प्रेम शंकर झा, आईआरएसएस
दिसंबर 2012 में गुजरात के विधानसभा चुनाव परिणाम केवल सीटों का आंकड़ा नहीं थे। भारतीय जनता पार्टी ने 182 सदस्यीय विधानसभा में 115 सीटें हासिल कीं और नरेन्द्र मोदी ने लगातार तीसरी बार विधानसभा चुनाव जीतकर चौथी बार मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। एक दशक से अधिक समय तक एक ही नेतृत्व के बने रहने का महत्व अब केवल राजनीतिक स्थिरता तक सीमित नहीं था। इसका असर उन परियोजनाओं पर भी दिखाई दे रहा था, जिन्हें पूरा होने में एक सरकार या एक चुनावी कार्यकाल से कहीं अधिक समय लगता है।
सात अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद माननीय नरेन्द्र मोदी जी का बारहवां वर्ष 2012 से 2013 के बीच आया। इस समय तक राज्य में प्रशासन की ऐसी संस्थागत स्मृति विकसित हो चुकी थी जिसमें कई बड़ी योजनाएं किसी एक घोषणा या कार्यकाल की बजाय दीर्घकालिक परियोजनाओं के रूप में आगे बढ़ रही थीं। नर्मदा की नहर व्यवस्था और गांधीनगर के पास विकसित हो रहा गुजरात अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रौद्योगिकी नगर इसके दो अलग-अलग उदाहरण थे।
गुजरात अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रौद्योगिकी नगर की परिकल्पना सामान्य औद्योगिक क्षेत्र से अलग थी। इसका उद्देश्य वित्तीय सेवाओं और सूचना प्रौद्योगिकी के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर का आधुनिक कारोबारी केंद्र तैयार करना था। 2012 में इसके लिए अलग प्रशासनिक और शहरी ढांचे को आगे बढ़ाया गया। इसका महत्व इस बात में था कि गुजरात नई अर्थव्यवस्था के लिए केवल जमीन उपलब्ध कराने के बजाय उसके अनुरूप पूरा शहरी ढांचा तैयार करने की दिशा में बढ़ रहा था।
ऐसी परियोजनाओं में सड़क और इमारतें सबसे दिखाई देने वाला हिस्सा होती हैं, लेकिन उनकी सफलता के पीछे नियोजन, बिजली, पानी, परिवहन, संचार और प्रशासनिक मंजूरियों की लंबी श्रृंखला होती है। गुजरात में इन व्यवस्थाओं को एक साथ विकसित करने की कोशिश की गई। यही कारण था कि ऐसी परियोजनाओं को तत्काल राजनीतिक परिणाम के बजाय आने वाले दशकों की आर्थिक जरूरत के रूप में देखा जा सका।
नर्मदा परियोजना की कहानी इससे भी बड़ी थी। मुख्य नहर से लेकर शाखा और वितरण नहरों तक हजारों किलोमीटर की व्यवस्था तैयार करनी थी। इसका उद्देश्य केवल बांध से पानी निकालना नहीं था, बल्कि उसे खेतों और उन क्षेत्रों तक पहुंचाना था जहां सिंचाई की स्थायी सुविधा सीमित रही थी। ऐसी परियोजनाओं में लगातार बदलते प्रशासनिक निर्णयों के बजाय लंबे समय तक बनी नीति-दिशा अधिक महत्वपूर्ण होती है।
यहीं राजनीतिक निरंतरता का प्रशासनिक अर्थ सामने आता है। अधिकारी बदल सकते हैं, विभागों के प्रमुख बदल सकते हैं, लेकिन यदि किसी परियोजना की मूल दिशा स्थिर रहती है तो उसके साथ वर्षों में जमा हुआ अनुभव भी प्रशासन के भीतर बना रहता है। कौन सी तकनीकी समस्या पहले सामने आ चुकी है, किस स्तर पर निर्णय अटकता है, किस प्रकार की स्वीकृति में कितना समय लगता है, इन सबका अनुभव किसी सरकारी फाइल से कहीं अधिक मूल्यवान होता है।
गुजरात की औद्योगिक अर्थव्यवस्था भी इसी दौरान एक व्यापक निर्यात तंत्र में बदल चुकी थी। पेट्रोलियम और पेट्रो रसायन, दवा उद्योग, हीरा, रसायन और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों ने राज्य के निर्यात को मजबूत आधार दिया। बंदरगाहों, सड़कों और औद्योगिक क्षेत्रों के बीच बेहतर संपर्क ने उत्पादन को देश और विदेश के बाजारों तक पहुंचाने की क्षमता बढ़ाई।
गुजरात की विशेषता केवल बड़े उद्योगों की मौजूदगी नहीं थी। उनके आसपास एक पूरा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित हो रहा था। रिफाइनरी और पेट्रो रसायन उद्योगों को बंदरगाह और परिवहन सुविधाएं मिलीं, हीरा उद्योग को वैश्विक बाजार से संपर्क मिला, दवा उद्योग को औद्योगिक केंद्रों का लाभ मिला और इंजीनियरिंग उद्योग को ऊर्जा तथा परिवहन का आधार। इस तरह उद्योगों को अलग-अलग इकाइयों के बजाय एक जुड़े हुए आर्थिक तंत्र के रूप में विकसित करने की कोशिश हुई।
इसी अवधि में गुजरात की पहचान देश के बाहर भी अधिक स्पष्ट हुई। मार्च 2012 में टाइम पत्रिका ने नरेन्द्र मोदी पर विशेष आवरण कथा प्रकाशित की और गुजरात में उनके प्रशासन तथा राष्ट्रीय राजनीति में उनकी बढ़ती चर्चा को अंतरराष्ट्रीय पाठकों के सामने रखा। यह इस बात का संकेत था कि गुजरात का प्रशासनिक अनुभव अब केवल राज्य की राजनीति तक सीमित विषय नहीं रह गया था।
लेकिन दिसंबर 2012 का चुनाव इस पूरे दौर का सबसे ठोस राजनीतिक संकेत था। भारतीय जनता पार्टी की 115 सीटों की जीत ने नरेन्द्र मोदी को लगातार तीसरी विधानसभा सरकार बनाने का अवसर दिया। 2007 में मिली 117 सीटों की तुलना में सीटों की संख्या थोड़ी कम थी, इसलिए इसे पहले से बड़ी चुनावी जीत कहना उचित नहीं होगा। लेकिन लगातार तीसरी बार सरकार बनना यह जरूर दिखाता था कि राज्य की जनता ने उसी नेतृत्व को फिर शासन की जिम्मेदारी सौंपी थी।
इस निरंतरता का महत्व उन परियोजनाओं में सबसे अधिक दिखाई देता है जिनका परिणाम तुरंत नहीं मिलता। नर्मदा की नहर व्यवस्था, नए औद्योगिक क्षेत्र, बंदरगाहों का विस्तार और गुजरात अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रौद्योगिकी नगर जैसी परियोजनाएं पांच वर्ष के राजनीतिक चक्र से कहीं लंबी थीं। इनके लिए प्रशासन को केवल आज के निर्णय नहीं, अगले दशक की जरूरतों को ध्यान में रखकर काम करना था।
बारहवां वर्ष इसलिए केवल चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की घटना नहीं था। यह उस बिंदु का वर्ष था जब लंबे समय तक बनी राजनीतिक निरंतरता और उससे विकसित प्रशासनिक स्मृति एक-दूसरे को मजबूत करती दिखाई दीं। परियोजनाएं व्यक्ति से बड़ी होने लगीं और संस्थाएं तत्काल राजनीतिक समय से आगे सोचने लगीं। गुजरात की शासन व्यवस्था का यही अनुभव आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बना।
दिसंबर 2012 तक गुजरात की कहानी में एक और परिवर्तन पूरा हो चुका था। राज्य अब केवल निवेश आकर्षित करने वाले प्रदेश के रूप में नहीं, बल्कि दीर्घकालिक परियोजनाओं, औद्योगिक तंत्र, निर्यात और आधारभूत ढांचे को एक साथ आगे बढ़ाने वाली प्रशासनिक व्यवस्था के रूप में अपनी पहचान बना रहा था। एक दशक से अधिक की निरंतरता ने इस व्यवस्था को समय दिया था और 2012 का जनादेश उस निरंतरता को आगे बढ़ाने का अवसर।




