प्रेम शंकर झा, आइआरएसएस
2010-11 तक गुजरात की आर्थिक तस्वीर में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देने लगा था। राज्य की कहानी अब केवल अहमदाबाद, सूरत या औद्योगिक निवेश के आंकड़ों से नहीं समझी जा सकती थी। गांवों में सिंचाई का विस्तार, खेतों में बदलता फसल चक्र, ग्रामीण बिजली की बेहतर उपलब्धता और समुद्र तट पर बढ़ती माल ढुलाई, ये सब मिलकर गुजरात की अर्थव्यवस्था का एक नया भूगोल बना रहे थे। खेत और बाजार के बीच की दूरी कम हो रही थी और बंदरगाह इस बढ़ती आर्थिक गतिविधि के बड़े द्वार बन रहे थे।
सात अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद माननीय नरेन्द्र मोदी जी का दसवां वर्ष 2010 से 2011 के बीच आया। यह वह समय था जब एक दशक के दौरान तैयार की गई कई आधारभूत व्यवस्थाओं का असर अब आंकड़ों में अधिक स्पष्ट होकर दिखाई देने लगा था। खासकर कृषि में आया बदलाव इस बात का संकेत था कि गुजरात की आर्थिक कहानी को केवल औद्योगिक विकास के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा। गुजरात की भौगोलिक चुनौती आसान नहीं थी। राज्य के बड़े हिस्से में वर्षा कम और असमान थी। सौराष्ट्र, कच्छ और उत्तर गुजरात के अनेक क्षेत्रों में खेती लंबे समय तक मानसून की अनिश्चितता पर निर्भर रही। इसलिए कृषि उत्पादन बढ़ाने का प्रश्न मूल रूप से पानी के प्रबंधन का प्रश्न था। सरदार सरोवर परियोजना की नहर प्रणाली के विस्तार और उससे जुड़ी वितरण व्यवस्था ने इस चुनौती का एक बड़ा उत्तर तैयार किया। नर्मदा का पानी उन इलाकों तक ले जाने की कोशिश की जा रही थी जहां सिंचाई की स्थायी व्यवस्था लंबे समय से सीमित थी। इसके साथ सुजलाम सुफलाम जैसी जल संरचनाओं और जल संरक्षण कार्यक्रमों ने वर्षा के पानी को रोकने तथा भूजल स्तर को बेहतर करने पर जोर दिया। 2010-11 के जल संसाधन विभाग के कार्यक्रमों में सूक्ष्म सिंचाई, नहरों के सुदृढ़ीकरण, जल संरक्षण और सिंचाई व्यवस्था के विस्तार को प्रमुखता दी गई। यानी कृषि नीति का केंद्र केवल अधिक उत्पादन नहीं था; उसके पीछे पानी की उपलब्धता को स्थायी बनाने की कोशिश थी। इसका असर खेती के स्वरूप पर पड़ा। गुजरात में कपास, गेहूं, मूंगफली, फल और सब्जियों सहित कई कृषि उत्पादों के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। कपास उत्पादन, जो 2002-03 में करीब 30 लाख गांठ के आसपास था, कुछ ही वर्षों में कई गुना बढ़ गया। गेहूं उत्पादन में भी तेज वृद्धि दर्ज हुई। सिंचाई की उपलब्धता बढ़ने के साथ किसान उन फसलों की ओर भी बढ़ सके जिनमें बेहतर बाजार मूल्य मिलने की संभावना थी। यहीं ज्योतिग्राम योजना का महत्व सामने आता है। खेती को पानी चाहिए था, लेकिन सिंचाई व्यवस्था के लिए बिजली की उपलब्धता भी उतनी ही जरूरी थी। ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति को अलग फीडरों के माध्यम से व्यवस्थित करने से कृषि और घरेलू बिजली की जरूरतों को अलग-अलग ढंग से प्रबंधित करने की क्षमता बनी। खेत के लिए बिजली की उपलब्धता अधिक नियोजित हुई और गांवों में घरेलू बिजली आपूर्ति को भी अपेक्षाकृत स्थिर बनाने की कोशिश हुई।
पानी और बिजली की इन व्यवस्थाओं ने कृषि को केवल जीविका का साधन मानने के बजाय ग्रामीण अर्थव्यवस्था के एक उत्पादक क्षेत्र के रूप में देखने की संभावना बढ़ाई। जब सिंचाई सुनिश्चित होती है, बिजली उपलब्ध रहती है और बाजार तक पहुंच बेहतर होती है, तब किसान केवल मानसून के भरोसे नहीं रहता। वह फसल, निवेश और उत्पादन के बारे में अपेक्षाकृत लंबी अवधि का निर्णय ले सकता है। इसी आर्थिक विस्तार का दूसरा सिरा गुजरात के समुद्री तट पर दिखाई दे रहा था। गुजरात मैरीटाइम बोर्ड के अधीन बंदरगाहों पर माल ढुलाई तेजी से बढ़ रही थी। 2009-10 में करीब 205.5 मिलियन टन माल संभालने के बाद 2010-11 में यह आंकड़ा लगभग 230.9 मिलियन टन तक पहुंच गया। निजी बंदरगाहों और निजी जेटियों की बढ़ती भूमिका ने गुजरात के समुद्री ढांचे को पारंपरिक सरकारी बंदरगाह व्यवस्था से आगे एक बड़े औद्योगिक नेटवर्क का हिस्सा बना दिया। इस मॉडल की खासियत केवल बंदरगाहों की संख्या या माल ढुलाई नहीं थी। बंदरगाहों को सड़क, रेल, औद्योगिक क्षेत्रों और ऊर्जा परियोजनाओं से जोड़कर देखा जा रहा था। इसका अर्थ था कि गुजरात में उत्पादन का एक हिस्सा सीधे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जुड़ सकता था। पेट्रोकेमिकल, ऊर्जा, खनिज, कृषि और विनिर्माण से जुड़ी गतिविधियों के लिए समुद्री संपर्क ने लागत और बाजार पहुंच दोनों के स्तर पर नई संभावनाएं पैदा कीं। 2010-11 में इसलिए गुजरात की आर्थिक कहानी के दो छोर दिखाई देते हैं। एक तरफ नहर और खेत थे, दूसरी तरफ बंदरगाह और वैश्विक बाजार। इनके बीच बिजली, सड़क, उद्योग और प्रशासनिक व्यवस्था की कड़ियां थीं। यह संयोजन ही उस आर्थिक ढांचे को आकार दे रहा था जिसकी पहचान अगले वर्षों में गुजरात के साथ और मजबूत हुई। इसी वर्ष सितंबर 2011 में नरेन्द्र मोदी ने सद्भावना मिशन के तहत उपवासों की श्रृंखला शुरू की। मुख्यमंत्री के रूप में एक दशक पूरा होने के बाद यह पहल उनके सार्वजनिक राजनीतिक विमर्श में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत थी। इसका घोषित उद्देश्य सामाजिक सद्भाव, एकता और गुजरात की साझा पहचान पर जोर देना था। इस पहल को लेकर राजनीतिक क्षेत्र में अलग-अलग व्याख्याएं सामने आईं, लेकिन इतना स्पष्ट था कि एक दशक की प्रशासनिक यात्रा के बाद गुजरात की सार्वजनिक छवि को केवल आर्थिक उपलब्धियों तक सीमित रखने के बजाय सामाजिक एकता के संदेश के साथ भी प्रस्तुत किया जा रहा था। दस वर्ष के इस पड़ाव पर गुजरात की सबसे उल्लेखनीय तस्वीर शायद किसी एक योजना या एक आंकड़े में नहीं थी। असली परिवर्तन उन व्यवस्थाओं के आपस में जुड़ने में था जिनका असर अलग-अलग दिखाई देता था। नहर ने खेत तक पानी पहुंचाया, ज्योतिग्राम ने सिंचाई को बिजली से जोड़ा, सड़क ने उत्पादन को बाजार से जोड़ा और बंदरगाह ने उस बाजार को देश और दुनिया से जोड़ दिया। 2010-11 तक गुजरात में यह आर्थिक श्रृंखला आकार ले चुकी थी। इसका मतलब यह नहीं था कि राज्य की सभी सामाजिक और क्षेत्रीय असमानताएं समाप्त हो गई थीं। बल्कि तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया था कि उसका लाभ कितनी व्यापकता से समाज के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचता है। लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से एक दशक की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि राज्य ने पानी, बिजली, कृषि, परिवहन और समुद्री व्यापार को अलग-अलग विभागीय गतिविधियों के बजाय एक-दूसरे से जुड़ी आर्थिक व्यवस्थाओं के रूप में देखना शुरू कर दिया था। यही 2010-11 की पहचान बनी। गुजरात की अर्थव्यवस्था अब केवल शहरों में नहीं बढ़ रही थी। उसका विस्तार खेतों से नहरों तक, नहरों से सड़कों तक और सड़कों से बंदरगाहों तक दिखाई दे रहा था। एक दशक के शासन के बाद तैयार हुआ यह ढांचा आगे की आर्थिक यात्रा के लिए आधार बन चुका था।




