प्रेम शंकर झा, आईआरएसएस
किसी राज्य की आर्थिक सफलता का सबसे कठिन चरण उस समय शुरू होता है, जब तेज वृद्धि स्वयं एक नई चुनौती बन जाती है। उद्योग बढ़ने लगें, बंदरगाहों पर माल बढ़ने लगे और निवेशकों की रुचि लगातार बनी रहे, तो सरकार के सामने अगला सवाल केवल अधिक निवेश लाने का नहीं रहता। उसे यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि सड़कें उस माल को बाजार तक पहुंचा सकें, बिजली और पानी बढ़ती अर्थव्यवस्था की जरूरत पूरी कर सकें, कृषि को भी नई आर्थिक गतिविधियों का लाभ मिले और प्रशासन बढ़ते काम के साथ उतनी ही तेजी से बदल सके। गुजरात में 2009-10 का वर्ष इसी बदलाव का महत्वपूर्ण पड़ाव था।
सात अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद माननीय नरेन्द्र मोदी जी का नौवां वर्ष 2009 से 2010 के बीच आया। उस समय गुजरात की अर्थव्यवस्था राष्ट्रीय स्तर पर तेजी से अपनी पहचान बना रही थी। दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान राज्य ने औसतन 10.4 प्रतिशत वार्षिक आर्थिक वृद्धि दर्ज की, जबकि निर्धारित लक्ष्य 10.2 प्रतिशत था। 2008-09 में राज्य के सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 12.8 प्रतिशत रही। वैश्विक आर्थिक मंदी के दौर में यह प्रदर्शन गुजरात की आर्थिक संरचना की मजबूती का संकेत माना गया। लेकिन आंकड़े अपने आप में कहानी पूरी नहीं करते। इतनी तेज आर्थिक गतिविधि के साथ राज्य को एक ऐसी आधारभूत संरचना चाहिए थी जो उत्पादन को बाजार से जोड़ सके। इसी जरूरत ने सड़क और बंदरगाहों को गुजरात की आर्थिक रणनीति के केंद्र में ला दिया।
2009-10 में गुजरात स्टेट रोड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के माध्यम से कई बड़े सड़क प्रोजेक्ट सार्वजनिक-निजी भागीदारी के आधार पर आगे बढ़ाए गए। समाखियाली-गांधीधाम मार्ग के विस्तार और गांधीधाम-मुंद्रा पोर्ट मार्ग के चौड़ीकरण जैसी परियोजनाओं को मंजूरी मिली। अहमदाबाद-गोधरा और आगे मध्य प्रदेश सीमा तक सड़क संपर्क तथा सूरत-हजीरा पोर्ट से जुड़े मार्गों के विस्तार पर भी काम आगे बढ़ा। इन परियोजनाओं का उद्देश्य केवल यातायात सुगम करना नहीं था। इनके जरिए गुजरात के औद्योगिक क्षेत्रों को बंदरगाहों और राष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने की एक व्यापक व्यवस्था तैयार की जा रही थी। गुजरात की भौगोलिक स्थिति ने इस नीति को विशेष महत्व दिया। राज्य के पास लंबी समुद्री तटरेखा थी और कई महत्वपूर्ण बंदरगाह विकसित हो रहे थे। लेकिन बंदरगाह तभी आर्थिक परिसंपत्ति बनता है, जब वहां आने-जाने वाले माल के लिए पीछे पर्याप्त सड़क और रेल नेटवर्क हो। इसलिए मुंद्रा या हजीरा जैसे बंदरगाहों को उनके आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों से जोड़ना एक अलग परियोजना नहीं, बल्कि पूरे आर्थिक तंत्र को मजबूत करने का हिस्सा था। इसी समय निवेश की प्रकृति भी बदल रही थी। 2009 के वाइब्रेंट गुजरात निवेश सम्मेलन में कृषि और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में 190 समझौता ज्ञापन हुए, जिनमें लगभग 35,456 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव और करीब 3.89 लाख संभावित रोजगार दर्ज किए गए। जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भी 30 समझौता ज्ञापनों के तहत करीब 2,508 करोड़ रुपये के प्रस्ताव सामने आए। ये समझौते वास्तविक निवेश के बराबर नहीं थे, लेकिन उन्होंने यह जरूर दिखाया कि गुजरात अपनी अर्थव्यवस्था को पारंपरिक उद्योगों से आगे नए क्षेत्रों तक ले जाने की कोशिश कर रहा था। कृषि और खाद्य प्रसंस्करण को एक साथ देखने का महत्व खास था। किसान के लिए उत्पादन तभी आर्थिक लाभ में बदलता है, जब उसके बाद भंडारण, प्रसंस्करण, परिवहन और बाजार की व्यवस्था हो। इस तरह कृषि को उद्योग से जोड़ने की सोच केवल खेत की उत्पादकता बढ़ाने तक सीमित नहीं रही। मूल्यवर्धन और बाजार तक पहुंच भी आर्थिक नीति का हिस्सा बनने लगी।
पानी के मोर्चे पर भी इसी तरह व्यापक दृष्टि की जरूरत थी। गुजरात के 2009-10 के जल संसाधन प्रशासनिक प्रतिवेदन में जल संरक्षण, सूक्ष्म सिंचाई, नहरों के सुदृढ़ीकरण, सहभागी सिंचाई प्रबंधन और जीआईएस आधारित जल संसाधन मानचित्रण जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख है। नर्मदा नहर नेटवर्क के विस्तार के साथ राज्य में पानी को कृषि, उद्योग और ग्रामीण जरूरतों से जोड़कर देखने की आवश्यकता बढ़ रही थी। यह वह दौर था जब जल प्रबंधन को केवल सिंचाई विभाग का विषय न मानकर व्यापक संसाधन प्रबंधन के रूप में देखने की कोशिश हुई। प्रशासन में तकनीक का इस्तेमाल भी इसी समय अधिक परिपक्व हो रहा था। गुजरात की ई-गवर्नेंस पहलों को 2009 में राष्ट्रीय स्तर पर कई पुरस्कार मिले। अहमदाबाद नगर निगम की ई-सिटी परियोजना को गोल्ड आइकन मिला और आनंद कृषि विश्वविद्यालय की ई-कृषि-किरण सेवा को नागरिक केंद्रित सेवा वितरण के लिए सम्मानित किया गया। इन पहलों का महत्व इस बात में था कि तकनीक का उपयोग केवल सरकारी रिकॉर्ड रखने के लिए नहीं, बल्कि नागरिकों और किसानों तक सीधे सेवाएं पहुंचाने के लिए किया जा रहा था। इस पूरी तस्वीर में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है। गुजरात की आर्थिक नीति अब केवल “उद्योग लाने” तक सीमित नहीं थी। उद्योग के लिए सड़क चाहिए थी, सड़क को बंदरगाह से जोड़ना था, बंदरगाह को बाजार से जोड़ना था, कृषि को प्रसंस्करण से जोड़ना था और नागरिक सेवाओं को तकनीक से जोड़ना था। आर्थिक विस्तार के साथ प्रशासनिक प्रणालियों को भी उसी अनुपात में विस्तृत और आधुनिक बनाना पड़ रहा था। नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्री के रूप में 2009-10 का नौवां वर्ष इसलिए महत्वपूर्ण था कि गुजरात की आर्थिक पहचान अब केवल निवेश प्रस्तावों या औद्योगिक परियोजनाओं से नहीं बन रही थी। उसके पीछे एक ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था तैयार करने का प्रयास था जो बढ़ती अर्थव्यवस्था की जरूरतों के साथ चल सके। सड़क और बंदरगाह आर्थिक संपर्क के साधन बन रहे थे, कृषि को मूल्य श्रृंखला से जोड़ने की कोशिश हो रही थी और डिजिटल तकनीक सरकारी सेवाओं को नागरिक के करीब ला रही थी।
किसी राज्य के लिए तेज आर्थिक वृद्धि एक अवसर है, लेकिन उसे स्थायी क्षमता में बदलना प्रशासन की असली परीक्षा होती है। 2009-10 में गुजरात इसी परीक्षा के अगले चरण में प्रवेश कर चुका था। आर्थिक ताकत को आधारभूत ढांचे, तकनीक, कृषि और प्रशासनिक क्षमता के साथ जोड़कर एक ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश हो रही थी, जिसमें वृद्धि केवल आंकड़ा न रह जाए, बल्कि राज्य की संस्थागत क्षमता में भी दिखाई दे।




