पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सियासी घमासान लगातार जारी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और भाजपा के बीच इस मुद्दे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। इसी बीच पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए श्रीरामपुर में आयोजित उनकी सभा का जिक्र किया। अधिकारी ने सभा में मौजूद लोगों की संख्या को लेकर दावा किया और कहा कि लंबे समय तक राज्य की मुख्यमंत्री रहने वाली ममता बनर्जी की सभा में अपेक्षित संख्या में लोग नहीं पहुंचे। हालांकि, सभा में भीड़ को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं, इसलिए इसे शुभेंदु अधिकारी के राजनीतिक दावे के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर का उल्लेख करते हुए कहा कि वह करीब 15 वर्षों से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं और कई बार सांसद भी रह चुकी हैं। अधिकारी का दावा था कि इसके बावजूद श्रीरामपुर की सभा में लोगों की मौजूदगी उनकी अपेक्षा के अनुरूप नहीं रही। उन्होंने सभा में मौजूद लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े बताए और यह भी दावा किया कि वहां पुलिसकर्मियों और मीडियाकर्मियों की संख्या भी काफी थी। अधिकारी ने इस आधार पर तृणमूल कांग्रेस के जनसमर्थन को लेकर सवाल खड़े किए। हालांकि, किसी राजनीतिक सभा में मौजूद लोगों की संख्या अपने आप में किसी पार्टी के व्यापक जनसमर्थन का स्वतंत्र प्रमाण नहीं मानी जा सकती।
SIR का मुद्दा पिछले कई महीनों से पश्चिम बंगाल की राजनीति के केंद्र में है। ममता बनर्जी लगातार मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया पर सवाल उठाती रही हैं। उनका आरोप है कि SIR के नाम पर वास्तविक और पात्र मतदाताओं के नाम प्रभावित किए जा सकते हैं। उन्होंने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तक की है। तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि मतदाता सूची में किसी भी वास्तविक मतदाता का नाम गलत तरीके से नहीं हटना चाहिए और प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता बरती जानी चाहिए।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग और भाजपा की ओर से SIR को मतदाता सूची को व्यवस्थित करने की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस प्रक्रिया के दौरान मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित, डुप्लीकेट या रिकॉर्ड में विसंगति वाले मतदाताओं की प्रविष्टियों की जांच की गई। इसी दौरान बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता रिकॉर्ड सामने आए जिनमें चुनाव आयोग ने ‘logical discrepancy’ यानी तार्किक विसंगति का उल्लेख किया। इन मामलों को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए, जबकि चुनाव आयोग ने प्रक्रिया को नियमों के तहत किए गए सत्यापन का हिस्सा बताया।
SIR के दौरान लगभग 27 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने का मुद्दा भी विवाद का प्रमुख कारण बना। इन मामलों में बड़ी संख्या में लोगों ने अपने नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए अपील की। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद प्रभावित मतदाताओं के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अपीलीय व्यवस्था भी बनाई गई। चुनाव आयोग की ओर से अदालत में दाखिल जानकारी के अनुसार बड़ी संख्या में अपीलें प्राप्त हुईं, जिनमें नाम जोड़ने और हटाने दोनों से संबंधित मामले शामिल थे। इस पूरी प्रक्रिया ने पश्चिम बंगाल में चुनावी राजनीति के साथ-साथ कानूनी बहस को भी तेज कर दिया।
इसी SIR विवाद को लेकर शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी पर राजनीतिक हमला तेज करते हुए उन्हें और अन्य विपक्षी नेताओं को दूसरे राज्यों में भी इसी मुद्दे पर अपना विरोध दर्ज कराने की चुनौती दी। अधिकारी ने ममता बनर्जी, कांग्रेस नेता राहुल गांधी और माकपा नेता एमए बेबी का नाम लेते हुए केरल में SIR को लेकर प्रदर्शन करने की बात कही। उनका तर्क था कि यदि विपक्षी दल SIR की प्रक्रिया को लेकर गंभीर आपत्ति रखते हैं, तो उन्हें दूसरे राज्यों में भी इसी तरह का विरोध दर्ज कराना चाहिए।
SIR को लेकर पश्चिम बंगाल में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच राजनीतिक मतभेद लगातार सामने आ रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस इस प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा का मुद्दा उठा रही है, जबकि भाजपा और चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची के सत्यापन और सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे में SIR से जुड़े आंकड़े, अपीलों पर होने वाली सुनवाई और चुनाव आयोग तथा अदालतों के आगामी फैसले इस विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगे।
इस पूरे विवाद के बीच शुभेंदु अधिकारी का ममता बनर्जी की सभा और भीड़ को लेकर दिया गया बयान पश्चिम बंगाल की राजनीति में नया मुद्दा बन गया है। हालांकि, सभा में मौजूद लोगों की संख्या को लेकर उपलब्ध रिपोर्टों में एकरूपता नहीं है और अधिकारी के आंकड़े उनके राजनीतिक दावे के रूप में सामने आए हैं। इसलिए भीड़ से जुड़े दावों को उसी संदर्भ में देखना उचित होगा। फिलहाल SIR पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है और दोनों प्रमुख राजनीतिक खेमे इसे लेकर अपने-अपने तर्क जनता के सामने रख रहे हैं।




