भारत और इज़राइल ने मुक्त वाणिज्य समझौते (एफटीए) को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए बातचीत शुरू करने के लिए आधिकारिक रूपरेखा (Terms of Reference) पर सहमति बना ली है। हाल ही में इज़राइल दौरे पर गए भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और इज़राइल के उद्योग व अर्थव्यवस्था मंत्री नीर बरकाट के बीच हुई बैठक में यह फैसला लिया गया। दोनों देशों का उद्देश्य द्विपक्षीय व्यापार को नई गति देना और निवेश के अवसरों को सुगम बनाना है। इस पहल को एक रणनीतिक आर्थिक साझेदारी के रूप में देखा जा रहा है, जो आने वाले वर्षों में दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत आधार प्रदान कर सकती है।
वार्ता की रूपरेखा में सबसे महत्वपूर्ण तत्व यह रखा गया है कि एफटीए के पहले चरण के दौरान उन क्षेत्रों पर फोकस किया जाए जहाँ समझौता जल्दी और आसानी से हो सकता है। इन ‘लो-हैंगिंग फ्रूट्स’ में ऐसे उत्पाद, सेवाएँ और नियम शामिल होंगे जहाँ टकराव की संभावना कम है और व्यापारिक समुदाय को त्वरित लाभ दिया जा सकता है। यह मॉडल भारत की उन नई व्यापार नीतियों के अनुरूप है जिसमें प्रारंभिक चरण में सुनिश्चित लाभ प्रदान कर आगे के जटिल मुद्दों पर धीरे-धीरे प्रगति करने का लक्ष्य रखा जाता है।
एफटीए वार्ता की रणनीति में कई प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं—जैसे टैरिफ में कमी, गैर-शुल्क बाधाओं का समाधान, कस्टम्स प्रक्रियाओं का सरलीकरण, सेवा क्षेत्र का उदारीकरण, तकनीकी व नवाचार क्षेत्र में सहयोग और निवेश को बढ़ावा देने के उपाय। दोनों देश इस बात पर सहमत हैं कि व्यापारिक बाधाओं को कम कर पारदर्शी व आधुनिक नियमों की व्यवस्था स्थापित करनी होगी, ताकि उद्योगों और व्यवसायों को स्थिरता मिले और भविष्य की योजना बनाना आसान हो सके।
यह समझौता ऐसे समय में आ रहा है जब भारत-इज़राइल व्यापार में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। पिछले वित्तीय वर्ष में कुछ क्षेत्रों में निर्यात में गिरावट दर्ज की गई, जिससे यह आवश्यकता महसूस हुई कि दोनों देश ऐसी व्यवस्था बनाएं जो व्यापार को स्थिरता और विस्तार दे सके। इस एफटीए से रक्षा तकनीक, कृषि-टेक्नोलॉजी, साइबर सुरक्षा, मेडटेक, स्टार्टअप नवाचार और सेवा क्षेत्र में सहयोग की नई संभावनाएँ खुलने की उम्मीद है। खासतौर पर हाई-टेक सेक्टर में इज़राइल की विशेषज्ञता और भारत के विशाल बाजार का संयोजन दोनों देशों के लिए लाभकारी साबित हो सकता है।
हालांकि एफटीए की राह चुनौतियों से मुक्त नहीं है। कई संवेदनशील क्षेत्रों को शुरुआती चरण में अलग रखा जा सकता है ताकि मतभेदों को टाला जा सके और वार्ता निर्बाध आगे बढ़ सके। इसके अलावा, ‘रूल्स ऑफ ओरिजिन’, उत्पाद प्रमाणिकता, निवेश संरक्षण और नियामक मानकों पर विस्तृत बातचीत की आवश्यकता होगी। यही कारण है कि समझौते के पहले चरण को तेज़ी से लागू करने की योजना है, जबकि अधिक जटिल मुद्दों पर चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ा जाएगा।
टर्म्स ऑफ़ रेफरेंस पर सहमति बनने के बाद अब दोनों देशों की तकनीकी टीमें विस्तृत मसौदे तैयार करेंगी। इनमें उत्पादों की टैरिफ लिस्टिंग, सेवाओं का उदारीकरण, निवेश फ्रेमवर्क और व्यापार नियमों को अंतिम रूप देने जैसे कार्य शामिल होंगे। भारत की ओर से संकेत दिए गए हैं कि दोनों देश एफटीए के पहले चरण को जल्द से जल्द पूरा करने की दिशा में काम करेंगे, ताकि उद्योग और निवेश समुदाय को इसके प्रारंभिक लाभ मिलना शुरू हो जाए।




