आठवां वर्ष: फैसलों की रफ्तार से उद्योग और गांव दोनों बदले

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प्रेम शंकर झा, आइआरएसएस

किसी सरकार की प्रशासनिक क्षमता का सबसे स्पष्ट प्रमाण तब मिलता है, जब वह किसी अवसर को पहचानने के बाद उसे परिणाम में बदलने की गति दिखाती है। लेकिन शासन की परिपक्वता की दूसरी कसौटी यह है कि वही गति समाज के उस हिस्से तक भी पहुंचे, जहां बड़े निवेश और औद्योगिक परियोजनाओं की चमक दिखाई नहीं देती। गुजरात में 2008-09 का वर्ष इसी दोहरे विस्तार का समय था। एक ओर राज्य बड़े औद्योगिक निवेश के लिए अपनी प्रशासनिक तैयारी और निर्णय क्षमता को सामने ला रहा था, दूसरी ओर वही सरकार तकनीक को गांव की पंचायत तक ले जाकर सामान्य नागरिक के लिए सरकारी सेवाओं की दूरी कम कर रही थी। सात अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद माननीय नरेन्द्र मोदी जी के आठवें वर्ष तक पिछले वर्षों की कई पहलों ने अपना आधार तैयार कर लिया था। बिजली, सड़क, बंदरगाह, औद्योगिक क्षेत्र और ई-गवर्नेंस अब अलग-अलग प्रयोग नहीं रह गए थे। इनके बीच एक ऐसी प्रशासनिक कड़ी बन रही थी, जिसमें राज्य की आर्थिक क्षमता और नागरिक सेवाओं को साथ-साथ मजबूत करने की कोशिश दिखाई देती थी। अक्टूबर 2008 में टाटा मोटर्स ने नैनो कार के लिए अपना नया संयंत्र साणंद में लगाने की घोषणा की। कंपनी ने करीब 1100 एकड़ में मदर प्लांट और वेंडर पार्क विकसित करने की योजना बनाई। शुरुआती उत्पादन क्षमता ढाई लाख कार प्रतिवर्ष रखी गई थी, जिसे पांच लाख तक बढ़ाया जा सकता था। कंपनी के अनुसार पूरे प्रोजेक्ट से 10 हजार से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होने की संभावना थी।

लेकिन साणंद की कहानी केवल एक कारखाना गुजरात आने की कहानी नहीं थी। इसकी असली प्रशासनिक अहमियत उस तैयारी में थी जो किसी बड़े निवेश को जमीन पर उतारने के लिए आवश्यक होती है। टाटा मोटर्स ने उस समय स्पष्ट रूप से कहा था कि साणंद में राज्य सरकार के पास पहले से उपलब्ध जमीन और गुजरात सरकार की पेशकश से परियोजना को कम समय में और कम अतिरिक्त लागत के साथ स्थापित करने में मदद मिलेगी। यानी राज्य की प्रशासनिक क्षमता अब निवेशक के निर्णय का हिस्सा बन चुकी थी। यहीं पिछले वर्षों की कहानी का परिणाम दिखाई देता है। पहले बिजली को मजबूत किया गया, फिर औद्योगिक क्षेत्रों और बंदरगाहों का विस्तार हुआ, सड़क और परिवहन का ढांचा तैयार हुआ और निवेश के लिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं को अधिक सक्रिय बनाया गया। साणंद में नैनो का आना इन व्यवस्थाओं की संयुक्त उपयोगिता का एक बड़ा उदाहरण था। उद्योग को केवल जमीन नहीं चाहिए थी; उसे बिजली, सड़क, आपूर्ति श्रृंखला, कुशल श्रम और समय पर निर्णय भी चाहिए थे। गुजरात में इन सबको एक साथ देखने की प्रशासनिक आदत बन चुकी थी। साणंद का प्रभाव आगे चलकर एक परियोजना से कहीं बड़ा हुआ। टाटा मोटर्स का संयंत्र 2010 में उत्पादन के लिए तैयार हुआ और बाद के वर्षों में साणंद गुजरात के ऑटोमोबाइल उद्योग के महत्वपूर्ण केंद्रों में शामिल हुआ। टाटा मोटर्स ने स्वयं बाद में कहा कि 1100 एकड़ में फैले उसके साणंद संयंत्र ने राज्य के ऑटोमोबाइल उद्योग के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस औद्योगिक कहानी के समानांतर गुजरात में एक दूसरी, कम दिखाई देने वाली क्रांति चल रही थी। वह थी गांव को डिजिटल शासन से जोड़ने की। ई-ग्राम विश्वग्राम परियोजना के तहत ग्राम पंचायतों को डिजिटल नेटवर्क से जोड़ने का काम 2008 से आगे बढ़ा। गुजरात सरकार के अनुसार ई-ग्राम नेटवर्क में ग्राम पंचायतों को वी-सैट ब्रॉडबैंड से जोड़ा गया और पंचायत स्तर पर कंप्यूटर, प्रिंटर, स्कैनर, वेबकैम तथा इंटरनेट जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। आज इस नेटवर्क में 14,006 ई-ग्राम केंद्र दर्ज हैं, लेकिन इसकी मूल डिजिटल कनेक्टिविटी व्यवस्था 2008 से काम कर रही थी। इसका महत्व उस समय के भारत को ध्यान में रखकर समझना चाहिए। आज ऑनलाइन प्रमाणपत्र, भूमि रिकॉर्ड और सरकारी आवेदन सामान्य बात लगते हैं। 2008 में गांव की पंचायत को डिजिटल सेवा केंद्र में बदलना बिल्कुल अलग तरह की प्रशासनिक सोच थी। ई-ग्राम के जरिए ग्रामीण नागरिकों को सरकारी सेवाएं स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था विकसित की गई। भूमि रिकॉर्ड जैसी महत्वपूर्ण जानकारी भी पंचायत स्तर पर उपलब्ध कराने की दिशा में काम हुआ। इसका सीधा अर्थ था कि नागरिक को हर छोटी सरकारी जरूरत के लिए तहसील या जिला मुख्यालय की यात्रा न करनी पड़े। इस प्रयोग की राष्ट्रीय पहचान भी उसी समय बनने लगी। 2008 में ई-ग्राम विश्वग्राम को कंप्यूटर सोसाइटी ऑफ इंडिया ने उत्कृष्ट परियोजना के रूप में सम्मानित किया। इसी वर्ष इसे एसकेओच पुरस्कार में डिजिटल समावेशन की श्रेणी में भी सम्मान मिला। गांधीनगर के जन सेवा केंद्र को स्टॉकहोम चैलेंज अवार्ड मिला और राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस सम्मेलन में गुजरात की वैट सूचना प्रणाली को सरकारी प्रक्रिया के पुनर्गठन के लिए सिल्वर आइकन से सम्मानित किया गया।

इन पुरस्कारों की सूची से अधिक महत्वपूर्ण उनकी दिशा थी। एक तरफ गुजरात निवेश और औद्योगिक आधारभूत ढांचे के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पहचाना जा रहा था, दूसरी तरफ उसकी प्रशासनिक तकनीक नागरिक सेवा, स्वास्थ्य, कर व्यवस्था और गांव तक पहुंच रही थी। यानी तकनीक का इस्तेमाल केवल उद्योग को सुविधा देने के लिए नहीं, सरकार की अपनी कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए भी किया जा रहा था।

2008-09 में इसका एक और महत्वपूर्ण पक्ष सामने आया। ई-गवर्नेंस का अर्थ केवल कंप्यूटर लगाने तक सीमित नहीं रहा। प्रशासनिक प्रक्रिया को ही डिजिटल रूप देने की कोशिश शुरू हुई। ई-प्रोक्योरमेंट को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल चुकी थी। स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली को पुरस्कार मिला। ई-ग्राम ने गांव तक पहुंच बनाई। यह एक ऐसी श्रृंखला थी जिसमें सरकार के काम करने का तरीका धीरे-धीरे बदल रहा था।

इसलिए साणंद और ई-ग्राम को दो अलग-अलग कहानियां मानना इस वर्ष के महत्व को छोटा कर देगा। साणंद में प्रशासन ने यह दिखाया कि बड़े निवेश के सामने निर्णय की गति कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। ई-ग्राम में उसी प्रशासन ने यह दिखाया कि तकनीक के माध्यम से शासन की दूरी भी घटाई जा सकती है। एक तरफ पूंजी और उत्पादन को राज्य तक लाने की कोशिश थी, दूसरी तरफ नागरिक सेवा को नागरिक तक ले जाने की। यही वह बिंदु है जहां 2008-09 नरेन्द्र मोदी के कार्यकारी सफर में एक अलग अर्थ ग्रहण करता है। पहले वर्षों में प्रशासनिक क्षमता बनाई गई थी। छठे वर्ष में उसे समीक्षा और परिणाम से जोड़ा गया। सातवें वर्ष में निरंतरता ने लंबी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने का अवसर दिया। आठवें वर्ष में वही क्षमता गति और पहुंच में दिखाई देने लगी। साणंद इसका औद्योगिक चेहरा था और ई-ग्राम उसका नागरिक चेहरा। किसी राज्य के लिए औद्योगिक निवेश महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण वह प्रशासनिक क्षमता है जो निवेश को टिकाऊ आर्थिक गतिविधि में बदल सके। उसी तरह डिजिटल सेवा का मूल्य कंप्यूटर और नेटवर्क की संख्या में नहीं, बल्कि उस दूरी में है जो नागरिक और सरकार के बीच कम होती है। गुजरात में 2008-09 का प्रयोग इन दोनों कसौटियों पर एक साथ आगे बढ़ता दिखाई देता है। इस वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि इसलिए नैनो संयंत्र या ई-ग्राम में अलग-अलग नहीं थी। असली बदलाव उस शासन-दृष्टि में था जिसमें गति केवल बड़े उद्योग के लिए नहीं और तकनीक केवल सरकारी दफ्तर के लिए नहीं रही। निर्णय को तेज करना और सेवा को निकट लाना, दोनों को प्रशासन की जिम्मेदारी माना गया। यही वह सोच थी जिसने गुजरात की प्रशासनिक पहचान को अगले चरण के लिए तैयार किया।

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