भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना का संयुक्त युद्धाभ्यास ‘त्रिशूल’ इन दिनों पश्चिमी सीमा क्षेत्र में पूरे जोश और रणनीतिक समन्वय के साथ चल रहा है। यह अभ्यास 30 अक्टूबर से शुरू हुआ है और राजस्थान तथा गुजरात की सीमाओं के रेगिस्तानी इलाकों में आयोजित किया जा रहा है, जो पाकिस्तान की सीमा से सटे हुए हैं। इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य तीनों सेनाओं के बीच ज़मीनी, हवाई और समुद्री अभियानों के तालमेल को मज़बूत करना और भविष्य के बहु-क्षेत्रीय (Multi-Domain) युद्ध परिदृश्यों में उनकी तैयारियों को परखना है।
‘त्रिशूल’ अभ्यास में हजारों सैनिकों के साथ नौसेना के युद्धपोत, पनडुब्बियाँ, वायुसेना के अत्याधुनिक लड़ाकू विमान और कई उन्नत तकनीकी प्रणालियाँ शामिल हैं। इसमें अम्फीबियस (जल-थल) ऑपरेशन, ड्रोन व काउंटर-ड्रोन अभ्यास, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, साइबर और स्पेक्ट्रम मॉनिटरिंग जैसे आधुनिक सैन्य प्रयोग किए जा रहे हैं। इस बार के अभ्यास की सबसे खास बात यह है कि इसमें भारतीय सेना की नई गठित भैरव और अश्नि बटालियनों को भी शामिल किया गया है। ये इकाइयाँ तेज, चुस्त और अत्याधुनिक तकनीक से लैस हैं, जिनका उद्देश्य सीमित समय में गहरे और सटीक हमले करने की क्षमता को विकसित करना है।
रिपोर्टों के मुताबिक, भैरव बटालियनें विशेष अभियानों के लिए तैयार की गईं हैं, जिनमें पैदल सेना, तोपखाना, सिग्नल और एयर डिफेंस के बीच सीधा समन्वय स्थापित करने की व्यवस्था की गई है। प्रत्येक बटालियन में लगभग 250 सैनिक होते हैं, और भविष्य में ऐसी और इकाइयों को तैनात करने की योजना भी बनाई जा रही है। इस अभ्यास के दौरान भारत ने अपने सीमावर्ती क्षेत्रों में हवाई क्षेत्र हेतु NOTAM (Notice to Airmen) जारी किया, वहीं पाकिस्तान ने भी अपनी तरफ नौसेना संबंधी नेविगेशनल वार्निंग जारी कर सतर्कता बढ़ा दी।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, ‘त्रिशूल’ का उद्देश्य तीनों सेनाओं के बीच वास्तविक अभियान और प्रणालीगत स्तर पर बेहतर तालमेल स्थापित करना है ताकि किसी भी परिस्थिति में सामरिक प्रतिक्रिया तेज़ और सटीक हो। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे ट्राई-सर्विस अभ्यास न केवल पारंपरिक युद्ध क्षमता को मज़बूत करते हैं, बल्कि साइबर, इलेक्ट्रॉनिक्स और स्पेस-टेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में इंटरऑपरेबिलिटी को भी बढ़ाते हैं।
इस तरह ‘त्रिशूल’ युद्धाभ्यास भारत की सैन्य शक्ति, तकनीकी उन्नति और रणनीतिक तत्परता का प्रतीक बन गया है। यह अभ्यास न केवल भारत की सीमाओं की सुरक्षा को मज़बूत करने का संकेत देता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि देश की सशस्त्र सेनाएँ भविष्य के किसी भी बहु-आयामी युद्ध परिदृश्य के लिए पूरी तरह तैयार हैं।




