ब्रिक्स संसदीय मंच में भारत का जोर, ओम बिरला ने आपसी विश्वास और सहयोग का किया आह्वान

SHARE:

भारत की मेजबानी में 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच की शुरुआत 26 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में हुई। इस दो दिवसीय सम्मेलन में ब्रिक्स सदस्य देशों और भागीदार देशों के संसदीय प्रतिनिधि वैश्विक चुनौतियों, लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श कर रहे हैं। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अपने संबोधन में संवाद, कूटनीति और सहयोग को वैश्विक समस्याओं के समाधान का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय संघर्षों और युद्धों के दौर में देशों के बीच आपसी विश्वास बनाए रखना तथा विवादों का शांतिपूर्ण समाधान तलाशना बेहद जरूरी है।

ओम बिरला ने अपने संबोधन में क्षेत्रीय संघर्षों, आर्थिक अस्थिरता, व्यापारिक तनाव, आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन समस्याओं का प्रभाव किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और आम नागरिकों के जीवन पर पड़ता है। ऐसे हालात में देशों को टकराव के बजाय बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से समाधान तलाशने चाहिए। उन्होंने संसदीय संस्थाओं से भी अंतरराष्ट्रीय तनाव कम करने, आपसी समझ बढ़ाने और साझा हितों के लिए सहयोग को मजबूत करने में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।

इस वर्ष आयोजित ब्रिक्स संसदीय मंच का मुख्य विषय ‘जन-केंद्रित विकास के लिए संसदों को सशक्त बनाना’ है। सम्मेलन 26 और 27 अक्टूबर को संविधान सदन के ऐतिहासिक केंद्रीय कक्ष में आयोजित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य विभिन्न देशों की संसदों के बीच सहयोग बढ़ाना, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को मजबूत करना और वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए साझा दृष्टिकोण विकसित करना है। इस वर्ष ब्रिक्स संसदीय मंच की स्थापना के 20 वर्ष पूरे होने के अवसर पर भी चर्चा हो रही है। सम्मेलन में संसदीय प्रतिनिधियों को अपने अनुभव साझा करने और नागरिकों की जरूरतों के अनुरूप नीतियों तथा संस्थागत सुधारों पर विचार करने का अवसर मिल रहा है।

ओम बिरला ने ब्रिक्स देशों की वैश्विक भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि सदस्य देशों की भाषाओं, संस्कृतियों और सामाजिक परिस्थितियों में भिन्नता होने के बावजूद वे साझा उद्देश्यों के लिए मिलकर काम कर सकते हैं। उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लिए गए संकल्पों को वास्तविक परिणामों में बदलना आवश्यक है। इस दिशा में संसदें कानून निर्माण, बजट पारित करने, सरकारी नीतियों पर चर्चा करने और सरकारों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। उन्होंने संसदीय संवाद को देशों के बीच विश्वास बढ़ाने और विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने का प्रभावी माध्यम बताया।

सम्मेलन के दौरान संसदीय संस्थाओं को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने पर भी चर्चा हो रही है। इसके अंतर्गत लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई के जिम्मेदार उपयोग, वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार और सतत विकास जैसे विषय शामिल हैं। संसदीय प्रतिनिधि इस बात पर विचार कर रहे हैं कि तकनीकी बदलावों और तेजी से बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बीच संसदें अपनी भूमिका को किस प्रकार अधिक प्रभावी बना सकती हैं। इसके साथ ही युवाओं की आकांक्षाओं को अवसरों से जोड़ने और पर्यावरण संरक्षण के साथ आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने जैसे मुद्दों पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता में वैश्विक दक्षिण के देशों की आवाज को मजबूत बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है। विकासशील देशों की आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों को अंतरराष्ट्रीय निर्णय प्रक्रिया में उचित स्थान दिलाना इस व्यापक प्रयास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत का दृष्टिकोण रहा है कि वैश्विक संस्थाओं को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और प्रभावी बनाया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार का मुद्दा भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। संसदीय मंच देशों को अपनी प्राथमिकताओं और अनुभवों को साझा करने के साथ-साथ साझा समस्याओं पर सहमति विकसित करने का अवसर देता है।

ब्रिक्स संसदीय मंच के उद्घाटन से पहले ओम बिरला ने रूस के संसदीय प्रतिनिधिमंडल से भी मुलाकात की। रूसी स्टेट ड्यूमा के अध्यक्ष व्याचेस्लाव वोलोदिन के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल के साथ हुई बातचीत में भारत और रूस के संसदीय संबंधों को मजबूत बनाने पर चर्चा की गई। दोनों देशों के राजनयिक संबंधों के 80 वर्ष पूरे होने के अवसर का भी उल्लेख हुआ। बैठक में संसदीय प्रतिनिधिमंडलों के नियमित आदान-प्रदान, युवा और महिला सांसदों के बीच संपर्क बढ़ाने तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सहयोग को आगे बढ़ाने जैसे मुद्दे शामिल रहे। बातचीत में आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक प्रयासों और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई।

सम्मेलन से पहले ओम बिरला ने उम्मीद जताई थी कि सदस्य देश साझा मुद्दों पर सहमति बनाकर संयुक्त घोषणा स्वीकार कर सकेंगे। संसदीय कूटनीति का एक प्रमुख उद्देश्य विभिन्न देशों के बीच मतभेदों के बावजूद साझा आधार तलाशना और अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के लिए सहयोग बढ़ाना है। आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, आर्थिक अस्थिरता और वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार जैसे विषयों पर चर्चा के जरिए सदस्य देशों के बीच समझ विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। सम्मेलन के अंतिम निष्कर्षों और किसी संयुक्त घोषणा की स्थिति की पुष्टि आधिकारिक जानकारी से की जानी चाहिए।

कुल मिलाकर, 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच का उद्देश्य वैश्विक चुनौतियों से निपटने में संसदीय सहयोग की भूमिका को मजबूत करना है। ओम बिरला ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि क्षेत्रीय संघर्षों और अंतरराष्ट्रीय तनावों के बीच संवाद, कूटनीति और आपसी विश्वास का महत्व बढ़ जाता है। संसदें केवल कानून बनाने वाली संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि वे विभिन्न देशों के बीच बातचीत को आगे बढ़ाने और साझा समस्याओं के समाधान के लिए सहमति बनाने में भी योगदान दे सकती हैं। नई दिल्ली में आयोजित यह सम्मेलन सदस्य और भागीदार देशों को जन-केंद्रित विकास, लोकतांत्रिक जवाबदेही और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के मुद्दों पर विचार साझा करने का अवसर प्रदान कर रहा है।

Leave a Comment