राष्ट्रीय हरित अधिकरण का निर्देश: स्कूलों से हटेंगी एस्बेस्टस शीट्स, सरकार छह माह में बनाएगी नई नीति

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नई दिल्ली — राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने देशभर के स्कूलों में लगी एस्बेस्टस (Asbestos) की छतों को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अधिकरण ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह छह महीने के भीतर एक व्यापक राष्ट्रीय नीति तैयार करे, जिसके तहत सभी शैक्षणिक संस्थानों से चरणबद्ध तरीके से एस्बेस्टस की छतें हटाई जाएं। एनजीटी ने यह निर्णय बच्चों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए लिया है, क्योंकि एस्बेस्टस से निकलने वाले सूक्ष्म रेशे (fibres) सांस के जरिए शरीर में जाकर गंभीर फेफड़ों की बीमारियां, यहां तक कि कैंसर जैसी स्थितियां भी पैदा कर सकते हैं।

अधिकरण की पीठ ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) को निर्देश दिया है कि वह देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के स्कूलों का सर्वे कराए और यह पता लगाए कि कहां-कहां एस्बेस्टस की छतें लगी हुई हैं। इसके बाद इन छतों को सुरक्षित ढंग से हटाने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure – SOP) बनाई जाए, जिसमें पर्यावरणीय सुरक्षा, मजदूरों की सुरक्षा और अपशिष्ट के उचित निपटान के दिशा-निर्देश हों। एनजीटी ने यह भी कहा है कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCBs) इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी करें और समय-समय पर रिपोर्ट पेश करें।

अधिकरण ने आदेश दिया कि जिन स्कूलों में एस्बेस्टस शीट अभी भी उपयोग में हैं और खराब हालत में नहीं हैं, वहां तत्काल उन्हें हटाने की जरूरत नहीं है, बल्कि उन पर एक सुरक्षात्मक कोटिंग लगाई जा सकती है ताकि फाइबर हवा में न फैलें। लेकिन जहां ये शीट्स टूट चुकी हैं या खराब हालत में हैं, उन्हें जल्द से जल्द हटाया जाना आवश्यक है। एनजीटी ने स्पष्ट किया है कि हटाने की प्रक्रिया केवल प्रशिक्षित और लाइसेंस प्राप्त विशेषज्ञों द्वारा ही की जानी चाहिए ताकि किसी भी प्रकार की प्रदूषण की संभावना न रहे।

एस्बेस्टस हटाने के बाद उत्पन्न होने वाले कचरे का निपटान भी एक बड़ी चिंता है। इस संबंध में एनजीटी ने निर्देश दिया है कि एस्बेस्टस अपशिष्ट को गीला करके, सीलबंद पैकिंग में रखकर, केवल अधिकृत निपटान स्थलों तक पहुंचाया जाए और उसे अन्य कचरे के साथ मिलाने की अनुमति न दी जाए। इस पूरी प्रक्रिया में स्कूल प्रशासन को भी आवश्यक प्रशिक्षण दिया जाएगा ताकि वे सुरक्षा मानकों का पालन कर सकें।

मामले की पृष्ठभूमि में यह पाया गया कि देश के कई सरकारी और निजी स्कूलों में अब भी पुरानी एस्बेस्टस शीटों का इस्तेमाल छतों के रूप में किया जा रहा है, खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में। वर्षों पुरानी ये शीटें अब टूटने और धूल में बदलने लगी हैं, जिससे वातावरण में खतरनाक फाइबर फैलते हैं और बच्चों के स्वास्थ्य को गंभीर खतरा होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, एस्बेस्टस के लगातार संपर्क में रहने से फेफड़ों की बीमारियां, अस्थमा, और “एस्बेस्टोसिस” नामक गंभीर रोग हो सकता है, जो कई बार जानलेवा भी साबित होता है।

एनजीटी ने केंद्र और राज्य सरकारों को यह भी निर्देश दिया कि वे लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लिए अभियान चलाएं और स्कूलों को वैकल्पिक, सुरक्षित छतों के विकल्प उपलब्ध कराएं। अधिकरण ने कहा कि नीति बनाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उसका क्रियान्वयन भी समयबद्ध और पारदर्शी होना चाहिए।

इस फैसले को पर्यावरण विशेषज्ञों और शिक्षा क्षेत्र के जानकारों ने सराहा है। उनका कहना है कि यह कदम बच्चों को एक सुरक्षित और स्वच्छ शैक्षणिक वातावरण प्रदान करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी चेताया है कि एस्बेस्टस हटाने का कार्य महंगा और तकनीकी दृष्टि से जटिल है, इसलिए सरकार को इसके लिए पर्याप्त फंड और प्रशिक्षित कर्मियों की व्यवस्था करनी होगी।

कुल मिलाकर, NGT का यह आदेश न केवल पर्यावरण सुरक्षा की दिशा में बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए भी एक ऐतिहासिक पहल है। यदि सरकार इस पर तेजी से अमल करती है, तो आने वाले वर्षों में देश के लाखों बच्चों को जहरीली एस्बेस्टस की सांस रोकने वाली छतों से मुक्ति मिल सकेगी और उन्हें एक सुरक्षित भविष्य की सौगात दी जा सकेगी।

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