कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार देश की आर्थिक व्यवस्था में कुछ चुनिंदा बड़े कारोबारी समूहों को फायदा पहुंचा रही है, जबकि छोटे कारोबारियों, उद्योगों और युवाओं की समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। खरगे ने सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए इन्हें ‘आर्थिक आतंकवाद’ करार दिया। उनके मुताबिक, बाजार में कुछ बड़ी कंपनियों का प्रभाव बढ़ने से प्रतिस्पर्धा कमजोर हो रही है और इसका असर छोटे कारोबारियों के अवसरों पर पड़ सकता है।
खरगे ने अपने बयान में आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की आर्थिक नीतियां बड़े पूंजीपतियों के हितों के अनुकूल हैं। उन्होंने दावा किया कि देश के कई प्रमुख क्षेत्रों में बड़ी कंपनियों का दबदबा बढ़ रहा है, जिससे छोटे और मध्यम कारोबारियों के लिए बाजार में अपनी जगह बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। कांग्रेस अध्यक्ष ने सवाल उठाया कि क्या आर्थिक विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से पहुंच रहा है या इसका बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा कारोबारी समूहों तक सीमित होता जा रहा है।
कांग्रेस अध्यक्ष ने बाजार में प्रतिस्पर्धा की स्थिति को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि कई क्षेत्रों में कंपनियों की संख्या कम होने और बड़ी कंपनियों के प्रभाव में वृद्धि से बाजार का संतुलन प्रभावित हो रहा है। आर्थिक व्यवस्था में जब किसी एक या कुछ कंपनियों का प्रभाव बहुत अधिक हो जाता है, तो छोटे कारोबारियों के लिए प्रतिस्पर्धा करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। खरगे ने इसी मुद्दे को उठाते हुए सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े किए और दावा किया कि मौजूदा व्यवस्था में बड़े कारोबारी समूहों को अधिक अवसर मिल रहे हैं।
दूरसंचार क्षेत्र का उदाहरण देते हुए खरगे ने कहा कि वर्ष 2014 के आसपास इस उद्योग में कई कंपनियां सक्रिय थीं, लेकिन अब बाजार में कुछ प्रमुख कंपनियों का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। उन्होंने इसे प्रतिस्पर्धा में कमी के उदाहरण के तौर पर पेश किया। पिछले एक दशक में भारतीय दूरसंचार क्षेत्र में तकनीकी बदलाव, डेटा सेवाओं का विस्तार, कंपनियों के बीच विलय और भारी निवेश की जरूरत जैसे कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। इन बदलावों ने बाजार की संरचना को प्रभावित किया है। हालांकि, कंपनियों की संख्या में कमी और प्रतिस्पर्धा की वास्तविक स्थिति का आकलन करने के लिए बाजार हिस्सेदारी तथा आधिकारिक उद्योग आंकड़ों की जांच जरूरी है।
खरगे ने विमानन क्षेत्र का भी जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि इस उद्योग में भी कुछ बड़ी कंपनियों का प्रभाव बढ़ा है। उनका कहना है कि बाजार में सीमित कंपनियों का दबदबा बढ़ने से प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ताओं के हितों पर सवाल उठते हैं। भारतीय विमानन उद्योग में पिछले वर्षों के दौरान वित्तीय चुनौतियों, परिचालन लागत, ईंधन की कीमतों और कंपनियों के कारोबार से जुड़ी समस्याओं ने बाजार को प्रभावित किया है। ऐसे में इस क्षेत्र की मौजूदा स्थिति को समझने के लिए कंपनियों की संख्या के साथ-साथ उनकी बाजार हिस्सेदारी और यात्रियों की संख्या जैसे आंकड़ों का विश्लेषण भी महत्वपूर्ण है।
कांग्रेस अध्यक्ष ने डिजिटल भुगतान, सीमेंट और फूड डिलीवरी जैसे क्षेत्रों में भी बड़ी कंपनियों के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंता जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि कई कारोबारों में बड़े प्लेटफॉर्म और कंपनियां मजबूत स्थिति में हैं, जिससे छोटे कारोबारियों को प्रतिस्पर्धा करने में कठिनाई हो सकती है। डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में यूपीआई के विस्तार से ऑनलाइन लेनदेन को बढ़ावा मिला है, जबकि फूड डिलीवरी कारोबार में कमीशन, छूट और प्लेटफॉर्म पर निर्भरता जैसे मुद्दे चर्चा में रहते हैं। इसी तरह सीमेंट उद्योग में उत्पादन लागत, परिवहन, कंपनियों के विलय और बाजार हिस्सेदारी जैसे कारक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करते हैं। खरगे ने इन उदाहरणों के माध्यम से सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाए हैं।
खरगे ने सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों यानी एमएसएमई की स्थिति को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने आरोप लगाया कि बड़ी कंपनियों के बढ़ते प्रभाव के बीच छोटे और मध्यम कारोबारियों को पर्याप्त सहायता नहीं मिल रही है। भारत की अर्थव्यवस्था में एमएसएमई क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह क्षेत्र उत्पादन, व्यापार और सेवा गतिविधियों के माध्यम से रोजगार के अनेक अवसर उपलब्ध कराता है। छोटे कारोबारियों को अक्सर कर्ज की उपलब्धता, भुगतान में देरी, कच्चे माल की बढ़ती कीमतों और बाजार में प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। खरगे का कहना है कि सरकार को इन समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए, ताकि छोटे उद्योग आर्थिक विकास में प्रभावी भूमिका निभा सकें।
बेरोजगारी के मुद्दे पर भी कांग्रेस अध्यक्ष ने केंद्र सरकार को घेरा। उन्होंने आरोप लगाया कि छोटे उद्योगों और कारोबारियों के सामने आने वाली चुनौतियों का असर रोजगार के अवसरों पर पड़ सकता है। खरगे के मुताबिक, देश के युवाओं को पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराने के लिए ऐसी आर्थिक नीतियों की जरूरत है, जो छोटे उद्योगों को मजबूत करें और निजी क्षेत्र में रोजगार सृजन को बढ़ावा दें। उन्होंने सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि आर्थिक विकास का वास्तविक लाभ तभी व्यापक होगा, जब रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और युवाओं को बेहतर भविष्य बनाने का मौका मिलेगा। हालांकि, बेरोजगारी की वास्तविक स्थिति का आकलन करने के लिए रोजगार दर, श्रम बल भागीदारी और सरकारी सर्वेक्षणों के आंकड़ों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
खरगे ने आर्थिक उदारीकरण का उल्लेख करते हुए भी सरकार की नीतियों की आलोचना की। भारत में आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया को विशेष रूप से वर्ष 1991 में शुरू किए गए आर्थिक सुधारों से जोड़ा जाता है। इन सुधारों का उद्देश्य अर्थव्यवस्था को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना, निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना और व्यापार तथा निवेश के अवसरों का विस्तार करना था। खरगे का तर्क है कि यदि बाजार में कुछ बड़ी कंपनियों का प्रभाव लगातार बढ़ता है और छोटे कारोबारियों के लिए प्रतिस्पर्धा करना कठिन हो जाता है, तो आर्थिक उदारीकरण के मूल उद्देश्यों पर सवाल उठते हैं। उनके अनुसार, सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आर्थिक विकास के साथ बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा भी बनी रहे।
खरगे के इस बयान से केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज होने की संभावना है। कांग्रेस लंबे समय से रोजगार, महंगाई, छोटे उद्योगों की स्थिति और बड़े कारोबारी समूहों को मिलने वाले लाभ जैसे मुद्दों पर सरकार की आलोचना करती रही है। इस बार भी खरगे ने बाजार में प्रतिस्पर्धा और आर्थिक अवसरों के वितरण को अपनी टिप्पणी का प्रमुख आधार बनाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की नीतियों से चुनिंदा पूंजीपति समूहों को लाभ मिल रहा है, जबकि छोटे उद्योगों और आम लोगों की चुनौतियों का समाधान पर्याप्त रूप से नहीं हो रहा है।
कुल मिलाकर, मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र की मोदी सरकार पर आर्थिक नीतियों के माध्यम से बड़े कारोबारी समूहों को लाभ पहुंचाने का आरोप लगाते हुए इसे ‘आर्थिक आतंकवाद’ बताया है। उन्होंने दूरसंचार, विमानन, डिजिटल भुगतान, सीमेंट और फूड डिलीवरी जैसे क्षेत्रों का उदाहरण देकर बाजार में प्रतिस्पर्धा की स्थिति पर सवाल उठाए। साथ ही, एमएसएमई क्षेत्र, छोटे कारोबारियों और युवाओं के रोजगार को लेकर चिंता जताई। हालांकि, उनके आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि के लिए संबंधित क्षेत्रों के आधिकारिक आंकड़ों, बाजार हिस्सेदारी और सरकारी नीतियों का विश्लेषण जरूरी है। सरकार की ओर से इस विशेष बयान पर प्रतिक्रिया उपलब्ध होने पर उसका पक्ष भी खबर में शामिल किया जाना चाहिए।




