अंडरवर्ल्ड सरगना दाऊद इब्राहिम और उसके आपराधिक संगठन डी-कंपनी को लेकर संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई है। भारत का कहना है कि रिपोर्ट में डी-कंपनी को ‘भारत आधारित’ आपराधिक गिरोह के रूप में प्रस्तुत करते समय महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्यों और घटनाक्रमों को पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं किया गया। भारत ने इसे तथ्यात्मक सटीकता से जुड़ा गंभीर मामला बताते हुए संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदकों की रिपोर्टिंग प्रक्रिया और जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं।
भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्र में प्रथम सचिव रघु पुरी ने 21 अक्टूबर को महासभा की तीसरी समिति की बैठक में यह मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रतिनिधियों की रिपोर्ट में तथ्यात्मक गलतियां होना चिंता का विषय है, विशेषकर तब जब उन गलतियों को सुधारने के लिए पर्याप्त जवाबदेही दिखाई नहीं देती। भारत के अनुसार, आतंकवाद जैसे संवेदनशील विषय पर तैयार की जाने वाली रिपोर्ट में ऐतिहासिक घटनाओं, आधिकारिक दस्तावेजों और संबंधित व्यक्तियों की स्थिति का सही संदर्भ देना आवश्यक है। ऐसी रिपोर्टों में अधूरी जानकारी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने गलत तस्वीर पेश कर सकती है।
भारत की आपत्ति का मुख्य केंद्र दाऊद इब्राहिम की स्थिति और डी-कंपनी को ‘भारत आधारित’ बताए जाने का विवरण है। भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि दाऊद इब्राहिम वर्ष 2003 में संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में शामिल किए जाने से काफी पहले भारत छोड़ चुका था। भारत का तर्क है कि दाऊद और उसके नेटवर्क की गतिविधियों को केवल भारत से जोड़कर प्रस्तुत करने के बजाय उसके विदेश में रहने, अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी नेटवर्क से कथित संबंधों और उसके खिलाफ चल रही कार्रवाई के व्यापक संदर्भ को भी शामिल किया जाना चाहिए।
दाऊद इब्राहिम का नाम भारत में वर्ष 1993 में हुए मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों के बाद से आतंकवाद और संगठित अपराध से जुड़े मामलों में प्रमुखता से सामने आता रहा है। इन धमाकों ने देश की आर्थिक राजधानी को गंभीर रूप से प्रभावित किया था और जांच एजेंसियों ने दाऊद तथा उससे जुड़े नेटवर्क की भूमिका को लेकर कार्रवाई की। भारत लंबे समय से दाऊद को पकड़कर न्याय के कटघरे में लाने की मांग करता रहा है। इसी पृष्ठभूमि में भारत का कहना है कि उसके बारे में किसी भी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में पुराने मामलों और घटनाक्रमों का पर्याप्त उल्लेख होना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, दाऊद इब्राहिम कासकर को 3 नवंबर 2003 को अल-कायदा प्रतिबंध व्यवस्था के तहत सूचीबद्ध किया गया था। आधिकारिक सूची में उसके साथ पाकिस्तान के कराची स्थित पते भी दर्ज हैं। भारत ने इस रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि दाऊद की अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों और उसके कथित संबंधों को समझने के लिए उसके सूचीबद्ध किए जाने की परिस्थितियों तथा समयक्रम पर ध्यान देना जरूरी है। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में किसी व्यक्ति का नाम शामिल होना और किसी रिपोर्ट में उसके संगठन को किसी विशेष देश से जुड़ा बताना दो अलग-अलग विषय हैं। मौजूदा विवाद मुख्य रूप से रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए विवरण और उसके संदर्भ को लेकर है।
दाऊद इब्राहिम को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं। भारत का दावा है कि दाऊद पाकिस्तान में रह रहा है और वहां से अपने आपराधिक नेटवर्क का संचालन करता रहा है। भारतीय अधिकारियों ने समय-समय पर उसकी कथित मौजूदगी और उससे जुड़े विवरणों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया है। वहीं, पाकिस्तान उसकी मौजूदगी को लेकर इनकार करता रहा है। इस कारण दाऊद का मामला केवल संगठित अपराध तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत-पाकिस्तान संबंधों और आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग से भी जुड़ा हुआ है।
भारत ने संयुक्त राष्ट्र की बैठक में दाऊद इब्राहिम की कथित पाकिस्तान में मौजूदगी का उल्लेख करते हुए ओसामा बिन लादेन के मामले से भी तुलना की। भारतीय प्रतिनिधि ने संयुक्त राष्ट्र के रिकॉर्ड में दर्ज विवरणों का हवाला दिया और पाकिस्तान को लेकर भारत की चिंताओं को दोहराया। भारत का कहना है कि आतंकवाद से जुड़े मामलों में उपलब्ध आधिकारिक जानकारी का निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए और किसी भी निष्कर्ष को पर्याप्त तथ्यों के आधार पर प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
इस विवाद के दौरान भारत ने आतंकवाद और मानवाधिकारों के मुद्दे पर भी अपना रुख स्पष्ट किया। भारतीय पक्ष ने कहा कि मानवाधिकारों की रक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन इस सिद्धांत का इस्तेमाल आतंकवाद को उचित ठहराने या आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े लोगों के बचाव के लिए नहीं किया जाना चाहिए। भारत के अनुसार, आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई और मानवाधिकारों के संरक्षण को तथ्यों, निष्पक्षता और अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर देखा जाना चाहिए। भारत ने यह भी जोर दिया कि संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदकों को अपने निष्कर्ष प्रस्तुत करते समय आधिकारिक रिकॉर्ड और ऐतिहासिक तथ्यों की सावधानीपूर्वक जांच करनी चाहिए।
इसी बैठक के दौरान जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को लेकर पाकिस्तान की टिप्पणियों पर भी भारत ने प्रतिक्रिया दी। भारतीय प्रतिनिधि ने दोनों क्षेत्रों को भारत का अभिन्न हिस्सा बताते हुए पाकिस्तान के आरोपों को खारिज किया। इससे स्पष्ट हुआ कि संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद और मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दों के साथ-साथ भारत-पाकिस्तान के बीच व्यापक कूटनीतिक मतभेद भी चर्चा का हिस्सा बने रहे।
कुल मिलाकर, दाऊद इब्राहिम और डी-कंपनी से संबंधित रिपोर्ट पर भारत की आपत्ति का मुख्य आधार तथ्यात्मक सटीकता, ऐतिहासिक घटनाक्रम और सही संदर्भ है। भारत का कहना है कि दाऊद वर्ष 2003 में संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में शामिल किए जाने से पहले ही भारत छोड़ चुका था और उसके अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े पहलुओं को पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक रिकॉर्ड में उसकी सूचीबद्धता की तारीख 3 नवंबर 2003 दर्ज है। इस विवाद ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टों में तथ्य-जांच, निष्पक्षता और जवाबदेही के महत्व को रेखांकित किया है।




