युद्ध और आतंकवाद पर जयशंकर का रुख स्पष्ट, शांति के लिए कूटनीति को बताया जरूरी

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भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने आतंकवाद के खिलाफ भारत के कड़े रुख को दोहराते हुए कहा है कि आतंकवाद को किसी देश की नीति या रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना स्वीकार नहीं किया जा सकता। आतंकवाद आज पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को उन देशों की जवाबदेही तय करने की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए, जो आतंकवादी संगठनों को धन, हथियार, प्रशिक्षण या सुरक्षित ठिकाने उपलब्ध कराते हैं। भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह मांग करता रहा है कि आतंकवाद के सभी रूपों के खिलाफ समान और निर्णायक कार्रवाई की जाए तथा इस मुद्दे पर किसी तरह के दोहरे मानदंड नहीं अपनाए जाएं।

जयशंकर का मानना है कि आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसके लिए आतंकवादी संगठनों के वित्तीय नेटवर्क को कमजोर करना, उनकी गतिविधियों पर निगरानी रखना और उन्हें सहायता पहुंचाने वाले तंत्र के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना आवश्यक है। आतंकवाद को मिलने वाले आर्थिक और संगठनात्मक समर्थन पर रोक लगाए बिना इस समस्या का स्थायी समाधान हासिल करना मुश्किल होगा। भारत का रुख स्पष्ट है कि आतंकवाद को किसी भी राजनीतिक या रणनीतिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों में भी आतंकवाद एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। भारत लगातार सीमा पार आतंकवाद को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताता रहा है। जयशंकर ने विभिन्न अवसरों पर स्पष्ट किया है कि भारत अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ शांतिपूर्ण और सामान्य संबंध चाहता है, लेकिन इसके लिए आतंकवाद के मुद्दे पर ठोस कार्रवाई जरूरी है। भारत का मानना है कि आतंकवादी गतिविधियों की अनदेखी करके स्थायी विश्वास और सामान्य संबंध स्थापित नहीं किए जा सकते। दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार के लिए सुरक्षा संबंधी चिंताओं को दूर करना और आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी कदम उठाना महत्वपूर्ण है।

भारत की सुरक्षा नीति में पिछले कुछ वर्षों के दौरान आए बदलाव का उल्लेख करते हुए सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट हवाई कार्रवाई और ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों को भी राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में देखा जाता है। इन कार्रवाइयों के माध्यम से भारत ने आतंकवादी हमलों के जवाब में अपनी सुरक्षा चिंताओं को गंभीरता से लेने का संदेश दिया है। भारत की नीति का प्रमुख उद्देश्य देश की संप्रभुता, नागरिकों की सुरक्षा और सीमाओं की रक्षा करना है। साथ ही, भारत यह भी मानता है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।

आतंकवाद के मुद्दे के अलावा जयशंकर ने वैश्विक संघर्षों और युद्धों के व्यापक प्रभाव पर भी चिंता जताई है। आज के वैश्वीकरण के दौर में किसी एक क्षेत्र में होने वाला युद्ध केवल उसी इलाके तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका असर दुनिया के दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था, व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और आम लोगों के जीवन पर भी पड़ता है। रूस-यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया में जारी तनाव जैसी परिस्थितियों ने यह स्पष्ट किया है कि अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता का प्रभाव दूर-दराज के देशों तक पहुंच सकता है। इससे ईंधन, खाद्य पदार्थों और उर्वरकों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं प्रभावित हो सकती हैं।

विकासशील देशों के लिए युद्धों के आर्थिक परिणाम विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण होते हैं। ऊर्जा और खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि से आम लोगों के घरेलू बजट पर असर पड़ता है, जबकि व्यापार और परिवहन की लागत बढ़ने से उद्योगों तथा छोटे कारोबारों के सामने भी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। जयशंकर के व्यापक कूटनीतिक दृष्टिकोण के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय शांति और स्थिरता केवल किसी एक देश की जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए सभी देशों को मिलकर काम करना होगा और ऐसे प्रयास करने होंगे, जिनसे संघर्षों का विस्तार रोका जा सके तथा उनके मानवीय और आर्थिक नुकसान को कम किया जा सके।

भारत की विदेश नीति में संवाद और कूटनीति को अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। भारत का रुख रहा है कि युद्धों और भू-राजनीतिक तनावों को समाप्त करने के लिए संबंधित पक्षों के बीच बातचीत की संभावनाएं तलाशनी चाहिए। लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष किसी भी पक्ष के लिए स्थायी लाभ सुनिश्चित नहीं करते, बल्कि मानवीय संकट, आर्थिक नुकसान और अंतरराष्ट्रीय अविश्वास को बढ़ा सकते हैं। इसलिए कूटनीतिक बातचीत, आपसी संपर्क और शांतिपूर्ण समाधान की कोशिशों को लगातार आगे बढ़ाना आवश्यक है।

हालांकि, आतंकवाद और देशों के बीच पारंपरिक संघर्षों के समाधान के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं। आतंकवाद के मामले में उसके नेटवर्क, वित्तपोषण और उसे संरक्षण देने वाले तंत्र के खिलाफ जवाबदेही तथा प्रभावी कार्रवाई जरूरी है। वहीं, व्यापक अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में संवाद, कूटनीति और आपसी सहमति के माध्यम से तनाव कम करने की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। भारत का दृष्टिकोण इन दोनों पहलुओं को साथ लेकर चलने पर जोर देता है, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता किए बिना शांति की संभावनाओं को मजबूत किया जा सके।

संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। आतंकवाद से निपटने के लिए देशों के बीच खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान, आतंकवादी वित्तपोषण पर रोक, सीमा पार नेटवर्क की निगरानी और आतंकवादी संगठनों को सुरक्षित ठिकाने उपलब्ध कराने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई आवश्यक है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र चार्टर और देशों की संप्रभुता का सम्मान करते हुए विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के प्रयास जारी रहने चाहिए। आतंकवाद के खिलाफ समान मानक अपनाने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग मजबूत करने से वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

जयशंकर के बयानों का व्यापक संदेश यही है कि भारत शांति और संवाद का समर्थक है, लेकिन आतंकवाद के सामने नरमी बरतने के पक्ष में नहीं है। आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देशों की जवाबदेही तय करना, आतंकवादी संगठनों के वित्तीय नेटवर्क को कमजोर करना और वैश्विक स्तर पर सहयोग बढ़ाना भारत की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल हैं। दूसरी ओर, युद्धों और भू-राजनीतिक तनावों को कम करने के लिए बातचीत तथा कूटनीतिक प्रयासों को भी महत्व दिया जाना चाहिए। आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई, राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा और अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के बीच संतुलन बनाकर ही दुनिया में स्थायी शांति और स्थिरता की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

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