वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज उछाल और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारतीय रुपया गुरुवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। शुरुआती कारोबार में रुपया 32 पैसे टूटकर 95.20 प्रति डॉलर पर आ गया, जो अब तक का रिकॉर्ड निचला स्तर है। इससे पहले घरेलू मुद्रा 94.88 प्रति डॉलर पर बंद हुई थी। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी ने भारत जैसे आयात-निर्भर देश पर अतिरिक्त दबाव डाला है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से पूरा करता है। तेल महंगा होने से डॉलर की मांग बढ़ती है, जिससे रुपये पर सीधा असर पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने और वैश्विक आपूर्ति को लेकर चिंताओं ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता पैदा कर दी है। इसके साथ ही अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सख्त रुख ने डॉलर को और मजबूत किया है। ऊंची ब्याज दरों के कारण विदेशी निवेशक उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर अमेरिकी परिसंपत्तियों की ओर रुख कर रहे हैं। इसका असर भारतीय शेयर और मुद्रा बाजार दोनों पर देखने को मिल रहा है। इस वर्ष अब तक रुपया डॉलर के मुकाबले पांच प्रतिशत से अधिक कमजोर हो चुका है।
रुपये में आई इस ऐतिहासिक गिरावट का असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है। पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद्य तेल और अन्य आयातित वस्तुएं महंगी हो सकती हैं, जिससे महंगाई बढ़ने की आशंका है। हालांकि, कमजोर रुपया निर्यातकों के लिए कुछ राहत लेकर आ सकता है, क्योंकि विदेशी बाजारों में भारतीय उत्पाद अधिक प्रतिस्पर्धी बन जाते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक स्थिति पर नजर बनाए हुए है और जरूरत पड़ने पर विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है। बाजार जानकारों का मानना है कि जब तक कच्चे तेल की कीमतों में नरमी नहीं आती और वैश्विक तनाव कम नहीं होता, तब तक रुपये पर दबाव बना रह सकता है। आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार, अमेरिकी फेड की नीतियां और विदेशी निवेशकों का रुख भारतीय मुद्रा की दिशा तय करेंगे।



