भारत में पेट्रोल-डीजल संकट की आहट? सऊदी तेल सप्लाई बाधित होने से बढ़ी चिंता

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भारत की कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है। रिपोर्टों के मुताबिक, सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी सऊदी अरामको ने भारतीय रिफाइनरियों को नियमित रूप से होने वाली कच्चे तेल की आपूर्ति फिलहाल रोक दी है। यह घटनाक्रम सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट ऑयल पाइपलाइन से जुड़े पंपिंग स्टेशनों पर हुए ड्रोन हमलों के बाद सामने आया है। इस व्यवधान के कारण सऊदी अरब की तेल आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हुई है और इसका असर उसके प्रमुख ग्राहकों तक पहुंचने वाली खेपों पर भी पड़ रहा है। भारतीय रिफाइनरियों के लिए इसका मतलब है कि उन्हें अपनी जरूरत पूरी करने के लिए दूसरे स्रोतों से अतिरिक्त कच्चा तेल खरीदना पड़ सकता है।

रिपोर्टों में उद्योग से जुड़े सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि अरामको ने भारतीय रिफाइनरों को अगली सूचना तक कुछ नियमित कच्चे तेल की आपूर्ति रोकने की जानकारी दी है। सऊदी अरामको आम तौर पर भारत सहित अपने प्रमुख ग्राहकों को दीर्घकालिक या वार्षिक अनुबंधों के तहत कच्चा तेल उपलब्ध कराती है। इन अनुबंधों में तेल की मात्रा और कीमत से जुड़ी व्यवस्था पहले से निर्धारित होती है। मौजूदा परिस्थितियों में इन नियमित आपूर्तियों में व्यवधान आने के बाद भारतीय रिफाइनरियों को वैकल्पिक कार्गो की तलाश करनी पड़ रही है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत में कच्चे तेल की आपूर्ति पूरी तरह बंद हो गई है या देश में तत्काल पेट्रोल-डीजल की कमी पैदा हो गई है।

इस घटनाक्रम के पीछे सऊदी अरब की करीब 1,200 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट ऑयल पाइपलाइन महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह पाइपलाइन सऊदी अरब के पूर्वी तेल क्षेत्रों से कच्चे तेल को पश्चिमी तट पर स्थित यानबू तक पहुंचाती है। यानबू से तेल को लाल सागर के रास्ते अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक भेजा जा सकता है। ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया में संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़ी अनिश्चितताओं के कारण समुद्री तेल परिवहन पहले ही दबाव में है, ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन सऊदी अरब के लिए एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक मार्ग मानी जाती है। पंपिंग स्टेशनों पर हमले के बाद इस व्यवस्था में व्यवधान आने से सऊदी अरब की तेल निर्यात क्षमता और आपूर्ति प्रबंधन पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।

भारत के लिए सऊदी अरब की तेल आपूर्ति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी घरेलू ईंधन जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। सऊदी अरब लंबे समय से भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा है। पश्चिम एशिया में मौजूदा संकट के दौरान भी सऊदी तेल ने भारतीय रिफाइनरियों की कच्चे तेल की जरूरत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पूरा किया है। इसलिए यदि सऊदी अरामको की नियमित आपूर्ति लंबे समय तक बाधित रहती है, तो भारतीय रिफाइनरियों को अपनी खरीद रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है।

फिलहाल सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की उपलब्धता के साथ-साथ उसकी कीमत को लेकर है। अगर भारतीय रिफाइनरियों को सऊदी अरब से मिलने वाली नियमित खेपों के बदले स्पॉट मार्केट से तेल खरीदना पड़ता है, तो उन्हें ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसी बड़े तेल उत्पादक की आपूर्ति बाधित होने पर उपलब्ध कार्गो की कीमत बढ़ सकती है। इसके साथ ही टैंकरों की मांग बढ़ने पर समुद्री परिवहन लागत भी ऊपर जा सकती है। ऐसे में भारत के लिए आयातित कच्चे तेल की वास्तविक लागत केवल अंतरराष्ट्रीय क्रूड कीमत से नहीं बल्कि शिपिंग और अन्य लॉजिस्टिक खर्चों से भी प्रभावित हो सकती है।

हालांकि, कुछ रिपोर्टों में यह भी संकेत दिया गया है कि सऊदी तेल की आपूर्ति पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। सऊदी अरब की ओर से कुछ स्पॉट कार्गो ट्रेडर्स को बेचे जाने की जानकारी सामने आई है। ऐसे कार्गो अलग-अलग व्यापारिक चैनलों के जरिए भारतीय रिफाइनरियों तक पहुंच सकते हैं। कुछ कारोबारी इराकी कच्चे तेल जैसे वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीदकर उसे भारत तक पहुंचाने की व्यवस्था भी तलाश रहे हैं। हालांकि ऐसी वैकल्पिक आपूर्ति नियमित टर्म कॉन्ट्रैक्ट की तुलना में अधिक जटिल और महंगी हो सकती है।

इस स्थिति का असर पेट्रोल और डीजल की घरेलू कीमतों पर पड़ेगा या नहीं, यह अभी निश्चित नहीं है। भारतीय रिफाइनरियां आम तौर पर कई देशों से कच्चा तेल खरीदती हैं और जरूरत पड़ने पर अपनी खरीद का स्रोत बदल सकती हैं। यदि सऊदी आपूर्ति में व्यवधान सीमित अवधि का रहता है और दूसरे देशों से पर्याप्त तेल उपलब्ध हो जाता है, तो इसका असर सीमित रह सकता है। लेकिन यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहता है, सऊदी आपूर्ति बाधित रहती है और वैकल्पिक कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहती हैं, तो भारतीय रिफाइनरियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सऊदी तेल आपूर्ति से जुड़ी खबरों का असर दिखाई दिया है। ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन में व्यवधान और क्षेत्र में लगातार हमलों की खबरों ने बाजार में आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ाई। इसके चलते कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा गया। हालांकि बाजार केवल आपूर्ति बाधित होने की खबरों पर निर्भर नहीं करता। यदि सऊदी अरब वैकल्पिक रास्तों के जरिए अतिरिक्त तेल उपलब्ध कराने में सफल रहता है या दूसरे उत्पादक देश अपनी आपूर्ति बढ़ाते हैं, तो कीमतों पर दबाव कुछ कम हो सकता है।

भारत के लिए मौजूदा स्थिति इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि देश को एक साथ कई स्रोतों से कच्चे तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करनी पड़ रही है। पश्चिम एशिया से आने वाली आपूर्ति में व्यवधान के अलावा रूस से तेल खरीद से जुड़े अंतरराष्ट्रीय दबाव और समुद्री परिवहन की बढ़ती लागत भी भारतीय रिफाइनरियों के लिए महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। ऐसे में भारत को इराक, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और अन्य उत्पादक देशों से अतिरिक्त कार्गो हासिल करने की संभावनाओं पर ध्यान देना पड़ सकता है।

फिलहाल इसे भारत में तत्काल पेट्रोल-डीजल संकट के रूप में देखना सही नहीं होगा। देश के पास कच्चे तेल की खरीद के कई स्रोत हैं और भारतीय रिफाइनिंग कंपनियां वैश्विक बाजार से तेल खरीदने में सक्षम हैं। लेकिन सऊदी अरामको की नियमित आपूर्ति में आया व्यवधान भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी जरूर है। यदि पाइपलाइन की स्थिति जल्द सामान्य नहीं होती और पश्चिम एशिया में हमले तथा समुद्री मार्गों से जुड़े जोखिम जारी रहते हैं, तो भारत के लिए कच्चे तेल की खरीद और परिवहन की लागत बढ़ सकती है। आने वाले दिनों में सबसे अहम बात यह होगी कि सऊदी अरब अपनी निर्यात व्यवस्था को कितनी जल्दी सामान्य करता है और भारतीय रिफाइनरियों को वैकल्पिक स्रोतों से कितनी मात्रा में कच्चा तेल प्रतिस्पर्धी कीमत पर मिल पाता है।

रिपोर्टों में भारतीय रिफाइनरियों को अरामको की नियमित आपूर्ति रुकने की जानकारी मुख्य रूप से उद्योग से जुड़े सूत्रों के हवाले से दी गई है। इसलिए इस खबर को प्रकाशित करते समय यह स्पष्ट रखना जरूरी है कि सऊदी तेल की पूरी आपूर्ति भारत के लिए बंद नहीं हुई है और न ही देश में तत्काल ईंधन संकट की पुष्टि हुई है। मौजूदा घटनाक्रम मुख्य रूप से नियमित आपूर्ति में व्यवधान और वैकल्पिक कच्चे तेल की संभावित बढ़ती लागत से जुड़ा है। आगे की स्थिति सऊदी तेल निर्यात व्यवस्था, पश्चिम एशिया के सुरक्षा हालात और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल बाजार की दिशा पर निर्भर करेगी।

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