डीएमके की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: तमिलनाडु में SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग

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तमिलनाडु की राजनीति में बहुचर्चित मुद्दा बन चुकी स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया अब सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े तक पहुंच गई है। राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दाखिल कर इस प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि चुनाव आयोग द्वारा लागू की गई SIR प्रक्रिया न केवल असंवैधानिक है, बल्कि इससे मतदाताओं के अधिकारों पर भी गहरा असर पड़ सकता है।

डीएमके ने अपनी याचिका में तर्क दिया है कि SIR का क्रियान्वयन मनमाने ढंग से किया जा रहा है, जिसमें मतदाताओं पर अपनी पहचान और नागरिकता सिद्ध करने का बोझ डाल दिया गया है। याचिका में कहा गया है कि इस प्रक्रिया से बड़ी संख्या में लोगों के नाम मतदाता सूची से हट जाने की आशंका है, जिससे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हो सकता है। पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट से इस प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है, ताकि मतदाता सूची की पारदर्शिता और निष्पक्षता बनी रहे।

सुप्रीम कोर्ट ने डीएमके की इस याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है और मामले को 11 नवंबर 2025 को सूचीबद्ध करने का निर्णय लिया है। इस तारीख को अदालत में डीएमके और चुनाव आयोग दोनों पक्षों की दलीलें सुनी जाएंगी। अदालत यह तय करेगी कि क्या SIR प्रक्रिया पर अस्थायी या पूर्ण रोक लगाई जाए, या फिर इसे कुछ दिशा-निर्देशों के साथ जारी रखने की अनुमति दी जाए।

उल्लेखनीय है कि चुनाव आयोग ने तमिलनाडु सहित कई राज्यों में SIR प्रक्रिया शुरू की है, जिसके तहत बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) को घर-घर जाकर मतदाताओं की जानकारी सत्यापित करने और फॉर्म भरवाने का निर्देश दिया गया है। आयोग का कहना है कि इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन और सटीक बनाना है। हालांकि, राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी और कुछ सामाजिक संगठनों का कहना है कि यह प्रक्रिया मतदाताओं के अधिकारों को सीमित कर सकती है और कई लोगों को सूची से बाहर कर सकती है।

इस पूरे मामले को लेकर राज्य में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। डीएमके के साथ कई सहयोगी दलों और नागरिक संगठनों ने भी SIR के खिलाफ आवाज उठाई है। इन संगठनों का कहना है कि जब तक इस प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता पर स्पष्ट निर्णय नहीं आता, तब तक इसे लागू नहीं किया जाना चाहिए। वहीं, विपक्षी दलों का रुख फिलहाल संयमित है, लेकिन उन्होंने भी यह कहा है कि चुनाव आयोग को किसी भी सुधार प्रक्रिया में पारदर्शिता और समानता सुनिश्चित करनी चाहिए।

अब सभी की निगाहें 11 नवंबर को होने वाली सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं, जहाँ यह तय होगा कि SIR पर रोक लगेगी या यह प्रक्रिया संशोधित रूप में जारी रहेगी। यह फैसला न केवल तमिलनाडु बल्कि पूरे देश की मतदाता सूची सुधार प्रक्रिया पर दूरगामी असर डाल सकता है।

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