प्रेम शंकर झा, आइआरएसएस
भारत में सुरक्षा शब्द का अर्थ लंबे समय तक सीमा और सेना से जुड़ा रहा। लेकिन किसी गरीब परिवार के लिए सुरक्षा का पहला अर्थ कई बार सीमा पर नहीं, घर के भीतर तय होता है। परिवार का कमाने वाला व्यक्ति अस्पताल पहुंच जाए और इलाज के लिए जमीन गिरवी रखने की नौबत आ जाए, तो वह परिवार कितना सुरक्षित है? किसान की फसल तैयार हो, लेकिन उसके पास अगले मौसम तक घर चलाने के लिए पर्याप्त नकदी न हो, तो उसकी आर्थिक सुरक्षा कहां है?
2018–19 में भारतीय शासन के सामने सुरक्षा की यही विस्तृत तस्वीर उभरती है। एक तरफ सरकार ने गरीब परिवार को बड़े अस्पताल खर्च से बचाने के लिए आयुष्मान भारत शुरू किया। दूसरी तरफ छोटे और सीमांत किसानों के लिए सीधे बैंक खाते में आय सहायता का रास्ता खोला गया। और इसी अवधि के अंत में पुलवामा के आतंकवादी हमले के बाद बालाकोट की कार्रवाई ने राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में भारत की प्रतिक्रिया का एक नया अध्याय सामने रखा। तीनों घटनाएं एक-दूसरे से अलग थीं। लेकिन इनके बीच एक साझा प्रश्न था: जब जोखिम बहुत बड़ा हो जाए और व्यक्ति या परिवार अकेले उसका सामना न कर सके, तब राज्य की जिम्मेदारी कहां तक जाती है? यही सवाल 23 सितंबर 2018 को रांची में शुरू हुई आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के पीछे था।
भारत में स्वास्थ्य सुविधा का संकट केवल अस्पतालों की कमी का संकट नहीं था। इलाज का खर्च भी उतनी ही बड़ी समस्या था। योजना शुरू करते समय सरकार ने राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया था कि ग्रामीण भारत के 85.9 प्रतिशत और शहरी भारत के 82 प्रतिशत परिवारों के पास स्वास्थ्य बीमा या स्वास्थ्य आश्वासन की सुविधा नहीं थी। गंभीर बीमारी के इलाज के लिए बड़ी रकम खर्च होने पर परिवार कर्ज लेने या अपनी संपत्ति बेचने तक पहुंच सकता था। आयुष्मान भारत ने इसी जगह हस्तक्षेप किया। सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना के आधार पर चिन्हित करीब 10.74 करोड़ गरीब और कमजोर परिवारों को प्रति परिवार पांच लाख रुपये सालाना तक के द्वितीयक और तृतीयक अस्पताल उपचार का कवर दिया गया। इलाज को नकदरहित और कागजरहित बनाने के लिए सरकारी और सूचीबद्ध निजी अस्पतालों को जोड़ा गया। परिवार के आकार और उम्र पर भी सीमा नहीं रखी गई।
इसमें बदलाव केवल बीमा देने का नहीं था। यह उस प्रशासनिक सोच में परिवर्तन था जिसमें गरीब को सहायता पाने के लिए पहले सरकारी दफ्तर तक पहुंचना पड़ता था। यहां कोशिश थी कि पात्रता पहले से तय हो, लाभार्थी अस्पताल पहुंचे और इलाज के समय जेब से भुगतान किए बिना सेवा मिल सके। यानी कल्याण का केंद्र सरकारी कार्यालय से हटाकर नागरिक और सेवा के बीच के सीधे संबंध पर लाने की कोशिश हुई। योजना के शुरुआती महीनों में ही उसका इस्तेमाल शुरू हो गया। जुलाई 2019 तक 33 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने इसके क्रियान्वयन के लिए समझौता किया था। सरकारी आंकड़ों में अस्पतालों में दाखिले और उपचार की प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी भी सामने आने लगी थी। लेकिन स्वास्थ्य सुरक्षा की यह शुरुआत अपने आप में पर्याप्त नहीं थी। अस्पताल तभी मदद कर सकता है जब परिवार के पास रोजमर्रा की जिंदगी चलाने की क्षमता भी हो। ग्रामीण भारत में यह क्षमता बड़े पैमाने पर खेती की आय से जुड़ी थी। यहीं 2019 की शुरुआत में सरकार ने अपना दूसरा बड़ा कदम उठाया।
एक फरवरी 2019 के अंतरिम बजट में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की घोषणा हुई। दो हेक्टेयर तक कृषि योग्य भूमि रखने वाले छोटे और सीमांत किसान परिवारों को सालाना छह हजार रुपये देने का प्रावधान किया गया। राशि दो-दो हजार रुपये की तीन किस्तों में सीधे बैंक खाते में भेजी जानी थी। योजना को 1 दिसंबर 2018 से प्रभावी माना गया और 24 फरवरी को गोरखपुर से इसका औपचारिक शुभारंभ हुआ। पहली किस्त के रूप में करीब 1.01 करोड़ किसानों के खातों में लगभग 2,021 करोड़ रुपये भेजे गए। इसके लिए सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली के माध्यम से सीधे इलेक्ट्रॉनिक अंतरण किया गया। छह हजार रुपये किसान की पूरी आर्थिक समस्या का समाधान नहीं थे। इसे कृषि संकट का उपचार कहना भी अतिशयोक्ति होती। लेकिन नीति की दिशा महत्वपूर्ण थी। सरकार ने पहली बार बड़े पैमाने पर किसान सहायता को किसी इनपुट सब्सिडी या ऋण योजना के बजाय सीधे आय सहायता के रूप में डिजाइन किया। और पैसा बिचौलियों की श्रृंखला से निकालकर बैंक खाते तक पहुंचाने की कोशिश की गई। यहां पिछले वर्षों में तैयार हुई डिजिटल प्रशासनिक संरचना काम आ रही थी। बैंक खाते, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और ऑनलाइन लाभार्थी विवरण अब केवल तकनीकी शब्द नहीं रह गए थे। वे कल्याणकारी राज्य के वितरण तंत्र का हिस्सा बन चुके थे। फिर 14 फरवरी 2019 को पुलवामा हुआ। सीआरपीएफ के काफिले पर आत्मघाती आतंकवादी हमले में 40 जवानों की मौत हुई। भारत सरकार ने हमले को पाकिस्तान स्थित जैश-ए-मोहम्मद से जोड़ा। इसके बारह दिन बाद, 26 फरवरी को भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के प्रशिक्षण शिविर को निशाना बनाया। विदेश सचिव के बयान में भारत ने इसे आतंकवादी ढांचे के खिलाफ कार्रवाई और आगे होने वाले हमलों को रोकने के उद्देश्य से की गई कार्रवाई बताया।
बालाकोट ने राष्ट्रीय सुरक्षा की भाषा बदल दी। 2016 के उरी हमले के बाद नियंत्रण रेखा के पार हुई सैन्य कार्रवाई के बाद अब पाकिस्तान के भीतर एक आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर को निशाना बनाया गया। इसके अगले दिन दोनों देशों की वायु सेनाओं के बीच टकराव हुआ और क्षेत्रीय तनाव बढ़ गया। इस कार्रवाई के परिणाम और हताहतों की संख्या को लेकर भारत और पाकिस्तान के दावे अलग रहे। इसलिए बालाकोट के सैन्य प्रभाव पर किसी एक पक्ष के दावे को अंतिम तथ्य मानना उचित नहीं होगा। लेकिन राजनीतिक और रणनीतिक स्तर पर इसका महत्व निर्विवाद था: भारत ने आतंकवादी हमले के जवाब में सैन्य कार्रवाई के अपने विकल्प का दायरा बढ़ाया और राष्ट्रीय सुरक्षा 2019 के सार्वजनिक विमर्श का प्रमुख विषय बन गई। यहीं 2018–19 की कहानी का सबसे दिलचस्प विरोधाभास दिखाई देता है। एक ही सरकार, एक ही वर्ष में, राज्य की भूमिका को दो बिल्कुल अलग दिशाओं में बढ़ा रही थी। एक दिशा नागरिक के भीतर की असुरक्षा की ओर थी। दूसरी सीमा के बाहर से आने वाले खतरे की ओर।
अस्पताल के बिल के सामने सरकार सुरक्षा कवच बनना चाहती थी। किसान के बैंक खाते में छोटी लेकिन नियमित सहायता पहुंचाना चाहती थी। और आतंकवादी हमले के बाद यह संदेश देना चाहती थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में सैन्य विकल्प भी नीति का हिस्सा हो सकता है। इसे केवल चुनावी राजनीति के चश्मे से देखना उस वर्ष की व्यापक तस्वीर को छोटा कर देगा। अप्रैल और मई 2019 में लोकसभा चुनाव हुए। 23 मई को परिणाम आए और निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार भाजपा ने 303 सीटें जीतीं, जबकि 2014 में उसे 282 सीटें मिली थीं। 30 मई को नरेन्द्र मोदी ने दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इस जनादेश को किसी एक योजना या बालाकोट का सीधा परिणाम मानना राजनीतिक इतिहास को जरूरत से ज्यादा सरल कर देना होगा। मतदाता का निर्णय अनेक राष्ट्रीय और स्थानीय मुद्दों, नेतृत्व, संगठन, विपक्षी राजनीति और सरकार के प्रदर्शन के अलग-अलग अनुभवों से बनता है। इसलिए 303 सीटों का तथ्य महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे आयुष्मान भारत या बालाकोट की सफलता का सांख्यिकीय प्रमाण नहीं बनाया जा सकता। फिर भी 2018–19 को पीछे मुड़कर देखने पर एक परिवर्तन साफ दिखाई देता है। सरकार की कल्याणकारी भूमिका अब केवल गरीब को कोई वस्तु या सब्सिडी देने तक सीमित नहीं थी। जोखिम स्वयं नीति का विषय बनने लगा था। बीमारी के जोखिम के लिए पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवर। किसान परिवार की आय के लिए प्रत्यक्ष नकद सहायता। आतंकवाद के जोखिम के लिए सैन्य प्रतिरोध। तीनों के तरीके अलग थे, पैमाना अलग था और परिणामों को मापने की कसौटी भी अलग। लेकिन तीनों में राज्य नागरिक या राष्ट्र के उस हिस्से तक पहुंचने की कोशिश कर रहा था जहां जोखिम सबसे अधिक था। यही 2018–19 की असली कहानी है।
पहले वर्षों में शासन का जोर व्यवस्था बनाने, बाजार को जोड़ने और बुनियादी सुविधाओं को विस्तार देने पर था। अब उस व्यवस्था का इस्तेमाल नागरिक के व्यक्तिगत जोखिम को कम करने के लिए किया जा रहा था। आयुष्मान भारत ने स्वास्थ्य को सामाजिक सुरक्षा से जोड़ा। पीएम-किसान ने किसान की आय को प्रत्यक्ष सरकारी सहायता से जोड़ा। पुलवामा और बालाकोट ने राष्ट्रीय सुरक्षा को जवाब देने की नई राजनीतिक और रणनीतिक भाषा दी। इसलिए 18वां वर्ष केवल चुनाव से पहले का वर्ष नहीं था। यह उस बदलाव का वर्ष था जिसमें विकास की राजनीति से आगे बढ़कर सुरक्षा की राजनीति का अर्थ भी व्यापक हुआ। सुरक्षा अब केवल सीमा पर खड़े सैनिक की नहीं थी। वह अस्पताल के बिस्तर पर पड़े गरीब मरीज की भी थी, खेत में खड़े छोटे किसान की भी और आतंकवाद के सामने खड़े राष्ट्र की भी।
2018–19 में नरेन्द्र मोदी सरकार ने इसी विस्तृत अर्थ में राज्य की भूमिका को परिभाषित करने की कोशिश की। इसकी योजनाओं की अपनी सीमाएं थीं, इनके क्रियान्वयन की अपनी चुनौतियां थीं और इनके राजनीतिक प्रभावों पर अलग-अलग मत हो सकते हैं। लेकिन उस वर्ष की नीति-दिशा को समझने के लिए एक बात पर्याप्त है: सरकार अब केवल विकास पहुंचाने की बात नहीं कर रही थी; वह जोखिम को अपने शासन के केंद्र में ला रही थी और यही वह बिंदु था जहां पहला कार्यकाल समाप्त होकर दूसरे कार्यकाल की जमीन तैयार हुई।




