अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र के बीच लंबे समय से चल रही वित्तीय खींचतान के बीच डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने संयुक्त राष्ट्र को करीब 850 मिलियन डॉलर देने की योजना बनाई है। अमेरिकी सरकार की ओर से इस संबंध में कांग्रेस को जानकारी दी गई है। प्रस्तावित रकम में 725 मिलियन डॉलर संयुक्त राष्ट्र के नियमित बजट के लिए और 125 मिलियन डॉलर हैती तथा कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों के लिए दिए जाने की योजना है। हालांकि, यह राशि अमेरिका पर संयुक्त राष्ट्र का कुल करीब 5 अरब डॉलर का बकाया चुकाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार अमेरिका पर लंबे समय से बड़ी राशि बकाया है। इसमें नियमित बजट के लिए 2 अरब डॉलर से अधिक और शांति अभियानों के लिए लगभग 3 अरब डॉलर की देनदारी शामिल है। अमेरिका संयुक्त राष्ट्र का सबसे बड़ा वित्तीय योगदानकर्ता रहा है, लेकिन ट्रंप प्रशासन के दूसरे कार्यकाल में अंतरराष्ट्रीय संगठनों को दी जाने वाली अमेरिकी फंडिंग की व्यापक समीक्षा की गई है। वॉशिंगटन का कहना रहा है कि अमेरिकी करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल ऐसी संस्थाओं में नहीं होना चाहिए जहां पर्याप्त जवाबदेही, पारदर्शिता और परिणाम दिखाई न दें।
डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र के खर्च और कामकाज में बदलाव की मांग करते रहे हैं। उनके प्रशासन ने संगठन से खर्च घटाने, कार्यकुशलता बढ़ाने और वित्तीय व्यवस्था में सुधार करने की अपेक्षा जताई है। इसी नीति के तहत अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र प्रणाली से जुड़ी कई संस्थाओं और कार्यक्रमों की फंडिंग पर पुनर्विचार किया। इसलिए मौजूदा 850 मिलियन डॉलर का प्रस्ताव अमेरिकी नीति में पूरी तरह यू-टर्न के बजाय एक चयनात्मक वित्तीय रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
अमेरिकी प्रशासन का रुख यह संकेत देता है कि वॉशिंगटन संयुक्त राष्ट्र से पूरी तरह दूरी बनाने के बजाय उन कार्यक्रमों को प्राथमिकता देना चाहता है जिन्हें वह अमेरिकी हितों, सुरक्षा और मानवीय जरूरतों से जुड़ा मानता है। हाल के महीनों में अमेरिका की ओर से संयुक्त राष्ट्र और उसके मानवीय साझेदारों के लिए बड़ी मानवीय सहायता भी जारी की गई है। इससे संकेत मिलता है कि ट्रंप प्रशासन संयुक्त राष्ट्र की पूरी व्यवस्था को वित्तीय समर्थन देने के बजाय विशिष्ट कार्यक्रमों और प्राथमिकताओं के आधार पर पैसा देने की नीति अपना रहा है।
संयुक्त राष्ट्र के लिए अमेरिकी भुगतान ऐसे समय महत्वपूर्ण है जब संगठन खुद गंभीर वित्तीय दबाव का सामना कर रहा है। सदस्य देशों से समय पर भुगतान नहीं मिलने और विभिन्न स्रोतों से मिलने वाली सहायता में कमी के कारण संयुक्त राष्ट्र को अपने खर्च में कटौती करनी पड़ी है। संगठन ने बजट पर दबाव कम करने के लिए कई प्रशासनिक कदम उठाए हैं और कुछ स्थानों पर नौकरियों तथा संसाधनों को कम लागत वाले क्षेत्रों में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया भी शुरू की है। ऐसे में अमेरिका की प्रस्तावित 725 मिलियन डॉलर की नियमित बजट राशि संयुक्त राष्ट्र की तत्काल वित्तीय जरूरतों को कुछ हद तक कम कर सकती है।
संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की भूमिका केवल वित्तीय योगदान तक सीमित नहीं है। अमेरिका संगठन का संस्थापक सदस्य है और लंबे समय से उसका सबसे बड़ा आर्थिक योगदानकर्ता रहा है। 2025 में संयुक्त राष्ट्र के नियमित बजट में अमेरिका की निर्धारित हिस्सेदारी लगभग 22 प्रतिशत थी, जबकि शांति अभियानों के बजट में उसका हिस्सा करीब 26 प्रतिशत था। इस बड़ी वित्तीय भूमिका के कारण संगठन की आर्थिक स्थिरता और वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अमेरिकी प्रभाव एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
अमेरिका की ओर से लगातार फंडिंग रोकने का एक भू-राजनीतिक असर भी हो सकता है। यदि वॉशिंगटन संयुक्त राष्ट्र में अपनी वित्तीय और राजनीतिक भूमिका कम करता है तो चीन जैसे देशों के लिए संगठन के भीतर अपना प्रभाव बढ़ाने की संभावना बढ़ सकती है। चीन पहले से ही संयुक्त राष्ट्र के नियमित बजट और शांति अभियानों में अमेरिका के बाद प्रमुख योगदानकर्ताओं में शामिल है। इसलिए अमेरिका के लिए संयुक्त राष्ट्र को पूरी तरह कमजोर होने देना उसके व्यापक वैश्विक रणनीतिक हितों के लिहाज से भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
850 मिलियन डॉलर के भुगतान की घोषणा की टाइमिंग भी महत्वपूर्ण है। यह कदम ऐसे समय सामने आया है जब संयुक्त राष्ट्र महासभा का अगला सत्र नजदीक है और अमेरिका तथा संयुक्त राष्ट्र के बीच कई मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में भुगतान की योजना को दोनों पक्षों के बीच संबंधों में तनाव कम करने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा सकता है। हालांकि, इससे यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि ट्रंप प्रशासन ने संयुक्त राष्ट्र को लेकर अपनी मूल नीति बदल दी है।
दरअसल, प्रस्तावित भुगतान के बावजूद अमेरिका पर अरबों डॉलर की राशि बकाया रहेगी। इसलिए आने वाले समय में सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि क्या वॉशिंगटन बाकी बकाया भी चुकाने की दिशा में आगे बढ़ेगा या भुगतान को संयुक्त राष्ट्र में सुधारों और अमेरिकी प्राथमिकताओं से जोड़कर चरणबद्ध तरीके से जारी रखेगा। ट्रंप प्रशासन का मौजूदा रुख यही संकेत देता है कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को वित्तीय सहायता देने के लिए तैयार है, लेकिन वह बदले में अधिक पारदर्शिता, खर्च में कटौती और जवाबदेही चाहता है।
कुल मिलाकर, संयुक्त राष्ट्र को 850 मिलियन डॉलर देने की अमेरिकी योजना को ट्रंप की नीति में पूर्ण बदलाव के बजाय एक व्यावहारिक और रणनीतिक कदम माना जा सकता है। अमेरिका एक ओर संयुक्त राष्ट्र के खर्च और कामकाज में सुधार चाहता है, वहीं दूसरी ओर उन गतिविधियों में अपनी भूमिका बनाए रखना चाहता है जिन्हें वह मानवीय या रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानता है। प्रस्तावित भुगतान संयुक्त राष्ट्र की वित्तीय स्थिति को कुछ राहत दे सकता है, लेकिन करीब 5 अरब डॉलर के कुल बकाये को देखते हुए यह विवाद अभी खत्म नहीं हुआ है। आने वाले महीनों में अमेरिका के अगले भुगतान और संयुक्त राष्ट्र से अपेक्षित सुधार ही यह तय करेंगे कि दोनों के बीच वित्तीय और कूटनीतिक संबंध किस दिशा में आगे बढ़ते हैं।




