देश में बढ़ती गर्मी के साथ जल संकट गहराता जा रहा है। केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) के ताजा आंकड़ों ने स्थिति की गंभीरता को उजागर किया है। 30 अप्रैल 2026 को जारी साप्ताहिक बुलेटिन के अनुसार, देश के 166 प्रमुख जलाशयों में कुल लाइव स्टोरेज घटकर 71.08 अरब घन मीटर रह गया है, जो उनकी कुल भंडारण क्षमता का केवल 38.72 प्रतिशत है। अप्रैल की शुरुआत में यह आंकड़ा 44.71 प्रतिशत था। महज कुछ हफ्तों में जल स्तर में आई यह तेज गिरावट आने वाले दिनों में पेयजल और सिंचाई दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
सबसे ज्यादा चिंता उन आठ राज्यों को लेकर है, जहां जलाशयों का जलस्तर 40 प्रतिशत से नीचे पहुंच गया है। इनमें असम, गोवा, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। पूर्वी, पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में हालात अधिक गंभीर होते जा रहे हैं। कई प्रमुख जलाशयों में पानी तेजी से घट रहा है, जिससे कृषि, उद्योग और शहरी जलापूर्ति पर दबाव बढ़ने लगा है।
नदी घाटियों की स्थिति भी चिंताजनक है। गंगा, गोदावरी, नर्मदा, कृष्णा और कावेरी जैसी प्रमुख नदी प्रणालियों में जल भंडारण लगातार कम हो रहा है। खासकर कृष्णा और कावेरी बेसिन पहले से ही दबाव में हैं, जहां जल स्तर काफी नीचे पहुंच चुका है। इससे आने वाले महीनों में सिंचाई और बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, मार्च और अप्रैल में सामान्य से कम बारिश, लगातार बढ़ते तापमान और तेज वाष्पीकरण ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है। यदि मई और जून में प्री-मानसून बारिश पर्याप्त नहीं हुई, तो कई राज्यों में जल संकट विकराल रूप ले सकता है। ऐसे में जल संरक्षण, प्रभावी जल प्रबंधन और वैकल्पिक जल स्रोतों को मजबूत करना समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है। देश के सामने खड़ी यह चुनौती स्पष्ट संकेत देती है कि जल संरक्षण अब केवल जागरूकता का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता है।




