सरकार ने संसद में आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 (Economic Survey 2026) पेश किया है, जिसमें देश की अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति, चुनौतियों और आगे की संभावनाओं का विस्तृत आकलन किया गया है। बजट से पहले पेश की गई इस रिपोर्ट में महंगाई, रुपये की स्थिति, विकास दर और वैश्विक जोखिमों को लेकर अहम संकेत दिए गए हैं। सर्वे के मुताबिक, वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था घरेलू मोर्चे पर अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई है।
आर्थिक सर्वे में बताया गया है कि चालू वित्त वर्ष में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर संतोषजनक रही है, जबकि अगले वित्त वर्ष 2026-27 में इसके 6.8 से 7.2 प्रतिशत के दायरे में रहने का अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, घरेलू मांग, सरकारी पूंजीगत खर्च और सेवा क्षेत्र की मजबूती ने आर्थिक विकास को सहारा दिया है, हालांकि निर्यात और वैश्विक व्यापार से जुड़े जोखिम अब भी बने हुए हैं।
महंगाई को लेकर सर्वे में कहा गया है कि बीते वर्ष के दौरान कीमतों पर काफी हद तक नियंत्रण रहा। खाद्य और ईंधन कीमतों में नरमी के कारण औसत महंगाई दर संतुलित बनी रही। आगे के लिए रिपोर्ट संकेत देती है कि महंगाई में कुछ बढ़ोतरी हो सकती है, लेकिन इसके आरबीआई के 4 प्रतिशत के लक्ष्य के आसपास बने रहने की उम्मीद है। सरकार का मानना है कि आपूर्ति प्रबंधन, कृषि उत्पादन में सुधार और नीतिगत कदम महंगाई को काबू में रखने में मदद करेंगे।
रुपये की स्थिति पर आर्थिक सर्वे में स्पष्ट रूप से चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, हाल के महीनों में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है और यह अपनी आर्थिक क्षमता के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पा रहा। सर्वे में कहा गया है कि रुपये की कमजोरी का मुख्य कारण विदेशी पूंजी प्रवाह में कमी, व्यापार घाटा और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियां हैं। हालांकि, सरकार का आकलन है कि कमजोर रुपया फिलहाल महंगाई पर बड़ा दबाव नहीं बना रहा है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल और अन्य कमोडिटी कीमतें नियंत्रित हैं।
आर्थिक सर्वे में यह भी कहा गया है कि रुपये की कमजोरी के कुछ सकारात्मक पहलू भी हो सकते हैं, जैसे निर्यात को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलना, लेकिन लंबे समय में मुद्रा में अत्यधिक उतार-चढ़ाव निवेशकों के भरोसे को प्रभावित कर सकता है। इसलिए स्थिर और संतुलित मुद्रा नीति पर जोर दिया गया है।
कुल मिलाकर, Economic Survey 2026 यह संकेत देता है कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बुनियादी ढांचे पर खड़ी है, लेकिन महंगाई, रुपये की कमजोरी, वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और निर्यात से जुड़े जोखिमों पर लगातार नजर बनाए रखना जरूरी है। यह रिपोर्ट आने वाले बजट और आर्थिक नीतियों के लिए एक अहम दिशा-निर्देशक मानी जा रही है।




