संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में चल रहे उच्च-स्तरीय सत्र के दौरान यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने भारत को लेकर एक अहम बयान दिया। उन्होंने कहा कि भारत “ज्यादातर रूप से” यूक्रेन के साथ है और यूरोप को चाहिए कि वह नई दिल्ली के साथ और गहरे संबंध बनाए ताकि रूस पर ऊर्जा निर्भरता को कम किया जा सके। ज़ेलेंस्की का यह रुख अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के उन आरोपों के विपरीत रहा, जिनमें उन्होंने भारत और चीन पर रूस से तेल खरीदकर युद्ध को वित्तीय मदद देने का आरोप लगाया था। ट्रम्प ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि दुनिया को ऐसी नीतियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाना चाहिए, हालांकि उनके इन दावों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठे हैं।
ज़ेलेंस्की और ट्रम्प की यूएन मंच पर हुई बातचीत के बाद यूक्रेनी राष्ट्रपति ने चीन को लेकर भी अपनी राय सामने रखी। उन्होंने कहा कि वह उम्मीद करते हैं कि ट्रम्प जैसी कूटनीतिक ताकत चीन के रवैये को बदलने में भूमिका निभा सकती है, लेकिन यह आसान नहीं होगा क्योंकि चीन के अपने हित और स्वार्थ अलग हैं। ज़ेलेंस्की ने साफ किया कि अब तक चीन ने युद्ध को समाप्त कराने के लिए कोई ठोस पहल नहीं की है।
भारत को लेकर ज़ेलेंस्की ने संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने स्वीकार किया कि नई दिल्ली की ऊर्जा जरूरतें और बाजार की परिस्थितियां उसे रूस के साथ व्यापार जारी रखने को मजबूर करती हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने भारत को एक सहयोगी और महत्वपूर्ण साझेदार बताया। साथ ही उन्होंने यूरोप से अपील की कि भारत के साथ संबंधों को और मजबूत किया जाए ताकि रणनीतिक रूप से रूस पर निर्भरता कम हो सके।
इन बयानों से यह स्पष्ट होता है कि महासभा के मंच पर सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप ही नहीं, बल्कि कूटनीतिक संदेश भी दिए जा रहे हैं। ट्रम्प के आरोपों ने भारत-यूक्रेन-अमेरिका रिश्तों पर अस्थायी तनाव की स्थिति जरूर पैदा की, लेकिन ज़ेलेंस्की का संतुलित और सकारात्मक रुख दर्शाता है कि यूक्रेन भारत से रिश्ते बिगाड़ने के बजाय उन्हें और बेहतर बनाने की दिशा में देख रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में ऊर्जा व्यापार, कूटनीति और भू-राजनीतिक समीकरण ही इन रिश्तों का असली भविष्य तय करेंगे।




