हिंद-प्रशांत में भारत-जापान की बढ़ेगी ताकत, रक्षा मंत्रियों के बीच अहम वार्ता

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भारत और जापान के बीच रक्षा और रणनीतिक सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है। नई दिल्ली में भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी के बीच महत्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता हुई। बैठक में दोनों देशों ने रक्षा सहयोग को और व्यापक बनाने, समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने, रक्षा तकनीक में साझेदारी बढ़ाने और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति एवं स्थिरता सुनिश्चित करने जैसे मुद्दों पर चर्चा की। जापानी रक्षा मंत्री की भारत यात्रा ऐसे समय में हुई है जब दोनों देश अपने रणनीतिक संबंधों को नई ऊंचाई देने पर लगातार जोर दे रहे हैं।

बैठक में हिंद-प्रशांत क्षेत्र की बदलती सुरक्षा परिस्थितियों और समुद्री सुरक्षा को लेकर विशेष चर्चा हुई। भारत और जापान दोनों ही स्वतंत्र, खुले और नियम आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र के समर्थक हैं। दोनों देशों का मानना है कि क्षेत्र में समुद्री मार्गों की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान और स्थिरता बनाए रखना आर्थिक विकास तथा क्षेत्रीय शांति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसी वजह से समुद्री सहयोग दोनों देशों की रक्षा साझेदारी का प्रमुख हिस्सा बनता जा रहा है।

भारत और जापान के बीच समुद्री सुरक्षा सहयोग को संस्थागत रूप से मजबूत करने पर भी जोर दिया गया। दोनों पक्षों के बीच समुद्री क्षेत्र से संबंधित सहयोग को आगे बढ़ाने की व्यवस्था विकसित की जा रही है, जिससे दोनों देशों की नौसेनाओं और संबंधित संस्थाओं के बीच समन्वय बेहतर हो सकेगा। समुद्री निगरानी, सूचनाओं के आदान-प्रदान, संयुक्त गतिविधियों और हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा क्षमताओं को बढ़ाने जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

रक्षा तकनीक और रक्षा उत्पादन भी बातचीत के प्रमुख मुद्दों में शामिल रहे। भारत अपनी घरेलू रक्षा उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए ‘मेक इन इंडिया’ पर विशेष जोर दे रहा है। जापान के पास उन्नत तकनीक और उच्च गुणवत्ता वाले रक्षा विनिर्माण का व्यापक अनुभव है। ऐसे में दोनों देशों के बीच रक्षा अनुसंधान, तकनीकी सहयोग, संयुक्त विकास और रक्षा उपकरणों के निर्माण के क्षेत्र में साझेदारी को आगे बढ़ाने की संभावनाएं हैं। इससे भारत की आत्मनिर्भर रक्षा व्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है।

भारत-जापान रक्षा सहयोग में UNICORN परियोजना को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह भारतीय नौसेना के युद्धपोतों के लिए विकसित की जा रही एक उन्नत मस्तूल प्रणाली है। दोनों देशों के बीच इसके सह-विकास और तकनीकी सहयोग को लेकर पहले ही समझौते हो चुके हैं। इस तरह की परियोजनाएं दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच व्यावहारिक सहयोग को बढ़ाने और आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में साझेदारी मजबूत करने का रास्ता खोलती हैं।

दोनों देशों के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास भी रक्षा संबंधों का महत्वपूर्ण आधार हैं। भारतीय और जापानी सेनाएं नियमित रूप से विभिन्न स्तरों पर सैन्य अभ्यास करती रही हैं। इन अभ्यासों का उद्देश्य दोनों देशों की सेनाओं के बीच परिचालन समन्वय, आपसी समझ और संयुक्त रूप से काम करने की क्षमता को बेहतर बनाना है। भविष्य में इन अभ्यासों का दायरा और जटिलता बढ़ाने के साथ-साथ बहुपक्षीय सैन्य अभ्यासों में सहयोग को भी मजबूत किए जाने की संभावना है।

भारत-जापान रक्षा सहयोग अब केवल पारंपरिक सैन्य क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष, उभरती तकनीक और रक्षा अनुसंधान जैसे नए क्षेत्रों में भी दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ रहा है। आधुनिक युद्ध और सुरक्षा व्यवस्था में साइबर तथा अंतरिक्ष क्षमताओं की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में इन क्षेत्रों में जानकारी साझा करने, अनुसंधान और तकनीकी सहयोग को मजबूत करना दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

रक्षा मंत्रियों की बैठक से पहले भारत और जापान के शीर्ष नेतृत्व के बीच भी रक्षा एवं सुरक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने पर चर्चा हो चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची के बीच हुई बातचीत में भी दोनों देशों ने सुरक्षा और रक्षा संबंधों को और गहरा करने पर जोर दिया था। समुद्री सुरक्षा, नौसैनिक जहाजों के रखरखाव एवं मरम्मत, समुद्री क्षेत्र में जागरूकता और रक्षा तकनीक जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की दिशा तय की गई थी। इसी क्रम में दोनों देशों के बीच ‘2+2’ वार्ता को आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया गया।

भारत के लिए जापान के साथ रक्षा उद्योग में सहयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे घरेलू रक्षा उत्पादन और तकनीकी क्षमता को बढ़ावा मिल सकता है। दोनों देशों के रक्षा उद्योगों, स्टार्टअप और छोटे तथा मध्यम उद्यमों के बीच संपर्क बढ़ाने की संभावनाएं हैं। रक्षा अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में भारतीय DRDO और जापान की Acquisition, Technology & Logistics Agency के बीच सहयोग को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे भविष्य में नई रक्षा तकनीकों के विकास और उनके उत्पादन में साझेदारी का आधार मजबूत हो सकता है।

भारत और जापान के बीच रक्षा संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। दोनों देशों के बीच सैन्य अभ्यास, समुद्री सुरक्षा, रक्षा तकनीक, लॉजिस्टिक सहयोग और उच्चस्तरीय रक्षा संवाद पहले से मौजूद हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच दोनों देशों के लिए एक-दूसरे के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गया है।

कुल मिलाकर, राजनाथ सिंह और शिंजिरो कोइजुमी की बैठक भारत-जापान रक्षा साझेदारी को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। समुद्री सुरक्षा से लेकर रक्षा तकनीक, संयुक्त सैन्य अभ्यास, साइबर और अंतरिक्ष सहयोग तथा रक्षा उत्पादन तक दोनों देश अपने संबंधों का दायरा लगातार बढ़ा रहे हैं। आने वाले समय में इन क्षेत्रों में ठोस परियोजनाएं और नए समझौते सामने आने की संभावना है। इससे न केवल भारत और जापान की रक्षा क्षमताओं को मजबूती मिल सकती है, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षा के लिए दोनों देशों की साझेदारी और अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।

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