प्रबंधन, सुरक्षा तथा पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी जैसे अनेक मुद्दे सीधे जुड़े हैं। बांग्लादेश भारत के पूर्वोत्तर राज्यों तक पहुंच के लिए महत्वपूर्ण भौगोलिक मार्ग प्रदान करता है। इसी तरह बांग्लादेश के लिए भारत एक बड़ा पड़ोसी बाजार, ऊर्जा सहयोगी और महत्वपूर्ण क्षेत्रीय साझेदार है। इसलिए दोनों देशों के बीच तनाव लंबे समय तक बना रहना किसी के हित में नहीं है।

इसी कारण तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा को लेकर कूटनीतिक स्तर पर काफी उम्मीदें थीं। लेकिन हसीना प्रत्यर्पण का मुद्दा, जमात का राजनीतिक प्रभाव और तीस्ता परियोजना जैसे विषय यात्रा के राजनीतिक माहौल को जटिल बना रहे हैं। बांग्लादेश ने भी साफ संकेत दिया है कि यात्रा से पहले अनुकूल माहौल जरूरी है। ऐसे में दोनों देशों को संवेदनशील मुद्दों को एक साथ सुलझाने के बजाय अलग-अलग बातचीत के रास्ते पर आगे बढ़ाने की जरूरत होगी।

आने वाले समय में भारत और बांग्लादेश के संबंधों की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों सरकारें राजनीतिक मतभेदों के बावजूद व्यावहारिक सहयोग को कितना आगे बढ़ा पाती हैं। शेख हसीना का मुद्दा तत्काल राजनीतिक तनाव का कारण है, जबकि तीस्ता लंबे समय से चले आ रहे जल विवाद का प्रतीक है और चीन की भूमिका ने इसे रणनीतिक आयाम दे दिया है। वहीं, जमात का बढ़ता प्रभाव बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में बदलाव को दर्शाता है, जिसका असर भारत की सुरक्षा और कूटनीति पर भी पड़ सकता है।

कुल मिलाकर, भारत-बांग्लादेश संबंध इस समय एक नए संतुलन की तलाश में हैं। तारिक रहमान सरकार भारत के साथ संबंध सुधारना चाहती है, लेकिन उसे घरेलू राजनीतिक समीकरणों, हसीना प्रत्यर्पण की मांग और चीन के साथ बढ़ते सहयोग के बीच रास्ता बनाना होगा। दूसरी तरफ भारत को भी बांग्लादेश के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों को सुरक्षित रखते हुए सीमा सुरक्षा, राजनीतिक स्थिरता और चीन की बढ़ती मौजूदगी जैसी चिंताओं पर नजर रखनी होगी। तीस्ता और जमात दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आने वाले समय में यह देखना सबसे अहम होगा कि क्या दोनों देश इन मुद्दों को व्यापक द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित किए बिना बातचीत के जरिए संभाल पाते हैं।

Leave a Comment