भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रम तेजस Mk-2 को लेकर भारतीय वायुसेना के पूर्व उप प्रमुख एयर मार्शल (सेवानिवृत्त) नागेश कपूर की टिप्पणी के बाद नई बहस शुरू हो गई है। कपूर ने तेजस Mk-2 के विकास और इसके संभावित समय पर चिंता जताते हुए कहा है कि यदि यह विमान बड़ी संख्या में 2030 के दशक के मध्य तक वायुसेना में शामिल होता है, तो उस समय तेजी से बदलते युद्धक्षेत्र के कारण इसकी अत्याधुनिक फ्रंटलाइन भूमिका सीमित हो सकती है। उनकी चिंता मुख्य रूप से विमान की क्षमता से ज्यादा उसके समय पर उपलब्ध होने को लेकर है।
तेजस Mk-2 को भारत का मध्यम वजन वाला 4.5 पीढ़ी का बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान माना जाता है। इसे मौजूदा तेजस Mk-1 और Mk-1A की तुलना में अधिक बड़ा और शक्तिशाली प्लेटफॉर्म बनाने की योजना है। इसमें बेहतर एवियोनिक्स, उन्नत सेंसर, अधिक हथियार ले जाने की क्षमता और ज्यादा शक्तिशाली इंजन जैसी क्षमताएं शामिल की जा रही हैं। इसका उद्देश्य भारतीय वायुसेना की मध्यम श्रेणी के लड़ाकू विमानों की जरूरत को पूरा करना और पुराने विमानों की जगह धीरे-धीरे आधुनिक स्वदेशी विमान उपलब्ध कराना है।
पूर्व वायुसेना उप प्रमुख की सबसे बड़ी चिंता आधुनिक हवाई युद्ध में तेजी से हो रहे बदलाव को लेकर है। दुनिया की प्रमुख वायुसेनाएं पांचवीं और छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों, लंबी दूरी की मिसाइलों, उन्नत रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, ड्रोन और नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध क्षमता पर तेजी से काम कर रही हैं। ऐसे समय में यदि किसी 4.5 पीढ़ी के लड़ाकू विमान को विकसित करने और बड़ी संख्या में उपलब्ध कराने में बहुत अधिक समय लगता है, तो उसके सेवा में शामिल होने तक युद्धक तकनीक का स्तर काफी आगे निकल सकता है।
कपूर की टिप्पणी को केवल तेजस Mk-2 की तकनीकी क्षमता पर सवाल के रूप में नहीं देखा जा रहा है। इसके पीछे भारतीय वायुसेना के लड़ाकू स्क्वाड्रनों की संख्या और पुराने विमानों के धीरे-धीरे सेवा से बाहर होने की चिंता भी जुड़ी हुई है। मिग-29, मिराज-2000 और जगुआर जैसे विमानों के बेड़े की उम्र बढ़ रही है। ऐसे में वायुसेना को आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में नए लड़ाकू विमानों की आवश्यकता होगी। यदि नए विमानों की डिलीवरी समय पर नहीं होती है, तो उपलब्ध स्क्वाड्रनों पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत के सामने चीन की तेजी से बढ़ती हवाई क्षमता भी एक महत्वपूर्ण चुनौती है। चीन पांचवीं पीढ़ी के J-20 जैसे लड़ाकू विमानों की संख्या बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और उसकी एयर पावर में आधुनिक सेंसर, लंबी दूरी के हथियार और नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता का भी विस्तार हो रहा है। इस स्थिति में भारतीय वायुसेना के लिए केवल आधुनिक विमान विकसित करना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उन्हें समय पर परिचालन क्षमता में शामिल करना भी जरूरी होगा।
हालांकि, किसी 4.5 पीढ़ी के विमान को 2035 के बाद पूरी तरह अप्रासंगिक मानना भी सही नहीं होगा। किसी लड़ाकू विमान की वास्तविक युद्धक उपयोगिता केवल उसकी पीढ़ी से निर्धारित नहीं होती। उसके रडार, मिसाइल, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, डेटा लिंक, सेंसर और नेटवर्किंग क्षमता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि इन प्रणालियों को समय के साथ आधुनिक बनाया जाता रहे, तो 4.5 पीढ़ी के विमान लंबे समय तक विभिन्न प्रकार के मिशनों में उपयोगी रह सकते हैं।
तेजस Mk-2 की चर्चा भारत के स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के Advanced Medium Combat Aircraft यानी AMCA कार्यक्रम से भी जुड़ी हुई है। AMCA को भविष्य में भारतीय वायुसेना के लिए एक अत्याधुनिक स्टील्थ लड़ाकू विमान के रूप में विकसित किया जा रहा है। भारत को एक साथ तेजस Mk-1A की उत्पादन क्षमता बढ़ाने, तेजस Mk-2 को आगे बढ़ाने और AMCA जैसी अगली पीढ़ी की परियोजना को समय पर पूरा करने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
तेजस Mk-2 का महत्व इसलिए भी काफी ज्यादा है क्योंकि यह केवल एक लड़ाकू विमान परियोजना नहीं है, बल्कि भारत की घरेलू एयरोस्पेस और रक्षा निर्माण क्षमता को आगे बढ़ाने वाली परियोजना है। इसके जरिए देश में विमान डिजाइन, एवियोनिक्स, कंपोजिट सामग्री, इंजन और हथियार प्रणालियों के क्षेत्र में तकनीकी क्षमता को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके अलावा स्वदेशी लड़ाकू विमान बड़ी संख्या में उपलब्ध होने पर विदेशी प्लेटफॉर्म पर निर्भरता कम करने में भी मदद कर सकते हैं।
विमान के विकास में सबसे बड़ी चुनौती समयसीमा होती है। लड़ाकू विमान तैयार करने के बाद भी उसके परीक्षण, रडार और हथियारों का एकीकरण, सुरक्षा परीक्षण, उड़ान परीक्षण और अंतिम परिचालन मंजूरी जैसी कई प्रक्रियाएं पूरी करनी होती हैं। इनमें किसी भी स्तर पर देरी होने से पूरी परियोजना आगे खिसक सकती है। यही कारण है कि तेजस Mk-2 के मामले में केवल डिजाइन और तकनीकी क्षमताओं के बजाय समय पर विकास और उत्पादन भी बेहद महत्वपूर्ण है।
इस पूरे विवाद का मुख्य सवाल यह नहीं है कि तेजस Mk-2 भविष्य में बिल्कुल बेकार हो जाएगा या नहीं, बल्कि यह है कि जब तक यह बड़ी संख्या में वायुसेना में शामिल होगा, तब तक इसकी तकनीक और युद्धक क्षमता किस स्तर की होगी। यदि विमान को आधुनिक हथियारों, रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और नेटवर्किंग सिस्टम के साथ लगातार अपग्रेड किया जाता है, तो इसकी उपयोगिता बनी रह सकती है। लेकिन यदि विकास और उत्पादन में लंबी देरी होती है, तो अत्याधुनिक विदेशी और स्वदेशी प्लेटफॉर्म के मुकाबले इसकी तकनीकी बढ़त सीमित हो सकती है।
पूर्व वायुसेना उप प्रमुख की टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत की रक्षा परियोजनाओं में समय पर क्रियान्वयन की आवश्यकता को सामने रखती है। भारत को पुराने लड़ाकू विमानों को बदलने के साथ-साथ भविष्य के युद्धक्षेत्र के लिए पांचवीं और छठी पीढ़ी की तकनीक भी विकसित करनी होगी। ऐसे में तेजस Mk-2 और AMCA जैसी परियोजनाओं की सफलता केवल वायुसेना की क्षमता बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह भारत की दीर्घकालिक हवाई शक्ति और स्वदेशी रक्षा उद्योग के लिए भी महत्वपूर्ण साबित होगी।




