सीबीएसई की नई त्रिभाषा नीति को लेकर दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तेज हो गई है। कक्षा 9 से लागू की गई तीन-भाषा व्यवस्था को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं ने शीर्ष अदालत से मामले की जल्द सुनवाई और अंतरिम राहत देने की मांग की है। उनका कहना है कि नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने के साथ ही लाखों विद्यार्थियों पर इस नीति का सीधा प्रभाव पड़ रहा है। यदि समय रहते इस पर निर्णय नहीं लिया गया तो छात्रों, अभिभावकों और स्कूलों को व्यावहारिक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल नीति पर रोक लगाने से इनकार किया है, लेकिन मामले की शीघ्र सुनवाई का आश्वासन देते हुए सभी पक्षों से विस्तृत जवाब मांगा है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सीबीएसई द्वारा लागू की गई नई व्यवस्था के तहत कक्षा 9 के छात्रों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य किया गया है, जिसमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं शामिल हैं। उनका कहना है कि कई स्कूलों में पर्याप्त भाषा शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं, आवश्यक पाठ्य सामग्री की व्यवस्था पूरी नहीं हुई है और विद्यार्थियों को बीच सत्र में नई भाषा पढ़ने के लिए बाध्य किया जा सकता है। उनका यह भी कहना है कि इतने बड़े शैक्षणिक बदलाव को लागू करने से पहले पर्याप्त तैयारी, संसाधन और संक्रमण अवधि सुनिश्चित की जानी चाहिए थी। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से अनुरोध किया कि अंतिम निर्णय आने तक छात्रों के हितों की रक्षा के लिए अंतरिम आदेश जारी किया जाए।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी नीति के व्यावहारिक पहलुओं पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि नई भाषा सीखना सकारात्मक पहल हो सकती है, लेकिन इसे लागू करने की तैयारी, शिक्षकों की उपलब्धता, स्कूलों की क्षमता और विद्यार्थियों पर पड़ने वाले अतिरिक्त शैक्षणिक बोझ का भी आकलन जरूरी है। अदालत ने केंद्र सरकार, सीबीएसई और संबंधित पक्षों से इन सभी बिंदुओं पर विस्तृत जवाब मांगा है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि वह केवल नीति की वैधता ही नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन से जुड़ी व्यावहारिक चुनौतियों पर भी विचार करेगी।
केंद्र सरकार और सीबीएसई ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि त्रिभाषा नीति राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के उद्देश्यों के अनुरूप है और इसका मकसद भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना, विद्यार्थियों की भाषाई क्षमता विकसित करना तथा देश की सांस्कृतिक विविधता से उन्हें जोड़ना है। सरकार का कहना है कि यह नीति शिक्षा व्यवस्था को अधिक समावेशी और संतुलित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम फैसला सुरक्षित नहीं रखा है, लेकिन स्पष्ट किया है कि मामले की जल्द सुनवाई की जाएगी। अब शिक्षा जगत की नजर इस बात पर है कि अदालत छात्रों की चिंताओं और सरकार के पक्ष के बीच संतुलन बनाते हुए आगे क्या निर्णय देती है।




