आरक्षण पर नई बहस: एससी-एसटी को 23% की जगह 78% प्रतिनिधित्व, जनरल को मिला सिर्फ 9%

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देश में आरक्षण व्यवस्था को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, कई संस्थानों और सरकारी विभागों में एससी (अनुसूचित जाति) और एसटी (अनुसूचित जनजाति) वर्ग को कुल 78% तक आरक्षण या प्रतिनिधित्व मिल रहा है। यह आंकड़ा पारंपरिक 22.5% से तीन गुना से भी अधिक है।

वहीं, सामान्य वर्ग (General Category) के हिस्से में सिर्फ 9 फीसदी सीटें ही आ रही हैं, जिससे इस वर्ग के बीच असंतोष और नाराज़गी बढ़ रही है।

 क्या कहती है संविधान में आरक्षण की सीमा?

भारतीय संविधान के अनुसार, एससी वर्ग को 15% और एसटी वर्ग को 7.5% आरक्षण दिया गया है। कुल मिलाकर यह आंकड़ा 22.5% होता है। इसके अलावा 27% आरक्षण ओबीसी वर्ग के लिए निर्धारित है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में कहा है कि आरक्षण की कुल सीमा 50% से अधिक नहीं होनी चाहिए।

लेकिन ग्राउंड पर हकीकत इससे अलग है।

कैसे बढ़ा एससी-एसटी का कोटा 78% तक?

जानकारों के अनुसार, कुछ विभागों में यह आंकड़ा कई कारणों से बढ़ गया है:

  • प्रमोशन में आरक्षण

  • बैकलॉग सीटों की भरपाई

  • विशेष भर्ती अभियान

  • राज्यों द्वारा लागू की गई अतिरिक्त योजनाएं

इन सभी वजहों से कुछ जगहों पर एससी-एसटी का प्रतिनिधित्व 78% तक पहुंच गया है, जबकि सामान्य वर्ग के लिए अवसर सीमित होते जा रहे हैं।

 सामान्य वर्ग में आक्रोश, सोशल मीडिया पर हो रहा विरोध

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर आम जनता खासकर सामान्य वर्ग के युवाओं में भारी नाराज़गी देखी जा रही है। कई छात्रों और संगठनों ने इसे संविधान की भावना के विरुद्ध बताया है और इस पर पुनर्विचार की मांग की है।

 क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट?

सुप्रीम कोर्ट पहले ही अपने कई फैसलों में कह चुका है कि:

“आरक्षण का उद्देश्य समानता लाना है, न कि एक और असमानता पैदा करना।”

यदि आरक्षण का अनुपात 50% से ज्यादा होता है, तो यह मेरिट आधारित चयन प्रणाली को प्रभावित करता है। अदालत ने यह भी कहा था कि आरक्षण स्थायी समाधान नहीं हो सकता।

आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक, सामाजिक और संवैधानिक तीनों स्तरों पर संवेदनशील है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार इस विषय पर कोई स्पष्ट रुख अपनाती है या यह बहस यूं ही चलती रहेगी।

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