नई दिल्ली: श्रम कानूनों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ‘उद्योग’ की कानूनी परिभाषा को लेकर करीब पांच दशक पुराने न्यायिक सिद्धांत की समीक्षा की है। उत्तर प्रदेश बनाम जय बीर सिंह मामले में नौ जजों की संविधान पीठ ने 20 अगस्त 2026 को 5:4 के बहुमत से 1978 के ऐतिहासिक बंगलूरू वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा फैसले में निर्धारित ‘ट्रिपल टेस्ट’ के कुछ हिस्सों को नए सिरे से स्पष्ट और व्यवस्थित किया। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नए परीक्षण को पुराने कानून के तहत पहले से लंबित मामलों पर लागू नहीं किया जाएगा।
इस विवाद की पृष्ठभूमि 1978 के उस फैसले से जुड़ी है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने ‘उद्योग’ शब्द की व्यापक व्याख्या की थी। अदालत ने किसी गतिविधि को उद्योग मानने के लिए व्यवस्थित गतिविधि, नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच सहयोग तथा लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए वस्तुओं या सेवाओं के उत्पादन अथवा वितरण जैसे प्रमुख तत्वों को आधार बनाया था। इस व्याख्या के तहत केवल मुनाफा कमाना ही किसी संस्था या गतिविधि को उद्योग मानने के लिए जरूरी नहीं माना गया था।
1978 के फैसले की व्यापक व्याख्या का असर पारंपरिक कारखानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से आगे तक पहुंचा। अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों और कुछ अन्य संगठित सेवा गतिविधियों में काम करने वाले कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर भी यह फैसला महत्वपूर्ण बन गया। यही कारण है कि ‘उद्योग’ की परिभाषा को श्रमिकों के कानूनी अधिकारों और औद्योगिक विवादों के समाधान के लिहाज से बेहद अहम माना जाता रहा है।
अब नौ जजों की संविधान पीठ ने माना है कि 1978 में तय किए गए ट्रिपल टेस्ट का मूल ढांचा पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हुआ है, लेकिन उसके कुछ हिस्सों को मौजूदा कानूनी परिस्थितियों के अनुरूप स्पष्ट करने की आवश्यकता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने बहुमत के फैसले में पुराने परीक्षण को नए तरीके से व्यवस्थित किया है। इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने 1978 के निर्णय को पूरी तरह समाप्त नहीं किया, बल्कि ‘उद्योग’ की पहचान से जुड़े न्यायिक सिद्धांत को अधिक स्पष्ट रूप देने की कोशिश की है।
सुप्रीम कोर्ट ने पुराने मामलों को लेकर भी महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। अदालत ने कहा कि औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत अदालतों, श्रम न्यायाधिकरणों या अन्य संबंधित मंचों के सामने लंबित मामलों का फैसला पुराने ट्रिपल टेस्ट के आधार पर ही किया जाएगा। पहले से अंतिम रूप ले चुके मामलों को भी नए फैसले के आधार पर दोबारा नहीं खोला जाएगा। इससे पुराने विवादों में कानूनी अनिश्चितता पैदा होने की संभावना कम होगी।
इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट ने औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के तहत ‘उद्योग’ की परिभाषा की अंतिम व्याख्या इस मामले में नहीं की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि 1947 के पुराने औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2(j) से संबंधित इस फैसले को नए श्रम कानून के तहत ‘उद्योग’ शब्द की व्याख्या का आधार नहीं माना जाना चाहिए। इसका मतलब है कि नए श्रम कानून के तहत भविष्य में सामने आने वाले विवादों का समाधान उस संहिता के अपने प्रावधानों के आधार पर किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस ने श्रमिकों के कानूनी संरक्षण को लेकर चिंता जताई है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने 1978 के फैसले की व्यापक व्याख्या के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि ‘उद्योग’ की परिभाषा को सीमित करने वाली कोई भी व्यवस्था श्रमिकों के अधिकारों और कानूनी सुरक्षा के दायरे को प्रभावित कर सकती है। कांग्रेस ने केंद्र सरकार की औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 को लेकर भी सवाल उठाए हैं और कहा है कि श्रमिकों के हितों की रक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
कांग्रेस की चिंता खास तौर पर भविष्य को लेकर है। पार्टी का तर्क है कि यदि ‘उद्योग’ की परिभाषा को संकीर्ण किया जाता है, तो कुछ ऐसे संस्थानों और गतिविधियों में काम करने वाले कर्मचारियों को प्रभावित होना पड़ सकता है, जिन्हें पहले श्रम कानूनों के संरक्षण का लाभ मिलता रहा है। कांग्रेस ने संविधान पीठ में असहमति जताने वाली न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना की राय का भी उल्लेख किया है। असहमति वाले न्यायाधीशों ने 1978 में स्थापित व्यापक व्याख्या को बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
वहीं, इस फैसले को केवल श्रमिक सुरक्षा खत्म होने के रूप में देखना फिलहाल सही नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने पुराने कानून के तहत लंबित मामलों के लिए स्पष्ट रूप से 1978 के ट्रिपल टेस्ट को लागू रखने की बात कही है। इसके अलावा, 2020 की औद्योगिक संबंध संहिता के तहत ‘उद्योग’ की परिभाषा को लेकर अदालत ने इस मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। इसलिए तत्काल प्रभाव से सभी श्रमिकों के अधिकार समाप्त या कमजोर होने की बात कहना उचित नहीं होगा।
हालांकि, यह फैसला श्रम कानून के क्षेत्र में लंबे समय तक प्रभाव डाल सकता है। ‘उद्योग’ की कानूनी परिभाषा यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि किसी संस्था या गतिविधि में काम करने वाले कर्मचारी औद्योगिक विवादों से जुड़े कानूनी प्रावधानों के दायरे में आते हैं या नहीं। इसी वजह से इस शब्द की न्यायिक व्याख्या का सीधा संबंध रोजगार विवाद, सेवा अधिकार और श्रमिकों के संरक्षण से है।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का फैसला करीब 48 वर्ष पुराने श्रम कानून संबंधी न्यायिक सिद्धांत की महत्वपूर्ण समीक्षा है। अदालत ने 1978 के ट्रिपल टेस्ट को पूरी तरह खारिज करने के बजाय उसके कुछ पहलुओं को नए सिरे से व्यवस्थित किया है और पुराने लंबित मामलों के लिए पहले की व्यवस्था को बरकरार रखा है। कांग्रेस की चिंता मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि भविष्य में ‘उद्योग’ की परिभाषा का दायरा कहीं इतना सीमित न हो जाए कि कुछ श्रमिक कानूनी संरक्षण से बाहर हो जाएं। अब असली महत्व इस बात का होगा कि नए श्रम कानूनों के तहत अदालतें ‘उद्योग’ की परिभाषा को किस तरह लागू करती हैं और इसका कर्मचारियों तथा नियोक्ताओं के अधिकारों पर क्या प्रभाव पड़ता है।




