नई दिल्ली: केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के कानूनी आधार और राज्यों में उसकी जांच शक्तियों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। सीबीआई फिलहाल दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (DSPE) अधिनियम, 1946 के तहत काम करती है। करीब आठ दशक पुराने इस कानून में समय के साथ कई बदलाव हुए हैं, लेकिन बदलते अपराधों, खासकर साइबर अपराध और अंतरराज्यीय अपराधों की बढ़ती चुनौती के बीच सीबीआई के लिए अधिक स्पष्ट और आधुनिक कानूनी ढांचे की मांग लगातार उठती रही है।
सीबीआई की स्थापना 1 अप्रैल 1963 के सरकारी प्रस्ताव के जरिए हुई थी, लेकिन इसकी जांच संबंधी शक्तियों का मूल आधार DSPE Act ही है। इस कानून की धारा 3 केंद्र सरकार को कुछ अपराधों या अपराधों की श्रेणियों को अधिसूचित करने की शक्ति देती है। वहीं धारा 5 के तहत सीबीआई की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र को अन्य राज्यों तक बढ़ाने का प्रावधान है, जबकि धारा 6 राज्य के क्षेत्र में इन शक्तियों के इस्तेमाल के लिए राज्य सरकार की सहमति से संबंधित है। इसी धारा के कारण सीबीआई को कई मामलों में राज्य सरकारों की अनुमति की आवश्यकता पड़ती है।
कानूनी व्यवस्था के अनुसार, यदि किसी राज्य ने सीबीआई को सामान्य सहमति दे रखी है, तो एजेंसी अधिसूचना के दायरे में आने वाले मामलों की जांच कर सकती है और प्रत्येक मामले में अलग से अनुमति लेने की जरूरत नहीं होती। लेकिन जब कोई राज्य सामान्य सहमति वापस ले लेता है, तो नए मामलों में सीबीआई को आम तौर पर संबंधित राज्य सरकार से विशेष या केस-दर-केस सहमति लेनी पड़ती है। यही व्यवस्था कई बार जांच शुरू करने की प्रक्रिया को प्रभावित करती है और केंद्र तथा राज्यों के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर विवाद का कारण बनती है।
राज्यों की सहमति का मुद्दा भारत के संघीय ढांचे से भी जुड़ा हुआ है। संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत पुलिस और कानून-व्यवस्था मुख्य रूप से राज्य के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इसलिए किसी केंद्रीय एजेंसी को राज्य के क्षेत्र में पुलिस शक्तियों का इस्तेमाल करने की अनुमति देने के लिए राज्य की सहमति की व्यवस्था को संघीय संतुलन का हिस्सा माना जाता है। दूसरी ओर, केंद्र का तर्क यह रहा है कि साइबर अपराध, आर्थिक अपराध, संगठित अपराध और अंतरराज्यीय अपराधों की प्रकृति ऐसी है कि उनकी जांच के लिए केंद्रीय एजेंसी को प्रभावी अधिकार क्षेत्र की आवश्यकता होती है।
साइबर अपराध के बढ़ते मामलों ने इस बहस को और महत्वपूर्ण बना दिया है। साइबर अपराधी एक राज्य में रहकर दूसरे राज्य के लोगों को निशाना बना सकते हैं, जबकि बैंक खाते, मोबाइल नंबर, डिजिटल उपकरण और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य अलग-अलग राज्यों में मौजूद हो सकते हैं। कई मामलों में अपराध की कड़ियां कई राज्यों और यहां तक कि दूसरे देशों तक जुड़ी होती हैं। ऐसी स्थिति में अलग-अलग राज्यों से अनुमति लेने की प्रक्रिया जांच में देरी पैदा कर सकती है। इसी वजह से संसदीय समिति ने राष्ट्रीय और अंतरराज्यीय महत्व वाले साइबर अपराधों की जांच के लिए मौजूदा कानूनी व्यवस्था में बदलाव की जरूरत पर जोर दिया है।
हाल ही में सामने आई संसदीय समिति की जानकारी के मुताबिक, सीबीआई ने साइबर अपराधों की जांच के लिए 14 राज्यों के मुख्य सचिवों से सामान्य सहमति मांगी है। इनमें बिहार, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, मेघालय, मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, झारखंड, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। यह कदम ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जब कुछ राज्यों ने पहले दी गई सामान्य सहमति वापस ले ली है और सीबीआई को नए मामलों में राज्य सरकार की अनुमति की आवश्यकता पड़ सकती है।
सीबीआई के लिए अलग और व्यापक कानून बनाने की मांग भी नई नहीं है। संसदीय समितियां पहले यह चिंता जता चुकी हैं कि DSPE Act मूल रूप से 1946 में एक अलग प्रशासनिक और कानूनी परिस्थिति में बनाया गया था। उस समय अपराधों का स्वरूप आज की तुलना में काफी अलग था। वर्तमान में सीबीआई भ्रष्टाचार, आर्थिक अपराध, गंभीर आपराधिक मामलों, अंतरराज्यीय अपराधों और अन्य जटिल मामलों की जांच करती है। इसलिए एजेंसी की शक्तियों, अधिकार क्षेत्र, जवाबदेही और स्वतंत्रता को स्पष्ट करने के लिए आधुनिक कानून की जरूरत महसूस की जा रही है।
इस मुद्दे पर न्यायपालिका की टिप्पणियां भी महत्वपूर्ण हैं। सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न मामलों में DSPE Act की धाराओं 3, 5 और 6 की व्यवस्था को स्पष्ट किया है और माना है कि सामान्य परिस्थितियों में सीबीआई किसी राज्य में अपने पुलिस अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल राज्य की सहमति के बिना नहीं कर सकती। हालांकि संवैधानिक अदालतों के पास अपने संवैधानिक अधिकारों के तहत उपयुक्त मामलों में सीबीआई जांच का आदेश देने की शक्ति है। ऐसी शक्ति का इस्तेमाल असाधारण परिस्थितियों में किया जाता है, खासकर तब जब न्याय के हित में स्वतंत्र जांच आवश्यक हो।
मौजूदा बहस का सबसे अहम पहलू केंद्र और राज्यों के अधिकारों के बीच संतुलन है। केंद्र के सामने चुनौती यह है कि सीबीआई को ऐसे मामलों में प्रभावी जांच की क्षमता मिले जिनका असर एक से अधिक राज्यों या पूरे देश पर पड़ता है। वहीं राज्यों की चिंता यह है कि पुलिस और कानून-व्यवस्था उनके संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का हिस्सा हैं और केंद्रीय एजेंसी को असीमित अधिकार देने से संघीय ढांचे पर असर पड़ सकता है। इसलिए किसी भी प्रस्तावित संशोधन में दोनों पक्षों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल इसे पूरे देश में राज्य सरकारों की सहमति समाप्त करने वाला प्रस्ताव मानना सही नहीं होगा। मौजूदा चर्चा मुख्य रूप से DSPE Act में संभावित बदलाव और राष्ट्रीय एवं अंतरराज्यीय महत्व वाले साइबर अपराधों जैसे मामलों में सीबीआई की जांच को अधिक प्रभावी बनाने से जुड़ी है। यदि भविष्य में कानून में संशोधन किया जाता है या सीबीआई के लिए अलग कानून लाया जाता है, तो उसमें एजेंसी की शक्तियों के साथ-साथ जवाबदेही, न्यायिक निगरानी और राज्यों के संवैधानिक अधिकारों के लिए सुरक्षा प्रावधान भी महत्वपूर्ण होंगे।
कुल मिलाकर, सीबीआई के कानूनी ढांचे में बदलाव की बहस अब केवल एजेंसी को अधिक अधिकार देने तक सीमित नहीं रह गई है। यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है कि देश की प्रमुख केंद्रीय जांच एजेंसी को आधुनिक अपराधों से निपटने के लिए कितनी स्वतंत्रता दी जाए और उसके अधिकारों को किस तरह स्पष्ट कानूनी आधार मिले। साइबर अपराध और अंतरराज्यीय अपराधों के लगातार बदलते स्वरूप के बीच आने वाले समय में DSPE Act में संशोधन या सीबीआई के लिए अलग कानून की दिशा में होने वाली पहल केंद्र-राज्य संबंधों और देश की जांच व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।




