बच्चों की गुमशुदगी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बड़ी पहल, जांच से ट्रायल तक समयबद्ध व्यवस्था की मांग

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देश में बच्चों के अपहरण और गुमशुदगी के मामलों की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक अहम जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में मांग की गई है कि पूरे देश में बच्चों के अपहरण और किडनैपिंग से जुड़े मामलों की जांच के लिए एक समान व्यवस्था बनाई जाए। इसके साथ ही जांच को तय समय सीमा में पूरा करने और ऐसे मामलों की सुनवाई तेजी से कराने के लिए विशेष अदालतों की व्यवस्था करने का सुझाव दिया गया है। याचिका में केंद्र सरकार के साथ-साथ सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को बच्चों से जुड़े मामलों की जांच के लिए एक समान प्रक्रिया तैयार करने के निर्देश देने की मांग की गई है।

अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दाखिल जनहित याचिका में बच्चों के अपहरण और गुमशुदगी से जुड़े मामलों की जांच के लिए देशभर में एक समान ‘स्टैंडर्ड इन्वेस्टिगेशन प्रोसीजर’ यानी मानक जांच प्रक्रिया तैयार करने की मांग की गई है। याचिका का मूल तर्क यह है कि अलग-अलग राज्यों में बच्चों के लापता होने और अपहरण के मामलों को संभालने का तरीका अलग हो सकता है। ऐसे में शुरुआती कार्रवाई में देरी या प्रक्रियागत अंतर बच्चे की तलाश को प्रभावित कर सकता है। याचिकाकर्ता का कहना है कि बच्चे के लापता होने की सूचना मिलने के बाद शुरुआती समय बेहद महत्वपूर्ण होता है और इस दौरान तेजी से कार्रवाई नहीं होने पर बच्चे को दूसरे स्थान पर ले जाने या उसके शोषण का खतरा बढ़ सकता है।

याचिका में एक मानक प्रश्नावली तैयार करने की मांग भी की गई है, ताकि बच्चे के लापता होने के बाद पुलिस जांच में महत्वपूर्ण पहलुओं को व्यवस्थित तरीके से शामिल किया जा सके। इसमें परिवार से जानकारी जुटाने, बच्चे को आखिरी बार कहां और किसके साथ देखा गया, उसके संपर्कों और संभावित संदिग्धों की जानकारी, उपलब्ध डिजिटल या मोबाइल सुरागों तथा बच्चे के संभावित गंतव्य की जांच जैसे पहलुओं को शामिल करने की बात कही गई है। इस तरह की एक समान प्रश्नावली का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अलग-अलग पुलिस इकाइयों में जांच का शुरुआती ढांचा एक जैसा रहे और कोई महत्वपूर्ण सुराग अनदेखा न हो।

याचिका में बच्चों के अपहरण से जुड़े मामलों की जांच वरिष्ठ स्तर के पुलिस अधिकारी की निगरानी में कराने का सुझाव भी दिया गया है। इसके लिए कम से कम ACP या SHO स्तर के अधिकारी की भूमिका सुनिश्चित करने की मांग की गई है। इसके पीछे तर्क यह है कि बच्चों के अपहरण के कई मामलों में जांच एक जिले या राज्य तक सीमित नहीं रहती। यदि बच्चे को दूसरे राज्य में ले जाने की आशंका हो तो अलग-अलग पुलिस इकाइयों के बीच तत्काल संपर्क और सूचना साझा करना जरूरी हो जाता है। वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी में जांच होने से इस तरह के मामलों में जिम्मेदारी तय करने और जांच की प्रगति पर नजर रखने में मदद मिल सकती है।

याचिका में बच्चों के अपहरण से जुड़े मामलों के लिए विशेष अदालतें गठित करने और मुकदमों का निपटारा एक साल के भीतर करने की मांग भी रखी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद मुकदमे लंबे समय तक लंबित रहने से पीड़ित परिवार को न्याय के लिए वर्षों इंतजार करना पड़ सकता है। इसलिए गंभीर मामलों की सुनवाई के लिए विशेष व्यवस्था बनाकर समयबद्ध तरीके से मुकदमे पूरे किए जाने चाहिए। हालांकि, ऐसी व्यवस्था लागू करने के लिए संबंधित कानून और न्यायिक निर्देशों की आवश्यकता होगी।

बच्चों की तलाश और जांच की निगरानी के लिए डिजिटल सिस्टम विकसित करने की मांग भी याचिका का महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्रस्तावित व्यवस्था के जरिए अलग-अलग राज्यों की पुलिस के बीच बच्चों से संबंधित सूचनाओं को तेजी से साझा किया जा सकता है। यदि कोई बच्चा एक राज्य से लापता होता है और उसके दूसरे राज्य में पहुंचने की आशंका होती है, तो संबंधित पुलिस इकाइयों को तुरंत सूचना उपलब्ध कराने वाली व्यवस्था जांच को अधिक प्रभावी बना सकती है। ऐसी डिजिटल व्यवस्था में मामले की प्रगति, बच्चे की तलाश और बरामदगी से संबंधित जानकारी को भी व्यवस्थित तरीके से दर्ज किया जा सकता है।

याचिका में बच्चों के अपहरण के पीछे मानव तस्करी, अवैध गोद लेने, जबरन मजदूरी, यौन शोषण, भीख मंगवाने और बाल विवाह जैसे संभावित अपराधों की आशंका की ओर भी ध्यान दिलाया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि बच्चों की गुमशुदगी के मामलों को केवल एक सामान्य मिसिंग केस के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि परिस्थितियों के आधार पर संभावित आपराधिक नेटवर्क और तस्करी के कोण की भी जांच होनी चाहिए। खासतौर पर उन मामलों में अंतरराज्यीय समन्वय महत्वपूर्ण हो जाता है, जिनमें बच्चे को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने की आशंका हो।

याचिका में आरोपियों की संपत्तियों की जांच और अपराध से अर्जित संपत्ति पर कानूनी कार्रवाई की मांग भी की गई है। तर्क यह है कि यदि किसी संगठित गिरोह द्वारा बच्चों के अपहरण या तस्करी के जरिए आर्थिक लाभ कमाया जा रहा है, तो केवल आरोपियों की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं होगी। अपराध से जुड़े आर्थिक नेटवर्क की जांच और कानून के तहत आवश्यक कार्रवाई से ऐसे संगठित गिरोहों की गतिविधियों पर प्रभावी रोक लगाने में मदद मिल सकती है।

बच्चों के अपहरण से जुड़े अपराधों में सजा को प्रभावी बनाने की मांग भी याचिका में की गई है। याचिकाकर्ता ने गंभीर अपराधों में कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई और कुछ परिस्थितियों में अलग-अलग अपराधों की सजा के प्रभाव को बढ़ाने की बात कही है। हालांकि, इस तरह के बदलाव मौजूदा कानूनों और विधायी प्रक्रिया के तहत ही संभव होंगे। इसलिए याचिका में की गई मांगों और वास्तव में लागू होने वाले कानूनी प्रावधानों के बीच अंतर करना जरूरी है।

बच्चों की गुमशुदगी और संभावित तस्करी को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले भी चिंता व्यक्त कर चुका है। अदालत ने अलग-अलग मामलों में बच्चों की सुरक्षा, उनकी बरामदगी और संबंधित एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत पर ध्यान दिया है। इसी व्यापक पृष्ठभूमि में बच्चों के अपहरण और गुमशुदगी की जांच के लिए देशभर में एक समान व्यवस्था की मांग को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

दरअसल, भारत में पुलिस और कानून-व्यवस्था से जुड़े कई पहलुओं में राज्यों की महत्वपूर्ण भूमिका है। वहीं, जब किसी मामले के तार एक से अधिक राज्यों से जुड़ते हैं तो केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत बढ़ जाती है। ऐसे में बच्चों के अपहरण के मामलों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक समान जांच प्रोटोकॉल तैयार करने का उद्देश्य राज्यों के बीच सूचना साझा करने और कार्रवाई में एकरूपता लाना हो सकता है।

हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि जनहित याचिका में की गई मांगें अपने आप में लागू कानून या सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश नहीं होतीं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस मामले में मुख्य जोर बच्चों के अपहरण और गुमशुदगी के मामलों में मानक जांच प्रक्रिया, समयबद्ध कार्रवाई, डिजिटल निगरानी और विशेष अदालतों जैसी व्यवस्थाओं पर है। आगे अदालत की कार्यवाही और केंद्र तथा राज्यों के जवाब के आधार पर यह स्पष्ट होगा कि इन सुझावों पर किस तरह की दिशा तय होती है।

बच्चे के लापता होने का मामला किसी भी परिवार के लिए बेहद गंभीर स्थिति होती है। ऐसे मामलों में शुरुआती घंटों में पुलिस की सक्रियता, तेजी से सूचना प्रसारित करना, डिजिटल और तकनीकी सुरागों की जांच तथा दूसरे जिलों और राज्यों के साथ समन्वय बच्चे की सुरक्षित बरामदगी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यदि देशभर में एक स्पष्ट और समान जांच प्रोटोकॉल तैयार किया जाता है, तो इससे जांच की गति, जवाबदेही और अंतरराज्यीय सहयोग को मजबूत करने में मदद मिल सकती है। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई और केंद्र तथा राज्यों की प्रतिक्रिया पर नजर रहेगी।

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