परिसीमन और महिला आरक्षण पर बड़ा दांव, विशेष संसद सत्र की अटकलों ने बढ़ाई राजनीतिक गर्मी

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संसद के मानसून सत्र के बाद परिसीमन विधेयक को लेकर राजनीतिक हलचल एक बार फिर तेज होती दिखाई दे रही है। सरकार के स्तर पर परिसीमन से जुड़े संवैधानिक संशोधन को आगे बढ़ाने के विकल्प खुले रखे जाने की चर्चा है। इसी बीच विशेष संसद सत्र बुलाए जाने की अटकलों ने भी जोर पकड़ा है। हालांकि, अभी तक सरकार की ओर से विशेष सत्र को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। इससे पहले संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने अगस्त में परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े विधेयकों पर विशेष सत्र बुलाने की खबरों को खारिज करते हुए कहा था कि ऐसी कोई योजना विचाराधीन नहीं है।

परिसीमन का मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका सीधा संबंध लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं तथा विभिन्न राज्यों को मिलने वाली संसदीय सीटों से है। प्रस्तावित बदलावों का उद्देश्य लोकसभा की सीटों का पुनर्निर्धारण और महिला आरक्षण को लागू करने के लिए आवश्यक संवैधानिक व्यवस्था तैयार करना बताया गया है। सरकार की ओर से पहले यह संकेत दिया गया है कि लोकसभा की कुल सीटों में वृद्धि की जा सकती है, ताकि महिलाओं के लिए आरक्षण लागू होने के बाद भी सदन में विभिन्न राज्यों का प्रतिनिधित्व पर्याप्त बना रहे।

इस पूरे मुद्दे का सबसे संवेदनशील पहलू दक्षिणी राज्यों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों की ओर से लंबे समय से यह चिंता जताई जाती रही है कि यदि परिसीमन मुख्य रूप से आबादी के आधार पर किया गया तो जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को राजनीतिक नुकसान हो सकता है। इन राज्यों का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में सफलता हासिल की है, इसलिए उन्हें इसका राजनीतिक नुकसान नहीं उठाना चाहिए। दक्षिणी राज्यों के नेताओं ने केंद्र से मांग की है कि नए परिसीमन में उनके मौजूदा प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन की रक्षा की जाए।

केंद्र सरकार का पक्ष इससे अलग है। गृह मंत्री अमित शाह पहले संसद में कह चुके हैं कि परिसीमन के बाद दक्षिणी राज्यों के साथ अन्याय नहीं किया जाएगा। सरकार के अनुसार लोकसभा की सीटों में संभावित वृद्धि से दक्षिण भारत को भी अतिरिक्त प्रतिनिधित्व मिलेगा। शाह ने यह तर्क दिया है कि सीटों की संख्या बढ़ाने का उद्देश्य केवल उत्तर और दक्षिण के बीच राजनीतिक संतुलन बदलना नहीं, बल्कि बढ़ती आबादी और महिला आरक्षण जैसी संवैधानिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सदन की क्षमता बढ़ाना है। सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि मौजूदा व्यवस्था में किसी राज्य की सीटें घटाने के बजाय कुल सीटों का विस्तार करने पर जोर दिया जा सकता है।

इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में अमित शाह की दक्षिण भारत में सक्रियता को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने तमिलनाडु में दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक की अध्यक्षता की, जिसमें तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना समेत दक्षिणी राज्यों से जुड़े प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। यह मंच केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय तथा अंतर-राज्यीय समस्याओं पर बातचीत के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। बैठक में जल विवाद, विकास, कानून-व्यवस्था, शिक्षा और केंद्र-राज्य संबंधों सहित कई मुद्दों पर चर्चा हुई।

बैठक के दौरान परिसीमन को लेकर दक्षिणी राज्यों की चिंताएं भी सामने आईं। कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की ओर से राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े सवाल उठाए गए। दक्षिणी राज्यों की चिंता का मूल आधार यही है कि भविष्य में सीटों के पुनर्वितरण से उनकी लोकसभा में मौजूदा हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम हो सकती है। केंद्र इस आशंका को दूर करने के लिए लगातार यह संदेश दे रहा है कि परिसीमन के दौरान दक्षिणी राज्यों के हितों का ध्यान रखा जाएगा।

अमित शाह और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के बीच मुलाकात ने भी इस मुद्दे को राजनीतिक महत्व दिया। हालांकि मुलाकात को आधिकारिक तौर पर विभिन्न प्रशासनिक और राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा के रूप में देखा गया, लेकिन इसके बाद दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में परिसीमन और राज्य के प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों का उठना महत्वपूर्ण माना गया। इससे यह संकेत मिला कि केंद्र और दक्षिणी राज्यों के बीच परिसीमन को लेकर संवाद का दौर जारी है।

सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती परिसीमन विधेयक को संसद में पेश करना भर नहीं है, बल्कि इसके लिए पर्याप्त राजनीतिक सहमति तैयार करना भी है। संविधान संशोधन से जुड़े प्रस्तावों के लिए संसद में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। ऐसे में सरकार को विपक्षी दलों के साथ-साथ दक्षिणी राज्यों से जुड़े राजनीतिक दलों को भी भरोसे में लेना पड़ सकता है। विपक्ष की ओर से लगातार मांग की जाती रही है कि परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर सभी दलों के साथ व्यापक चर्चा की जाए।

परिसीमन और महिला आरक्षण के बीच भी गहरा संबंध है। महिला आरक्षण से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए परिसीमन की प्रक्रिया महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसी वजह से दोनों मुद्दों को अक्सर एक साथ देखा जाता है। यदि सरकार परिसीमन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाती है तो इसका असर आने वाले वर्षों में लोकसभा की सीटों के भौगोलिक वितरण और देश के राजनीतिक समीकरण पर पड़ सकता है।

विशेष संसद सत्र को लेकर फिलहाल स्थिति स्पष्ट नहीं है। सरकार की ओर से पहले अगस्त में विशेष सत्र की खबरों को खारिज किया गया था, जबकि बाद की राजनीतिक रिपोर्टों में परिसीमन विधेयक को लेकर सरकार की तैयारियों और संभावित संसदीय रणनीति की चर्चा सामने आई है। इसलिए अभी यह कहना उचित नहीं होगा कि विशेष सत्र निश्चित रूप से बुलाया जाएगा। हालांकि, यह जरूर स्पष्ट है कि परिसीमन का मुद्दा सरकार के राजनीतिक और विधायी एजेंडे में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

आने वाले समय में सरकार के लिए सबसे अहम कदम दक्षिणी राज्यों और विपक्ष के साथ सहमति बनाने का होगा। यदि केंद्र यह भरोसा दिलाने में सफल रहता है कि परिसीमन से जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को राजनीतिक नुकसान नहीं होगा, तो विधेयक के लिए समर्थन जुटाना आसान हो सकता है। दूसरी ओर, यदि दक्षिणी राज्यों की आशंकाएं दूर नहीं होती हैं तो यह मुद्दा केंद्र और राज्यों के बीच राजनीतिक टकराव का बड़ा कारण बन सकता है।

कुल मिलाकर, परिसीमन विधेयक अब केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करने का तकनीकी विषय नहीं रह गया है। यह लोकसभा में राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, महिला आरक्षण, केंद्र-राज्य संबंध और देश के भविष्य के राजनीतिक संतुलन से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है। अमित शाह की दक्षिण भारत में सक्रियता और दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है। फिलहाल विशेष संसद सत्र की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन परिसीमन को लेकर राजनीतिक तैयारियां और बातचीत आने वाले दिनों में और तेज होने की संभावना है।

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