अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर गंभीर स्तर पर पहुंच गया है। अमेरिकी सेना ने ईरान के विभिन्न रणनीतिक ठिकानों पर व्यापक हवाई हमले किए हैं, जिनमें पुल, रेलवे अवसंरचना, सैन्य लॉजिस्टिक्स से जुड़े मार्ग और कुछ हवाई अड्डों के आसपास के क्षेत्र भी निशाने पर रहे। इन हमलों के बाद कई स्थानों पर भारी क्षति की खबरें सामने आई हैं। यह सैन्य कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कुछ दिन पहले ही चेतावनी दी थी कि यदि तेहरान परमाणु वार्ता और अन्य मुद्दों पर बातचीत के लिए आगे नहीं आता, तो अमेरिका ईरान के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को भी निशाना बना सकता है।
रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी हमलों का मुख्य उद्देश्य ईरान की सैन्य आपूर्ति श्रृंखला और रणनीतिक परिवहन नेटवर्क को कमजोर करना है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास स्थित क्षेत्रों, बंदर अब्बास और अन्य सामरिक ठिकानों पर पुलों तथा परिवहन मार्गों को निशाना बनाया गया। कुछ स्थानों पर रेलवे पुलों को भी नुकसान पहुंचा, जिससे रेल सेवाएं अस्थायी रूप से प्रभावित हुईं। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि इन अभियानों का मकसद ईरान की सैन्य क्षमता और रसद व्यवस्था पर दबाव बढ़ाना है।
इससे पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि यदि ईरान बातचीत की मेज पर नहीं लौटता, तो उसके बिजली संयंत्रों, पुलों और अन्य महत्वपूर्ण अवसंरचना को भी निशाना बनाया जा सकता है। उनके इस बयान के बाद अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई का दायरा बढ़ा दिया। हालांकि अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि कार्रवाई का उद्देश्य रणनीतिक सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना है, लेकिन ईरान ने इसे अपनी संप्रभुता पर सीधा हमला बताया है।
ईरान ने अमेरिकी हमलों की कड़ी निंदा करते हुए चेतावनी दी है कि यदि उसके बुनियादी ढांचे पर हमले जारी रहे, तो वह भी क्षेत्र में अमेरिकी हितों और सहयोगी देशों के महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाएगा। तेहरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को अपनी “रेड लाइन” बताते हुए स्पष्ट किया है कि इस क्षेत्र में किसी भी सैन्य दबाव का जवाब दिया जाएगा। इसके साथ ही ईरान ने अमेरिका और उसके सहयोगियों पर क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ाने का आरोप लगाया है।
इस संघर्ष का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और गैस परिवहन होता है। बढ़ते तनाव के कारण समुद्री व्यापार प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच टकराव और बढ़ता है, तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ेगा।




