वॉशिंगटन/हवाना: अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने क्यूबा को लेकर एक बार फिर सख्त और विवादास्पद बयान दिया है। ट्रंप का कहना है कि क्यूबा की सरकार गिरने के कगार पर है और उसकी आर्थिक हालत तेजी से बिगड़ रही है। ट्रंप इस स्थिति को लेकर खासे उत्साहित नजर आए और उन्होंने दावा किया कि क्यूबा को लंबे समय से सहारा देने वाला वेनेजुएला अब तेल और पैसों की सप्लाई करने की स्थिति में नहीं है, जिससे वहां की सरकार पर जबरदस्त दबाव बढ़ गया है।
क्यूबा की अर्थव्यवस्था वर्षों से वेनेजुएला से मिलने वाले सस्ते तेल और वित्तीय सहायता पर निर्भर रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, वेनेजुएला में राजनीतिक उथल-पुथल और अमेरिकी दबाव के बाद तेल आपूर्ति बाधित हुई है, जिसका सीधा असर क्यूबा की ऊर्जा व्यवस्था और औद्योगिक गतिविधियों पर पड़ा है। ईंधन की कमी के कारण बिजली संकट, परिवहन बाधाएं और रोजमर्रा की जरूरतों की आपूर्ति प्रभावित हो रही है, जिससे आम जनता की परेशानियां लगातार बढ़ रही हैं।
ट्रंप ने अपने बयान में कहा कि क्यूबा के पास अब ज्यादा विकल्प नहीं बचे हैं और अगर उसने समय रहते अमेरिका के साथ समझौता नहीं किया तो हालात और खराब हो सकते हैं। उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका क्यूबा की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था पर दबाव बनाए रखने की नीति पर कायम रहेगा। ट्रंप के इस रुख को अमेरिका की सख्त विदेश नीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य लैटिन अमेरिकी देशों में वामपंथी सरकारों को कमजोर करना है।
वहीं क्यूबा सरकार ने ट्रंप के बयानों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि देश संप्रभु और स्वतंत्र है और किसी बाहरी दबाव से उसकी नीतियां तय नहीं होंगी। क्यूबा के नेतृत्व ने माना कि देश आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है, लेकिन सरकार हालात से निपटने के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाश रही है। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि वेनेजुएला से तेल आपूर्ति रुकने से क्यूबा पर संकट जरूर गहराया है, लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि सरकार तत्काल गिर जाएगी।
कुल मिलाकर, ट्रंप के बयान ने क्यूबा संकट को एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। वेनेजुएला से तेल-पैसे की सप्लाई रुकने से क्यूबा की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा है और आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्यूबा सरकार इस दबाव से कैसे निपटती है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे कितना समर्थन मिल पाता है।




