विदेशी बाजारों में बढ़ेगी भारतीय वाहनों की पहुंच, FTA से ऑटो सेक्टर को मिला नया अवसर

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भारत का ऑटोमोबाइल सेक्टर इस समय बड़े तकनीकी और कारोबारी बदलाव के दौर से गुजर रहा है। इलेक्ट्रिक वाहन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एडवांस्ड बैटरी, कनेक्टेड व्हीकल, सॉफ्टवेयर-डिफाइंड वाहन और स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग जैसी तकनीकें पारंपरिक ऑटो उद्योग की तस्वीर बदल रही हैं। दूसरी ओर, भारत के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते यानी FTA भारतीय वाहन और ऑटो कंपोनेंट कंपनियों के लिए विदेशी बाजारों तक पहुंच का नया रास्ता खोल रहे हैं। ऐसे में भारत के सामने सिर्फ एक बड़ा घरेलू ऑटो बाजार बने रहने के बजाय वैश्विक मोबिलिटी और मैन्युफैक्चरिंग हब बनने का अवसर भी दिखाई दे रहा है।

भारत और ब्रिटेन के बीच Comprehensive Economic and Trade Agreement यानी CETA 15 जुलाई 2026 से लागू हो चुका है। इस समझौते के तहत ब्रिटेन में भारतीय निर्यात के करीब 99 फीसदी हिस्से को शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच मिलने की व्यवस्था की गई है। ऑटो कंपोनेंट्स जैसे उत्पादों को भी इसका लाभ मिल सकता है। इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए भी एक निर्धारित टैरिफ-रेट कोटा की व्यवस्था की गई है। इससे भारतीय वाहन और ऑटो पार्ट्स निर्माताओं के लिए ब्रिटिश बाजार में प्रतिस्पर्धा करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए व्यापार समझौते को भी ऑटो उद्योग के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यूरोपीय बाजार दुनिया के प्रमुख ऑटोमोबाइल बाजारों में शामिल है और वहां भारतीय उत्पादों की पहुंच बढ़ने से देश की ऑटो कंपनियों को निर्यात का बड़ा अवसर मिल सकता है। भारत में निर्मित वाहनों और कंपोनेंट्स को वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने में कम व्यापार बाधाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। हालांकि, इसका लाभ उठाने के लिए कंपनियों को गुणवत्ता, लागत और तकनीक के मामले में अंतरराष्ट्रीय मानकों पर लगातार खरा उतरना होगा।

भारत के इलेक्ट्रिक वाहन क्षेत्र से भी सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। वाणिज्य मंत्रालय के Trade Intelligence and Analytics पोर्टल के अनुसार अप्रैल-जून 2026 के दौरान भारत से इलेक्ट्रिक मोटर कारों के निर्यात में पिछले स्तर की तुलना में लगभग 17 गुना वृद्धि दर्ज की गई। यूरोप भारतीय इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए उभरते महत्वपूर्ण बाजारों में शामिल है। यह वृद्धि इस बात का संकेत देती है कि भारत में EV मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित होने के साथ-साथ देश वैश्विक इलेक्ट्रिक मोबिलिटी सप्लाई चेन में भी अपनी भूमिका बढ़ा सकता है।

सरकार की इलेक्ट्रिक मोबिलिटी से जुड़ी नीतियां भी इस बदलाव को गति दे रही हैं। PM E-DRIVE योजना के तहत इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग बढ़ाने, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने और घरेलू EV इकोसिस्टम को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। योजना का कुल वित्तीय परिव्यय 10,900 करोड़ रुपये है। इसके तहत लाखों इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन देने के साथ सार्वजनिक चार्जिंग नेटवर्क को विकसित करने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।

भारत की EV रणनीति सिर्फ वाहन बेचने तक सीमित नहीं है। बैटरी, इलेक्ट्रिक मोटर, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स, चार्जिंग सिस्टम और दूसरे महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया जा रहा है। Advanced Chemistry Cell यानी ACC बैटरी मैन्युफैक्चरिंग के लिए सरकार ने 18,100 करोड़ रुपये की PLI योजना बनाई है। इसका उद्देश्य देश में बड़ी क्षमता वाली एडवांस्ड बैटरी निर्माण व्यवस्था विकसित करना है। इसी तरह ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट सेक्टर के लिए भी उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना लागू की गई है।

ऑटो सेक्टर में बदलाव की अगली बड़ी कहानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सॉफ्टवेयर की है। भविष्य के वाहन केवल इंजन, मोटर और बैटरी से चलने वाली मशीन नहीं होंगे, बल्कि उनमें सॉफ्टवेयर और डिजिटल तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ेगी। AI आधारित ड्राइविंग सिस्टम, कनेक्टेड कार, डिजिटल फीचर्स, बैटरी मैनेजमेंट, ओवर-द-एयर अपडेट और एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम जैसे फीचर्स वाहन उद्योग के लिए नए अवसर पैदा कर रहे हैं। इसके साथ ही वाहन निर्माण में रोबोटिक्स, IoT, डिजिटल ट्विन और स्मार्ट फैक्ट्री जैसी तकनीकों का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है।

भारत के लिए ऑटो कंपोनेंट सेक्टर में भी बड़ी संभावनाएं हैं। NITI Aayog के अनुसार भारत दुनिया के प्रमुख वाहन उत्पादक देशों में शामिल है और ऑटोमोबाइल सेक्टर भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है। इसके बावजूद वैश्विक ऑटो कंपोनेंट बाजार में भारत की हिस्सेदारी अभी अपेक्षाकृत कम है। यही अंतर भारत के लिए बड़ा अवसर बन सकता है। यदि देश हाई-प्रिसिजन कंपोनेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, सेमीकंडक्टर और ऑटोमोटिव सॉफ्टवेयर जैसे क्षेत्रों में अपनी क्षमता बढ़ाता है तो निर्यात में बड़ी वृद्धि संभव है।

हालांकि भारत के सामने कई चुनौतियां भी हैं। वैश्विक ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में चीन जैसे देशों से प्रतिस्पर्धा आसान नहीं है। उत्पादन लागत, लॉजिस्टिक्स, ऊर्जा, कच्चे माल, मशीनरी और वित्त की लागत जैसे क्षेत्रों में भारत को अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और मजबूत करनी होगी। इसके अलावा रिसर्च एंड डेवलपमेंट, पेटेंट और हाई-टेक ऑटो कंपोनेंट्स के क्षेत्र में भी निवेश बढ़ाने की जरूरत है। केवल FTA के जरिए बाजार तक पहुंच हासिल कर लेना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि भारतीय उत्पादों को कीमत और गुणवत्ता दोनों में वैश्विक कंपनियों से मुकाबला करना होगा।

66वें SIAM वार्षिक सम्मेलन में भी भारतीय ऑटो उद्योग के भविष्य को लेकर इन्हीं मुद्दों पर जोर दिया गया। सम्मेलन में टिकाऊ मोबिलिटी, वैश्विक स्तर पर भारतीय ऑटो उद्योग की भूमिका, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमोटिव वैल्यू चेन और मजबूत सप्लाई चेन जैसे विषयों पर चर्चा की जा रही है। इससे साफ है कि भारत का ऑटो उद्योग अब केवल घरेलू मांग पूरी करने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

भारत के पास ग्लोबल मोबिलिटी हब बनने के लिए कई मजबूत आधार मौजूद हैं। देश में विशाल घरेलू वाहन बाजार, बड़ी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता, इंजीनियरिंग और तकनीकी प्रतिभा, बढ़ता इलेक्ट्रिक वाहन बाजार, सरकारी प्रोत्साहन और विदेशी बाजारों तक बेहतर पहुंच जैसे फायदे हैं। अगर इन क्षमताओं को बैटरी, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, AI, ऑटोमोटिव सॉफ्टवेयर और हाई-प्रिसिजन कंपोनेंट्स में मजबूत किया जाता है तो भारत वैश्विक ऑटो सप्लाई चेन में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।

कुल मिलाकर FTA ने भारतीय ऑटो उद्योग के सामने वैश्विक बाजार के नए अवसर जरूर खोले हैं, जबकि EV और नई तकनीक ने उद्योग के लिए विकास की नई दिशा तैयार की है। लेकिन भारत को ग्लोबल मोबिलिटी हब बनाने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। कम लागत, बेहतर गुणवत्ता, तकनीकी नवाचार, मजबूत सप्लाई चेन, R&D और कुशल मानव संसाधन पर लगातार काम करना होगा। अगर भारत इन क्षेत्रों में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने में सफल रहता है, तो आने वाले वर्षों में देश केवल दुनिया के बड़े ऑटो बाजारों में से एक नहीं, बल्कि वैश्विक मोबिलिटी मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।

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