पश्चिम एशिया में एक बार फिर भू-राजनीतिक तनाव तेज होता दिखाई दे रहा है। ईरान और रूस ने ओमान की खाड़ी, होर्मुज़ जलडमरूमध्य और उत्तरी हिंद महासागर के क्षेत्र में संयुक्त नौसैनिक युद्धाभ्यास किया है। इस अभ्यास में ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) और रूसी नौसेना के युद्धपोतों ने हिस्सा लिया। दोनों देशों का कहना है कि इस सैन्य अभ्यास का उद्देश्य समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना, आपात स्थितियों से निपटने की क्षमता बढ़ाना और क्षेत्रीय सहयोग को सुदृढ़ करना है। हालांकि रणनीतिक रूप से यह क्षेत्र बेहद संवेदनशील माना जाता है, क्योंकि होर्मुज़ जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण मार्ग है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल दुनिया के विभिन्न देशों तक पहुंचता है। ऐसे में यहां होने वाली किसी भी सैन्य गतिविधि का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है।
इसी बीच अमेरिका ने भी मध्य पूर्व क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा दी है। रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका ने अत्याधुनिक F-35 और F-22 लड़ाकू विमानों के साथ अपने विमानवाहक पोतों को पश्चिम एशिया के करीब तैनात किया है। यह तैनाती ऐसे समय में की गई है जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते को लेकर तनाव बना हुआ है। अमेरिकी प्रशासन ने ईरान पर समझौते को लेकर दबाव बढ़ाया है और कड़े परिणामों की चेतावनी भी दी है। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका की यह सैन्य सक्रियता दबाव की रणनीति का हिस्सा हो सकती है, जबकि ईरान और रूस का संयुक्त अभ्यास शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है।
बढ़ते तनाव के बीच कई देशों ने अपने नागरिकों के लिए सतर्कता परामर्श जारी किए हैं। ऊर्जा बाजार में भी अनिश्चितता का माहौल दिखाई दे रहा है और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया है। रूस ने सभी पक्षों से संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान तलाशने की अपील की है। कुल मिलाकर, ईरान-रूस के सैन्य अभ्यास और अमेरिका की बढ़ती तैनाती ने पश्चिम एशिया की स्थिति को संवेदनशील बना दिया है, जहां आने वाले दिनों में कूटनीति और शक्ति संतुलन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली है।




