भुज के खंडहरों से शुरू हुई एक प्रशासनिक यात्रा

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प्रेम शंकर झा, एडीआरएम, मुरादाबाद

25 वर्ष पहले नरेन्द्र मोदी के सामने केवल सत्ता संभालने की चुनौती नहीं थी, एक आपदा से जूझ रहे राज्य को फिर से खड़ा करने की जिम्मेदारी थी। 7 अक्टूबर 2001 को नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उस समय गुजरात सामान्य राजनीतिक परिस्थितियों से नहीं गुजर रहा था। कुछ ही महीने पहले आए विनाशकारी भूकंप ने कच्छ और विशेष रूप से भुज को लगभग तहस- नहस कर दिया था। हजारों लोगों की जान गई थी, लाखों लोग प्रभावित हुए थे और सड़क, बिजली, पानी तथा सार्वजनिक भवनों का बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त था। नरेन्द्र मोदी के 25 वर्ष के प्रशासनिक सफर को समझने के लिए मेरे विचार में शुरुआत इसी बिंदु से होनी चाहिए। उन्होंने जिस समय गुजरात की कमान संभाली, उस समय पहली आवश्यकता कोई बड़ी विकास योजना शुरू करने की नहीं थी। प्राथमिकता थी कि सरकार की मशीनरी को फिर से सक्रिय किया जाए और यह भरोसा पैदा किया जाए कि संकट की घड़ी में राज्य अपने नागरिकों के साथ खड़ा है।

मोदी संगठन की राजनीति से मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे थे। सरकार चलाने का उनका प्रत्यक्ष अनुभव सीमित था। ऐसे में भूकंप के बाद पुनर्वास और पुनर्निर्माण उनके प्रशासनिक नेतृत्व की पहली बड़ी परीक्षा बन गया। मकानों के पुनर्निर्माण से लेकर सड़कों और सार्वजनिक संस्थानों की बहाली तक, सरकार को एक साथ कई मोर्चों पर काम करना था। इसी दौर में उनकी प्रशासनिक शैली की पहली स्पष्ट झलक दिखाई देने लगी। सरकारी बैठकों में सामान्य प्रगति रिपोर्ट के बजाय आंकड़ों पर जोर बढ़ा। कितने मकान बने, कितने परिवारों का पुनर्वास हुआ, कितना काम पूरा हुआ और कहां अड़चन है, ऐसे प्रश्न प्रशासनिक समीक्षा का हिस्सा बनने लगे। अधिकारियों से लक्ष्य और समय-सीमा के आधार पर जवाब मांगने की प्रवृत्ति आगे चलकर मोदी की कार्यशैली की पहचान बनी।

लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में उनका पहला वर्ष केवल प्राकृतिक आपदा से निपटने तक सीमित नहीं रहा। 27 फरवरी 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एक डिब्बे में आग लगने के बाद गुजरात में व्यापक सांप्रदायिक हिंसा हुई। इस हिंसा ने राज्य को एक गहरे सामाजिक और राजनीतिक संकट में डाल दिया। सरकार की भूमिका, पुलिस की कार्रवाई और प्रशासन की प्रतिक्रिया पर देश और विदेश में तीखी बहस हुई।

गोधरा और उसके बाद हुई हिंसा नरेन्द्र मोदी के सार्वजनिक जीवन से जुड़ा सबसे विवादित अध्याय बन गई। वर्षों तक चली जांच और न्यायिक प्रक्रिया में उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की पड़ताल हुई। सप्रीम कोर्ट की निगरानी में गठित विशेष जांच दल ने भी मामले की जांच की। बाद की न्यायिक प्रक्रिया में मोदी के खिलाफ अभियोजन योग्य व्यक्तिगत आपराधिक संलिप्तता स्थापित नहीं हुई। हालांकि, 2002 की हिंसा की सामाजिक और राजनीतिक स्मृति भारतीय राजनीति में आज भी बनी हुई है। इसके बाद दिसंबर 2002 में गुजरात विधानसभा के चुनाव हुए। भाजपा ने 182 सदस्यीय विधानसभा में 127 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। इस परिणाम ने मोदी सरकार को राजनीतिक स्थिरता दी और अगले चरण में प्रशासनिक तथा आर्थिक नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए मजबूत आधार उपलब्ध कराया। पीछे मुड़कर देखता हूं तो वर्ष 2001 से 2002 का दौर नरेन्द्र मोदी के लिए किसी तैयार शासन मॉडल को लागू करने का समय नहीं था। यह वह समय था जब उनकी अपनी प्रशासनिक शैली बन रही थी। संकट के बीच त्वरित निर्णय, अधिकारियों की नियमित समीक्षा और काम को आंकड़ों के आधार पर परखने की आदत इसी दौर में मजबूत हुई।

मेरे लिए इस अवधि का महत्व इसी में है। भुज का पुनर्निर्माण केवल एक राहत अभियान नहीं था। उसने सरकार को यह सिखाया कि बड़े संकट में प्रशासन की सफलता केवल धन उपलब्ध कराने से नहीं, बल्कि विभागों के बीच समन्वय, समयबद्ध क्रियान्वयन और लगातार निगरानी से तय होती है।

यही अनुभव आगे के वर्षों में गुजरात के शासन मॉडल की आधारभूमि बना। राजनीतिक स्थिरता मिलने के बाद अब मोदी के सामने अगला प्रश्न था कि इस प्रशासनिक मशीनरी को दीर्घकालिक विकास के लिए किस तरह बदला जाए। वर्ष 2001 में उन्होंने एक संकटग्रस्त राज्य की कमान संभाली थी। 2002 के अंत तक उनके पास एक स्पष्ट राजनीतिक जनादेश था। अब गुजरात में शासन को संस्थागत रूप देने का दौर शुरू होना था। यही नरेन्द्र मोदी के 25 वर्ष के सफर का दूसरा अध्याय बना।

2 thoughts on “भुज के खंडहरों से शुरू हुई एक प्रशासनिक यात्रा”

  1. Bahut sundar byakhyaan sam-samayik vastu sthiti ka aapne badi hi saral bhasha me prastut kiya, saath me prashnik anubhav ke liye bhi tips diye. Dhanyavaad Jha Ji

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