संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान भारत ने एक बार फिर ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों की भूमिका और वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि आज दुनिया जिन बड़ी चुनौतियों से गुजर रही है, उनका असर विकासशील देशों पर सबसे ज्यादा पड़ रहा है, लेकिन वैश्विक फैसले लेने वाली संस्थाओं में इन देशों की भूमिका अभी भी उनकी वास्तविक स्थिति के अनुरूप नहीं है। उन्होंने मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में सुधार और निर्णय प्रक्रिया को अधिक प्रतिनिधित्व वाला बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
जयशंकर ने ग्लोबल साउथ से जुड़े देशों के साथ हुई उच्चस्तरीय बैठक में कहा कि विकासशील देश युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, ऊर्जा संकट, खाद्य सुरक्षा की चुनौती, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और जलवायु परिवर्तन जैसे कई संकटों का सामना कर रहे हैं। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े फैसले लेने वाली व्यवस्थाओं में उनकी आवाज सीमित बनी हुई है। उन्होंने इस स्थिति को बदलने की जरूरत बताते हुए कहा कि दुनिया की मौजूदा संस्थागत व्यवस्था उस दौर में बनी थी, जब वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक शक्ति का संतुलन आज से काफी अलग था। इसलिए बदलती वैश्विक वास्तविकताओं के अनुसार अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार जरूरी है।
विदेश मंत्री ने कहा कि पिछले कुछ समय में दुनिया में भू-राजनीतिक तनाव और संघर्ष बढ़े हैं, जिनका असर केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहता। युद्ध और तनाव के कारण ऊर्जा की कीमतों, खाद्य आपूर्ति, व्यापार, निवेश और वैश्विक सप्लाई चेन पर भी असर पड़ता है। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए ऐसी परिस्थितियां विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण होती हैं, क्योंकि उनके पास आर्थिक झटकों से निपटने के संसाधन विकसित देशों की तुलना में सीमित हो सकते हैं। ऐसे में ग्लोबल साउथ के देशों के बीच आपसी सहयोग और साझा हितों के मुद्दों पर समन्वय को मजबूत करना महत्वपूर्ण हो जाता है।
जयशंकर ने ग्लोबल साउथ के सामने मौजूद प्राथमिकताओं पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक मजबूत और भरोसेमंद बनाने की जरूरत बताई, ताकि किसी एक क्षेत्र में संकट पैदा होने पर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित न हो। इसके साथ ही ऊर्जा सुरक्षा को भी महत्वपूर्ण मुद्दा बताया गया। भारत का जोर इस बात पर रहा है कि ऊर्जा की उपलब्धता और कीमतों में अस्थिरता का असर विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर गंभीर रूप से पड़ सकता है। खाद्य सुरक्षा और कृषि से जुड़ी आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत करना भी विकासशील देशों के लिए जरूरी बताया गया।
उन्होंने औद्योगिकीकरण और व्यापार के मुद्दे को भी ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं से जोड़ा। जयशंकर ने इस बात पर जोर दिया कि विकासशील देशों को अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने और रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए औद्योगिक विकास का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। उनके अनुसार, वैश्विक व्यापार व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें विकासशील देशों के लिए आर्थिक विकास के रास्ते खुले रहें और उन्हें केवल बाजार के रूप में सीमित न किया जाए। भारत लंबे समय से विकासशील देशों की विकास संबंधी प्राथमिकताओं और औद्योगिकीकरण के अधिकार को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है।
समुद्री सुरक्षा भी जयशंकर के संबोधन में एक अहम विषय रहा। वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा समुद्री मार्गों के जरिए होता है और इन मार्गों में किसी भी तरह का व्यवधान ऊर्जा, खाद्य पदार्थों, कच्चे माल और अन्य जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में समुद्री मार्गों की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन और समुद्री क्षेत्र में स्थिरता को ग्लोबल साउथ के लिए महत्वपूर्ण बताया गया। भारत ने नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने की जरूरत पर भी जोर दिया।
जयशंकर ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई को भी भविष्य की महत्वपूर्ण वैश्विक प्राथमिकताओं में शामिल किया। एआई के तेजी से विस्तार के साथ अर्थव्यवस्था, रोजगार, सुरक्षा और तकनीकी विकास के क्षेत्र में बड़े बदलाव हो रहे हैं। भारत का रुख रहा है कि नई तकनीकों के लाभ केवल कुछ विकसित देशों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। विकासशील देशों को भी तकनीकी प्रगति और डिजिटल अर्थव्यवस्था में भागीदारी का अवसर मिलना चाहिए। साथ ही एआई के जिम्मेदार इस्तेमाल और इससे जुड़े अंतरराष्ट्रीय नियमों पर भी वैश्विक स्तर पर चर्चा की आवश्यकता है।
जयशंकर के संबोधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग से जुड़ा रहा। भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र और उसकी प्रमुख संस्थाओं में सुधार की वकालत करता रहा है। भारत का तर्क है कि मौजूदा वैश्विक संस्थागत ढांचे में आज की दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं होता। विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका बढ़ने के बावजूद निर्णय लेने वाली संस्थाओं में उनका प्रतिनिधित्व सीमित है। ऐसे में वैश्विक संस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्व वाला और वर्तमान अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन के अनुरूप बनाने की जरूरत बताई जा रही है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा से इतर जयशंकर ने बहुपक्षवाद, अंतरराष्ट्रीय कानून, शांति और समृद्धि से जुड़े एक उच्चस्तरीय कार्यक्रम में भी वैश्विक व्यवस्था पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था कई तरह के दबावों का सामना कर रही है। बढ़ते संघर्ष, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और आर्थिक अस्थिरता के बीच बहुपक्षवाद को और मजबूत करने की आवश्यकता है। उन्होंने वैश्विक स्तर पर ईंधन, खाद्य, उर्वरक और वित्त से जुड़े संकटों को भी महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में रेखांकित किया और कहा कि इन समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
भारत की कूटनीति में ग्लोबल साउथ का मुद्दा पिछले कुछ वर्षों में लगातार प्रमुख रहा है। भारत ने विकासशील देशों के साथ आर्थिक, तकनीकी और कूटनीतिक सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान भारत की ओर से लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई देशों के साथ भी आर्थिक साझेदारी को मजबूत करने की बात सामने आई। भारत ने इन देशों के साथ व्यापार और आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए विभिन्न समझौतों और व्यवस्थाओं का उल्लेख किया।
जयशंकर के हालिया बयानों का व्यापक संदेश यह है कि वैश्विक समस्याओं का समाधान केवल कुछ शक्तिशाली देशों के बीच बातचीत से नहीं हो सकता। युद्ध, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य संकट, जलवायु परिवर्तन, व्यापार, वित्त और नई तकनीक जैसे मुद्दों का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। ऐसे में विकासशील देशों को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रभावी भूमिका दिए जाने की आवश्यकता है। भारत इसी आधार पर बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार, ग्लोबल साउथ के बीच सहयोग और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत करने की वकालत कर रहा है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा के मौजूदा सत्र में भारत का यह रुख ऐसे समय सामने आया है जब दुनिया कई क्षेत्रों में संघर्ष और आर्थिक अनिश्चितता का सामना कर रही है। जयशंकर ने अपने बयानों के जरिए यह रेखांकित किया कि ग्लोबल साउथ के देश वैश्विक संकटों से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले देशों में शामिल हैं, इसलिए अंतरराष्ट्रीय फैसलों में उनकी आवाज और भागीदारी भी उसी अनुपात में बढ़नी चाहिए। भारत का जोर ऐसी बहुपक्षीय व्यवस्था पर है जिसमें विकासशील देशों की चिंताओं को केवल चर्चा का विषय न बनाया जाए, बल्कि वैश्विक नीतियां तय करते समय उन्हें निर्णय प्रक्रिया का सक्रिय हिस्सा बनाया जाए।




