SIR में लाखों नाम कटने पर बवाल, कांग्रेस ने पूछा- विदेशी नागरिक कितने मिले?

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देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। कांग्रेस ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि जब लगभग 10 करोड़ मतदाताओं की सूची की जांच के दौरान करीब 1,600 संदिग्ध विदेशी नागरिकों की पहचान होने की जानकारी सामने आई है, तो फिर मतदाता सूची से लाखों नाम हटाने की जरूरत क्यों पड़ी? पार्टी का कहना है कि निर्वाचन आयोग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि हटाए गए नामों के पीछे वास्तविक कारण क्या थे और कितने पात्र भारतीय मतदाता इस प्रक्रिया से प्रभावित हुए हैं। हालांकि, उपलब्ध आंकड़े कुछ राज्यों से संबंधित हैं और इन्हें पूरे देश में पहचाने गए विदेशी नागरिकों की कुल संख्या नहीं माना जा सकता।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने एसआईआर के आंकड़ों को लेकर सवाल उठाए हैं। पार्टी का तर्क है कि यदि मतदाता सूची के पुनरीक्षण का एक उद्देश्य विदेशी नागरिकों और अन्य अपात्र व्यक्तियों की पहचान करना है, तो जांच के बाद सामने आए आंकड़ों का विस्तृत विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए। कांग्रेस ने यह जानने की मांग की है कि मतदाता सूची से हटाए गए नामों में कितने मृत व्यक्तियों के थे, कितने लोग स्थायी रूप से दूसरी जगह चले गए थे, कितने नाम दोहरी प्रविष्टियों के कारण हटाए गए और कितने मामलों में नागरिकता या पात्रता से संबंधित संदेह था। विपक्ष का कहना है कि इस तरह का वर्गीकरण सार्वजनिक होने से पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता बढ़ेगी और वास्तविक मतदाताओं की चिंताओं का समाधान हो सकेगा।

एसआईआर निर्वाचन आयोग की वह प्रक्रिया है, जिसके तहत मतदाता सूची का व्यापक सत्यापन किया जाता है। इसका उद्देश्य सूची में दर्ज नामों और मतदाताओं के विवरण की जांच करना तथा मृत व्यक्तियों, स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके लोगों, दोहरी प्रविष्टियों और अन्य अपात्र प्रविष्टियों की पहचान करना है। इसके तहत बूथ स्तर के अधिकारी मतदाताओं से संबंधित जानकारी और गणना प्रपत्रों के माध्यम से रिकॉर्ड का सत्यापन करते हैं। आयोग का कहना है कि समय के साथ लोगों के स्थान बदलने, मृत्यु की जानकारी दर्ज न होने, नए मतदाताओं के पात्र होने और अन्य कारणों से मतदाता सूची में बदलाव जरूरी हो जाता है। हालांकि, इस प्रक्रिया के दौरान किसी पात्र नागरिक का नाम गलती से हटने की आशंका को लेकर राजनीतिक दलों और मतदाताओं की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं।

उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, कर्नाटक, झारखंड, मेघालय, केरल, गोवा और मिजोरम में लगभग 9.86 करोड़ मतदाताओं वाली सूचियों की समीक्षा के दौरान करीब 1,600 संदिग्ध विदेशी नागरिकों की पहचान से संबंधित आंकड़े सामने आए हैं। इन राज्यों में एसआईआर की स्थिति और आंकड़ों का रिकॉर्ड रखने का तरीका अलग-अलग रहा है। इसलिए इन आंकड़ों के आधार पर देशभर में विदेशी नागरिकों की मौजूदगी या मतदाता सूची से हटाए गए नामों की पूरी तस्वीर का आकलन करना उचित नहीं होगा। इस मुद्दे पर मुख्य विवाद यह है कि व्यापक स्तर पर हुई जांच और विदेशी नागरिकों की पहचान से संबंधित उपलब्ध आंकड़ों के बीच अंतर को किस तरह समझा जाए।

कर्नाटक में एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के कारण यह मुद्दा विशेष चर्चा में है। समाचार रिपोर्टों में राज्य की सूची से करीब 99.76 लाख नाम हटाए जाने का आंकड़ा सामने आया है, जबकि विदेशी नागरिकों के रूप में पहचान कर हटाने के लिए चिह्नित लोगों की संख्या इससे काफी कम बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, 716 विदेशी नागरिकों का आंकड़ा दिया गया, जिनमें 545 नेपाली नागरिक बेंगलुरु उत्तर क्षेत्र से संबंधित बताए गए हैं। केरल में लगभग 500 विदेशी नागरिकों की पहचान की जानकारी सामने आई, जबकि गोवा में 419 संदिग्ध विदेशी पासपोर्ट धारकों का उल्लेख किया गया। झारखंड में तीन विदेशी नागरिकों की पहचान की जानकारी दी गई। मेघालय में नेपाली मूल के दो पुरुषों के नाम मतदाता सूची में पाए जाने की बात कही गई, जबकि मिजोरम के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अनुसार राज्य की मसौदा मतदाता सूची में विदेशी नागरिकों के नाम शामिल होने का कोई प्रमाण नहीं मिला। इन आंकड़ों की व्याख्या करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि संदिग्ध मामलों की पहचान और किसी व्यक्ति की नागरिकता की अंतिम पुष्टि दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हो सकती हैं।

मतदाता सूची से लाखों नाम हटने का अर्थ यह नहीं है कि सभी संबंधित व्यक्ति विदेशी नागरिक थे। एसआईआर के दौरान नाम हटने के कई संभावित कारण हो सकते हैं। इनमें मतदाता की मृत्यु, स्थायी रूप से दूसरी जगह चले जाना, एक से अधिक स्थानों पर नाम दर्ज होना और सत्यापन के दौरान आवश्यक जानकारी उपलब्ध नहीं होना शामिल हैं। कर्नाटक के संबंध में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, लगभग 5.54 करोड़ मतदाताओं के लिए गणना प्रपत्र तैयार किए गए थे। इनमें करीब 4.46 करोड़ प्रपत्र जमा हुए, जबकि लगभग 1.08 करोड़ प्रपत्र अधिकारियों को नहीं मिले। इन मामलों में अनुपस्थित, स्थायी रूप से स्थानांतरित, मृत और दोहरी प्रविष्टियों जैसी विभिन्न श्रेणियां शामिल बताई गईं। इसलिए नाम हटाए जाने के प्रत्येक मामले का कारण अलग-अलग समझना जरूरी है। साथ ही, यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि सत्यापन के दौरान किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से न हटे।

एसआईआर को लेकर विवाद उस समय और बढ़ा जब विभिन्न राज्यों की मसौदा मतदाता सूचियों से लगभग 13 करोड़ नाम बाहर होने का आंकड़ा चर्चा में आया। विपक्ष ने इस संख्या और नाम हटाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। दूसरी ओर, भाजपा की ओर से प्रस्तुत आंकड़ों में करीब 2.8 करोड़ मृत मतदाता, 6.3 करोड़ स्थानांतरित लोग, एक करोड़ दोहरी प्रविष्टियां और लगभग तीन करोड़ ऐसे लोग बताए गए जिनका पता नहीं लगाया जा सका। इन आंकड़ों को संबंधित राजनीतिक पक्ष की ओर से प्रस्तुत विवरण के रूप में देखना चाहिए। प्रत्येक मामले की स्वतंत्र पुष्टि और अंतिम सूची में हुए बदलावों का विवरण सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कितने नाम स्थायी रूप से हटाए गए और कितने मामलों में आगे की जांच या पुनः पंजीकरण की जरूरत पड़ी।

इस विवाद का एक अहम पहलू यह भी है कि विदेशी नागरिकों की पहचान से संबंधित आंकड़े सभी राज्यों में एक समान तरीके से दर्ज नहीं किए गए। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, निर्वाचन आयोग के पास संदिग्ध विदेशी नागरिकों की पहचान का अलग और पूर्ण राज्यवार या राष्ट्रीय संकलन उपलब्ध नहीं था। कुछ राज्यों में ऐसे मामलों को दूसरी श्रेणियों के अंतर्गत दर्ज किया गया। ऐसे में केवल उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि देशभर में मतदाता सूची में कितने विदेशी नागरिक थे या एसआईआर इस उद्देश्य में कितना सफल रहा। यदि आयोग नाम हटाए जाने के कारणों, सत्यापन के परिणामों और विदेशी नागरिकता से संबंधित मामलों का स्पष्ट विवरण सार्वजनिक करता है, तो इस विषय पर उठ रहे सवालों का अधिक ठोस जवाब मिल सकता है।

कांग्रेस की मुख्य मांग है कि निर्वाचन आयोग मतदाता सूची से हटाए गए नामों का विस्तृत ब्योरा सार्वजनिक करे और यह बताए कि अलग-अलग श्रेणियों में कितने नाम हटाए गए। पार्टी का कहना है कि मतदाता सूची को दुरुस्त करना जरूरी है, लेकिन इस प्रक्रिया में पात्र नागरिकों के मताधिकार की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग एसआईआर को मतदाता सूची के सत्यापन और अद्यतन की प्रक्रिया के रूप में देखता है। इस पूरे विवाद में राजनीतिक आरोपों और आधिकारिक रूप से सत्यापित तथ्यों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है, क्योंकि नाम हटाए जाने की संख्या अपने आप में यह साबित नहीं करती कि सभी मामले गलत थे या सभी कार्रवाई सही तरीके से की गई थी।

मतदाताओं के लिए भी इस प्रक्रिया के दौरान अपनी स्थिति की जांच करना महत्वपूर्ण है। जिन लोगों का नाम मसौदा या अंतिम मतदाता सूची में नहीं दिखाई देता, उन्हें अपने राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की आधिकारिक वेबसाइट या संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी के माध्यम से जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। नाम हटाए जाने का कारण जानने के बाद लागू नियमों के अनुसार दावा, आपत्ति या पुनः पंजीकरण की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। मतदाता सूची में गलत प्रविष्टियों को हटाना चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है, लेकिन किसी पात्र मतदाता को सूची से बाहर होने से बचाना भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बुनियादी आवश्यकता है।

कुल मिलाकर, एसआईआर को लेकर उठा विवाद मतदाता सूची की शुद्धता, पारदर्शिता और नागरिकों के मताधिकार से जुड़ा है। छह राज्यों में लगभग 1,600 संदिग्ध विदेशी नागरिकों की पहचान से संबंधित आंकड़े कांग्रेस के सवालों का आधार बने हैं, लेकिन इनसे पूरे देश की स्थिति का अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। विवाद का समाधान तभी संभव है जब निर्वाचन आयोग राज्यवार और श्रेणीवार आंकड़े स्पष्ट रूप से उपलब्ध कराए, हटाए गए नामों के कारणों की जानकारी दे और पात्र मतदाताओं को सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए प्रभावी अवसर प्रदान करे।

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