मराठवाड़ा में सूखे का सबसे ज्यादा असर, फसल बचाना किसानों के लिए बना मुश्किल

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महाराष्ट्र में बारिश की कमी ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। खासकर मराठवाड़ा के लातूर, बीड, धाराशिव और आसपास के इलाकों में खरीफ फसलों पर गंभीर असर पड़ा है। कई क्षेत्रों में खेतों में खड़ी सोयाबीन, कपास, अरहर और गन्ने की फसल पानी की कमी के कारण प्रभावित हुई है। कुछ इलाकों में हालात इतने खराब बताए जा रहे हैं कि किसान अपनी फसल को बचाने के बजाय खेतों से खराब फसल हटाकर अगली बुआई की तैयारी करने को मजबूर हैं।

बारिश की कमी का सबसे ज्यादा असर वर्षा आधारित खेती करने वाले किसानों पर पड़ा है। लातूर, बीड, परभणी और धाराशिव जैसे जिलों में मानसून के दौरान अपेक्षा से कम बारिश होने और लंबे समय तक बारिश नहीं होने के कारण मिट्टी में नमी तेजी से कम हुई। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, लातूर में सामान्य 679.5 मिलीमीटर बारिश के मुकाबले करीब 424.5 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई। लगातार सूखे दौर के कारण सोयाबीन की पत्तियां पीली पड़ने, कपास की वृद्धि रुकने और अरहर की फसल मुरझाने जैसी समस्याएं सामने आई हैं।

किसानों के लिए मुश्किल इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि खरीफ फसल की बुआई में पहले ही काफी पैसा खर्च हो चुका है। बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी और जुताई पर खर्च करने के बाद यदि फसल खराब हो जाती है तो किसान के सामने लागत निकालने का संकट पैदा हो जाता है। कुछ प्रभावित क्षेत्रों में किसानों का कहना है कि फसल की स्थिति इतनी खराब है कि उससे अपेक्षित उत्पादन मिलने की संभावना बेहद कम है। कई जगह खराब फसल को खेत से हटाकर पशुओं के चारे के तौर पर इस्तेमाल करने की स्थिति बन गई है।

सूखे का असर खेतों के साथ-साथ जल स्रोतों पर भी दिखाई दे रहा है। लातूर जिले के जलाशयों में पानी का स्तर काफी नीचे पहुंच गया है। रिपोर्टों के अनुसार, जिले के 158 जलाशयों में औसत जल भंडारण करीब 12.5 प्रतिशत रह गया था। क्षेत्र के प्रमुख जल स्रोतों में भी पानी की उपलब्धता कम होने से खेती और ग्रामीण आबादी के सामने पानी को लेकर चिंता बढ़ गई है। बीड क्षेत्र में भी कुछ प्रमुख बांधों में उपयोगी पानी बेहद कम स्तर पर पहुंचने की रिपोर्ट सामने आई है।

जल संकट का असर केवल खरीफ फसल तक सीमित नहीं है। यदि जलाशयों और भूजल स्रोतों में पर्याप्त पानी की उपलब्धता नहीं हुई तो आने वाले रबी सीजन की बुआई भी प्रभावित हो सकती है। किसानों के लिए यह चिंता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खरीफ फसल के नुकसान के बाद रबी सीजन उनकी आय को संभालने का एक प्रमुख अवसर होता है। पानी की कमी बनी रहने पर गेहूं, चना और अन्य रबी फसलों की खेती पर भी दबाव बढ़ सकता है।

महाराष्ट्र सरकार ने बारिश की कमी और सूखे जैसी परिस्थितियों को देखते हुए राज्य के 358 में से 265 तालुकों को सूखा प्रभावित घोषित किया है। यह राज्य के करीब 74 प्रतिशत तालुकों के बराबर है। सरकार के अनुसार, इन क्षेत्रों में सूखा प्रबंधन से जुड़े शुरुआती चेतावनी मानदंड पूरे हुए हैं। प्रभावित क्षेत्रों में मराठवाड़ा के अलावा पश्चिमी महाराष्ट्र, विदर्भ और उत्तरी महाराष्ट्र के भी कई इलाके शामिल हैं।

मौजूदा स्थिति की तुलना महाराष्ट्र के 1972 के भीषण सूखे से भी की जा रही है। 1972 में कमजोर मानसून के कारण राज्य के बड़े हिस्से में खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ा था। 2026 में सूखे जैसी परिस्थितियों के बीच मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और एनसीपी (एसपी) प्रमुख शरद पवार समेत राजनीतिक नेताओं की ओर से 1972 के संकट का संदर्भ दिया गया है। हालांकि, दोनों वर्षों की परिस्थितियों की सीधी तुलना करते समय उस समय और वर्तमान के सिंचाई ढांचे, जल संसाधनों तथा प्रशासनिक व्यवस्था में अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है।

सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती प्रभावित किसानों तक राहत पहुंचाने और आगामी कृषि सीजन के लिए पानी की व्यवस्था करने की है। प्रभावित इलाकों में फसल नुकसान का आकलन, पंचनामा, किसानों को सहायता, पेयजल व्यवस्था और पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हो गए हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर खेतों और जलाशयों की स्थिति का जायजा भी लिया है।

महाराष्ट्र के किसानों के सामने इस समय केवल एक फसल के नुकसान का संकट नहीं है, बल्कि उनकी पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है। फसल खराब होने से किसानों की आय प्रभावित होती है, जबकि परिवार का खर्च, खेती की लागत, कर्ज और अगली फसल की तैयारी जैसी जिम्मेदारियां बनी रहती हैं। यदि आने वाले समय में पर्याप्त बारिश नहीं होती और जलाशयों में पानी का स्तर नहीं सुधरता है, तो संकट और बढ़ सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में बारिश की स्थिति, जल संसाधनों में उपलब्ध पानी और सरकारी राहत उपाय महाराष्ट्र के प्रभावित किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होंगे।

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