प्रेम शंकर झा, आइआरएसएस
गुजरात से दिल्ली की दूरी केवल एक हजार किलोमीटर से कुछ अधिक है, लेकिन प्रशासन की दृष्टि से यह दूरी उससे कहीं बड़ी है। एक राज्य को चलाने और भारत को चलाने के बीच अंतर केवल अधिकार क्षेत्र का नहीं, दृष्टिकोण का भी है। गुजरात में तेरह वर्षों तक काम करने के बाद नरेन्द्र मोदी जब राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आए, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पहचान बनाए रखना नहीं, बल्कि अपने प्रशासनिक अनुभव का विस्तार करना थी। 2013-14 इसी संक्रमण का वर्ष था।
सात अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद माननीय नरेन्द्र मोदी जी का तेरहवां वर्ष 2013 से 2014 के बीच आया। सितंबर 2013 में भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया। इसके साथ गुजरात में विकसित उनकी प्रशासनिक कार्यशैली राष्ट्रीय बहस का विषय बनी। लेकिन किसी राज्य की उपलब्धियों को पूरे देश के लिए मॉडल मान लेना जितना आसान है, उन्हें भारत की विविध परिस्थितियों में लागू करना उतना ही कठिन।
गुजरात में लंबे कार्यकाल के दौरान प्रशासन के साथ काम करने की एक शैली विकसित हुई थी। नियमित समीक्षा, आंकड़ों के आधार पर प्रगति की निगरानी, अधिकारियों से सीधे संवाद और परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने पर जोर इसकी प्रमुख विशेषताएं थीं। इसके साथ सड़क, बिजली, सिंचाई, उद्योग और निवेश को अलग-अलग विभागीय विषय मानने के बजाय एक-दूसरे से जुड़े आर्थिक ढांचे के रूप में देखने की कोशिश हुई। 2013 तक यही अनुभव गुजरात की सीमाओं से बाहर उनकी राजनीतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका था।
राष्ट्रीय चुनाव ने इस अनुभव को एक बिल्कुल अलग मैदान में ला खड़ा किया।
2014 का चुनाव अभियान अपने पैमाने और तकनीकी प्रयोगों के कारण भी अलग था। गुजरात में 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रयोग की गई त्रिआयामी छवि तकनीक को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तारित किया गया। एक साथ अनेक स्थानों तक भाषण पहुंचाने का यह प्रयोग उस समय भारतीय चुनाव प्रचार में नई बात था। लेकिन तकनीक अपने आप में लक्ष्य नहीं थी। उसका उद्देश्य उस राजनीतिक संदेश को अधिक व्यापक पहुंच देना था जिसमें शासन, विकास, रोजगार और प्रशासनिक निर्णय क्षमता प्रमुख विषय थे।
16 मई 2014 को जब परिणाम आए तो परिवर्तन की वास्तविक मात्रा सामने आई। भारतीय जनता पार्टी ने 543 सदस्यीय लोकसभा में 282 सीटें जीतकर अपने दम पर बहुमत प्राप्त किया। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की कुल सीटें 336 रहीं। 1984 के बाद यह पहला अवसर था जब किसी एक दल को लोकसभा में अपने दम पर बहुमत मिला।इस परिणाम को केवल चुनावी विजय के रूप में पढ़ना अधूरा होगा। लंबे समय बाद केंद्र में ऐसी सरकार बनने जा रही थी जिसके पास अपने निर्णयों को आगे बढ़ाने के लिए स्पष्ट राजनीतिक आधार था। लेकिन यही वह जगह थी जहां चुनाव की सफलता और शासन की कठिनाई एक-दूसरे से अलग हो जाती हैं। बहुमत सरकार को निर्णय लेने की स्वतंत्रता दे सकता है; परिणाम देने के लिए उसे संस्थाओं, नियमों और राज्यों के साथ काम करना ही पड़ता है।
26 मई 2014 को राष्ट्रपति भवन में नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
शपथ ग्रहण समारोह में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन के सदस्य देशों के नेताओं को आमंत्रित किया गया था। स्वतंत्र भारत में यह पहली बार था। इस कदम ने नई सरकार के शुरुआती कूटनीतिक संकेत को स्पष्ट किया कि पड़ोसी देशों के साथ संबंध उसकी प्राथमिकताओं में रहेंगे।लेकिन उस दिन की सबसे बड़ी घटना शपथ नहीं थी। असली परिवर्तन यह था कि गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में जिस प्रशासनिक मशीनरी के साथ नरेन्द्र मोदी काम करते आए थे, अब उसके स्थान पर भारत सरकार की विशाल और बहुस्तरीय व्यवस्था थी।
भारत में केंद्र सरकार अकेले शासन नहीं करती। संविधान ने शक्तियों का विभाजन किया है। कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, स्थानीय शासन और अनेक विकासात्मक विषयों में राज्यों की भूमिका निर्णायक है। एक राज्य में किसी योजना का निर्णय मुख्यमंत्री और राज्य प्रशासन के स्तर पर लिया जा सकता है; पूरे देश में वही नीति तभी सफल हो सकती है जब अलग-अलग राज्यों की परिस्थितियों, प्राथमिकताओं और प्रशासनिक क्षमता को उसमें जगह मिले।यही वह बिंदु था जहां गुजरात का अनुभव अपने सबसे कठिन परीक्षण के सामने था।
गुजरात में प्रशासनिक एकरूपता अपेक्षाकृत अधिक थी। भारत में हर प्रदेश की अपनी आर्थिक संरचना है, अपनी सामाजिक आवश्यकताएं हैं और अपनी प्रशासनिक परंपराएं हैं। गुजरात में सिंचाई की समस्या का समाधान नहरों और जल प्रबंधन के माध्यम से किया जा सकता था; राजस्थान, असम या केरल में वही नीति उसी रूप में नहीं चल सकती। गुजरात के औद्योगिक ढांचे के लिए जो बिजली व्यवस्था उपयोगी थी, वही व्यवस्था देश के प्रत्येक राज्य में उसी तरह लागू नहीं हो सकती। इसलिए राष्ट्रीय शासन का अर्थ गुजरात की योजनाओं की प्रतिलिपि बनाना नहीं था।
राष्ट्रीय शासन की चुनौती इससे बड़ी थी: गुजरात में विकसित प्रशासनिक सिद्धांतों को भारतीय विविधता के अनुरूप ढालना।यह अंतर उस समय और महत्वपूर्ण था क्योंकि केंद्र सरकार को केवल योजनाएं बनानी नहीं थीं। उसे राज्यों के साथ संसाधनों का समन्वय करना था, राष्ट्रीय परियोजनाओं को आगे बढ़ाना था, मंत्रालयों के बीच तालमेल बनाना था और नीतियों को ऐसे ढांचे में रखना था जिसमें संवैधानिक सीमाएं भी बनी रहें और परिणाम की अपेक्षा भी पूरी हो।
यही कारण है कि 2014 को किसी तैयार राष्ट्रीय प्रशासनिक मॉडल की स्थापना का वर्ष कहना सही नहीं होगा। यह उस मॉडल के राष्ट्रीय विस्तार की शुरुआत थी। आगे चलकर केंद्र सरकार ने परियोजना निगरानी और केंद्र-राज्य समन्वय के लिए नई व्यवस्थाएं विकसित कीं। उदाहरण के लिए, प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में तकनीक आधारित परियोजना समीक्षा और जनशिकायत निवारण की प्रगति व्यवस्था मार्च 2015 में शुरू हुई। इसलिए उसे 2014 की उपलब्धि मानना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
2013-14 का महत्व इसी अधूरेपन में था। गुजरात में तेरह वर्षों में विकसित प्रशासनिक अनुभव अपने आप राष्ट्रीय शासन में परिवर्तित नहीं हो सकता था। उसे नई संस्थाओं, नई प्राथमिकताओं और संघीय ढांचे के साथ नए सिरे से काम करना था।
यहां नरेन्द्र मोदी के लिए एक असाधारण अवसर भी था। उन्हें पहली बार अपने राज्य से बाहर उस प्रशासनिक दृष्टि को लागू करने का राजनीतिक अधिकार मिला था, जिसके साथ उनकी पहचान बनी थी। लेकिन भारत ने भी उनके सामने एक नई कसौटी रख दी थी। गुजरात में निर्णय की गति महत्वपूर्ण थी; दिल्ली में उसी गति के साथ सहमति और समन्वय जरूरी था। गुजरात में परिणाम का भूगोल सीमित था; केंद्र में उसका भूगोल पूरा देश था। गुजरात में सरकार एक प्रशासनिक इकाई थी; भारत में केंद्र स्वयं संघीय व्यवस्था का एक हिस्सा है।
इसलिए 2014 को समझने का सही तरीका शायद यही है कि इसे सत्ता परिवर्तन से अधिक पैमाने के परिवर्तन के रूप में देखा जाए।तेरह वर्षों तक गुजरात में तैयार हुई प्रशासनिक दृष्टि अब भारत के सामने थी। 16 मई का जनादेश उसे राजनीतिक आधार देता था और 26 मई की शपथ उसे संवैधानिक दायित्व में बदल देती थी। इसके बाद नरेन्द्र मोदी के सामने चुनौती गुजरात को भारत पर आरोपित करने की नहीं, बल्कि गुजरात के अनुभव से ऐसे प्रशासनिक सूत्र निकालने की थी जो भारत की विविधता के भीतर काम कर सकें।यहीं से उनकी यात्रा का एक नया अध्याय शुरू हुआ। गुजरात ने उन्हें प्रशासन का अनुभव दिया था; भारत अब उन्हें प्रशासन की जटिलता सिखाने वाला था।




