यूपीआई भुगतान को लेकर केंद्र सरकार के हालिया फैसले पर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। सरकार ने 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा व्यापारिक यूपीआई लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR लागू करने का फैसला किया है। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर अमेरिका के दबाव में फैसला लेने का आरोप लगाया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री पर तंज कसते हुए ‘NOTA’ का नया अर्थ भी बताया। उन्होंने NOTA को “Narendra’s Ongoing Trump Appeasement” के रूप में इस्तेमाल करते हुए सरकार की नीति पर सवाल उठाए।
जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि यूपीआई लेनदेन पर लंबे समय से चली आ रही शून्य MDR व्यवस्था में बदलाव का फायदा अंतरराष्ट्रीय कार्ड कंपनियों को मिल सकता है। कांग्रेस का दावा है कि अमेरिका की ओर से भारत के मुफ्त यूपीआई मॉडल और Visa तथा Mastercard जैसी वैश्विक कार्ड कंपनियों पर उसके प्रभाव को लेकर आपत्तियां जताई गई थीं। इसी संदर्भ में कांग्रेस ने केंद्र सरकार के नए MDR फैसले को अमेरिकी दबाव से जोड़कर सवाल उठाए हैं। हालांकि, यह कांग्रेस का राजनीतिक आरोप है और उपलब्ध सरकारी जानकारी में इस फैसले को अमेरिकी दबाव के परिणाम के रूप में स्थापित नहीं किया गया है।
सरकार के अनुसार, 15 अक्टूबर 2026 से 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा Person-to-Merchant यानी P2M यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू किया जाएगा। वहीं 2,000 रुपये तक के व्यापारिक यूपीआई भुगतान पर MDR शून्य रहेगा। इसके अलावा, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को किए जाने वाले Person-to-Person यानी P2P यूपीआई भुगतान को भी इस शुल्क व्यवस्था से बाहर रखा गया है। इसका मतलब है कि सामान्य व्यक्ति द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति को यूपीआई से पैसा भेजने पर इस बदलाव का असर नहीं पड़ेगा।
नई व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि MDR को सीधे ग्राहक से वसूला जाने वाला यूपीआई शुल्क नहीं बताया गया है। शुल्क का संबंध व्यापारी पक्ष से जुड़े बड़े मूल्य के लेनदेन से है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि आम यूपीआई उपयोगकर्ताओं के लिए मुफ्त सेवा पर कोई मासिक लेनदेन सीमा या निश्चित संख्या में भुगतान की बाध्यता नहीं लगाई गई है। यानी छोटे मूल्य के भुगतान करने वाले ग्राहकों के लिए यूपीआई के इस्तेमाल में तत्काल शुल्क संबंधी बदलाव नहीं किया गया है।
सरकार और भुगतान क्षेत्र से जुड़े पक्षों के अनुसार, यूपीआई के तेजी से विस्तार के साथ इसके संचालन, बैंकिंग नेटवर्क, तकनीकी बुनियादी ढांचे और भुगतान सेवा प्रदाताओं से जुड़ी लागत को लंबे समय तक वहन करने के लिए एक टिकाऊ आर्थिक मॉडल की आवश्यकता है। नए MDR ढांचे को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। दूसरी ओर, इस फैसले के आलोचकों का कहना है कि बड़े व्यापारिक लेनदेन पर शुल्क लागू होने से व्यापारियों की लागत बढ़ सकती है और भविष्य में इसका अप्रत्यक्ष असर कीमतों या भुगतान के तरीकों पर पड़ सकता है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। कांग्रेस की ओर से आरोप लगाया गया है कि सरकार अमेरिकी दबाव के सामने झुक रही है और नए MDR मॉडल का बोझ अंततः कारोबारियों तथा आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। पार्टी ने यह सवाल भी उठाया है कि जब यूपीआई को भारत के डिजिटल भुगतान मॉडल की बड़ी सफलता के रूप में पेश किया जाता रहा है, तो अब बड़े लेनदेन पर शुल्क लगाने की जरूरत क्यों महसूस हुई।
दूसरी ओर, सरकार और भाजपा की ओर से कांग्रेस के आरोपों को खारिज किया गया है। सरकार का जोर इस बात पर है कि नया शुल्क सीधे आम ग्राहक पर नहीं लगाया जा रहा है और 2,000 रुपये तक के यूपीआई व्यापारिक भुगतान को भी MDR से मुक्त रखा गया है। सरकार के मुताबिक बदलाव मुख्य रूप से बड़े मूल्य वाले व्यापारिक लेनदेन से संबंधित है और इससे सामान्य व्यक्ति-से-व्यक्ति यूपीआई भुगतान प्रभावित नहीं होगा।
यूपीआई भारत के डिजिटल भुगतान तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। अगस्त 2026 में यूपीआई पर करीब 24.5 अरब लेनदेन होने की रिपोर्ट सामने आई, जिनका कुल मूल्य लगभग 29.8 लाख करोड़ रुपये बताया गया। ऐसे समय में लंबे समय से चली आ रही शून्य MDR व्यवस्था में बदलाव को डिजिटल भुगतान क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण नीति परिवर्तन माना जा रहा है। एक तरफ सरकार इसे यूपीआई के आर्थिक रूप से टिकाऊ संचालन की दिशा में कदम बता रही है, वहीं कांग्रेस इसे अमेरिकी दबाव और अंतरराष्ट्रीय कार्ड कंपनियों से जोड़कर देख रही है। इसलिए आने वाले समय में इस फैसले का व्यापारियों, भुगतान कंपनियों और डिजिटल भुगतान के इस्तेमाल पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह महत्वपूर्ण विषय रहेगा।




