विदेशी नागरिकों के निर्वासन (डिपोर्टेशन) से जुड़े एक अहम मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपना विस्तृत पक्ष रखते हुए कहा है कि किसी भी विदेशी नागरिक को केवल अवैध रूप से भारत में पाए जाने के आधार पर तुरंत उसके देश नहीं भेजा जा सकता। सरकार ने स्पष्ट किया कि निर्वासन की पूरी प्रक्रिया कानून, अंतरराष्ट्रीय मानकों और संबंधित देशों के साथ स्थापित कूटनीतिक प्रक्रियाओं के अनुसार पूरी की जाती है। केंद्र के अनुसार किसी व्यक्ति को उसके मूल देश भेजने से पहले उसकी पहचान और नागरिकता का सत्यापन करना अनिवार्य होता है। यदि संबंधित व्यक्ति के पास वैध पासपोर्ट, यात्रा दस्तावेज या अन्य आवश्यक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, तो पहले संबंधित देश से संपर्क कर उसकी राष्ट्रीयता की पुष्टि कराई जाती है। आवश्यक यात्रा दस्तावेज जारी होने और संबंधित देश की स्वीकृति मिलने के बाद ही डिपोर्टेशन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है।
केंद्र सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि कई मामलों में विदेशी नागरिक अपनी वास्तविक पहचान छिपा लेते हैं, गलत जानकारी देते हैं या किसी अन्य देश का नागरिक होने का दावा करते हैं। ऐसी परिस्थितियों में उनकी सही राष्ट्रीयता स्थापित करने में समय लगता है, इसलिए केवल विदेशी घोषित हो जाने के आधार पर तत्काल निर्वासन संभव नहीं होता। सरकार का कहना है कि पहचान और नागरिकता का सत्यापन इस पूरी प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण चरण है, ताकि किसी व्यक्ति को गलती से किसी गलत देश में न भेज दिया जाए। केंद्र ने यह भी दोहराया कि प्रत्येक मामले में कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाता है और किसी भी व्यक्ति के साथ मनमाना व्यवहार नहीं किया जाता।
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह भी कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। यदि किसी विदेशी नागरिक की गतिविधियां देश की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा मानी जाती हैं, तो कानून के तहत उसे हिरासत में रखा जा सकता है और उसकी आवाजाही पर आवश्यक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। केंद्र के अनुसार ऐसी कार्रवाई सुरक्षा एजेंसियों के आकलन और प्रचलित कानूनी प्रावधानों के अनुरूप की जाती है। सरकार ने अदालत को भरोसा दिलाया कि अवैध रूप से भारत में रह रहे विदेशी नागरिकों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई जारी रहेगी, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि पहचान और नागरिकता के उचित सत्यापन के बिना किसी व्यक्ति का निर्वासन न किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के इस रुख से यह स्पष्ट हुआ है कि भारत में विदेशी नागरिकों के निर्वासन की प्रक्रिया केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि कानूनी, कूटनीतिक और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों से जुड़ी एक बहु-स्तरीय प्रक्रिया है। सरकार का कहना है कि पहले व्यक्ति की पहचान और राष्ट्रीयता की पुष्टि की जाती है, उसके बाद आवश्यक दस्तावेज और संबंधित देश की मंजूरी प्राप्त होने पर ही उसे उसके मूल देश भेजने की कार्रवाई की जाती है। इसी कारण सरकार ने अदालत के समक्ष दोहराया कि “पहले पहचान, फिर निर्वासन” का सिद्धांत ही ऐसे मामलों में अपनाया जाता है।




