प्रेम शंकर झा, आइआरएसएस
भारत की अर्थव्यवस्था में दो तरह का पैसा एक साथ चल रहा था। एक वह, जो बैंक की किताबों में दर्ज था और दूसरा वह, जिसकी असली ताकत उसके बैंक से बाहर रहने में थी। बाजार में नकदी थी, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा औपचारिक वित्तीय तंत्र से बाहर था। दूसरी ओर बैंकों के पास पैसा था, मगर उनका एक बड़ा हिस्सा ऐसे कर्ज में फंसा था जिसकी वापसी का रास्ता साफ नहीं था। 2016 में नरेन्द्र मोदी सरकार ने इन दोनों समस्याओं को अलग-अलग जगहों से छुआ। एक फैसला सीधे देश की नकदी पर पड़ा, दूसरे ने बैंक और कर्ज की पुरानी व्यवस्था को बदलने की कोशिश की। 8 नवंबर की रात इसी आर्थिक सोच का सबसे असाधारण चेहरा सामने आया। नरेन्द्र मोदी ने 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को उसी रात से वैध मुद्रा न मानने की घोषणा की। उस समय ये दोनों मूल्यवर्ग प्रचलित नोटों के कुल मूल्य का करीब 86 प्रतिशत थे। प्रधानमंत्री ने इसे भ्रष्टाचार, अघोषित धन, जाली मुद्रा और आतंकवाद के वित्तपोषण के खिलाफ बड़ा कदम बताया। उनका तर्क था कि बड़ी मात्रा में नकदी का इस्तेमाल ऐसी आर्थिक गतिविधियों में हो रहा है जिसका पूरा हिसाब व्यवस्था के पास नहीं है।
यहां नरेन्द्र मोदी की सोच का एक महत्वपूर्ण पहलू दिखाई देता है। वे केवल नोट बदलने की बात नहीं कर रहे थे। उनकी चिंता उस अर्थव्यवस्था को लेकर थी जिसमें लेनदेन होता है, संपत्ति खरीदी जाती है, कारोबार चलता है और पैसा कमाया जाता है, लेकिन उसका पूरा निशान औपचारिक व्यवस्था में नहीं आता। नोटबंदी के जरिए नकदी को बैंक में वापस लाना इसी सोच का सबसे कठोर प्रयोग था। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था कागज पर नहीं, लोगों के हाथों में चलती है। फैसले के अगले ही दिन इसकी कीमत दिखाई देने लगी। बैंकों और एटीएम के बाहर लंबी कतारें लगीं। पुराने नोट बदलने और जमा करने के लिए लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ा। नकदी की कमी का सबसे सीधा असर उन लोगों पर पड़ा जिनकी आय और कारोबार रोज के नकद लेनदेन पर निर्भर था। छोटे दुकानदार, दिहाड़ी मजदूर, किसान और असंगठित क्षेत्र के कारोबारी अचानक ऐसी व्यवस्था के सामने थे जिसमें पैसा उनके पास था, लेकिन उसका तत्काल इस्तेमाल संभव नहीं था। आर्थिक सर्वेक्षण ने भी नोटबंदी के तत्काल असर में नकदी की कमी और अनौपचारिक क्षेत्र पर पड़े दबाव को दर्ज किया।
यहीं 2016 का सबसे कठिन प्रश्न खड़ा हुआ। सरकार जिस अघोषित नकदी को व्यवस्था से बाहर करना चाहती थी, वह कितनी बाहर रह गई? रिजर्व बैंक के आंकड़ों ने बाद में इस सवाल का सीधा उत्तर दिया। विमुद्रीकृत नोटों में करीब 15.31 लाख करोड़ रुपये वापस बैंकिंग प्रणाली में आ गए। यानी नोटबंदी के बाद बंद किए गए नोटों का लगभग पूरा मूल्य बैंकिंग तंत्र में लौट आया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि काले धन की समस्या को केवल नकदी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं था। अघोषित संपत्ति जमीन, सोना, कारोबार और दूसरे माध्यमों में भी हो सकती है। नोटबंदी की यही सबसे बड़ी विडंबना थी। जिस नकदी को व्यवस्था से बाहर करने के लिए इतना बड़ा फैसला लिया गया था, उसका अधिकांश हिस्सा अंततः व्यवस्था के भीतर लौट आया। इसलिए इसे अघोषित नकदी को समाप्त करने की पूर्ण सफलता के रूप में देखना तथ्यात्मक नहीं होगा। लेकिन कहानी यहीं खत्म भी नहीं हुई। बैंक में लौटे उस पैसे ने वित्तीय व्यवस्था को एक अलग तरह से प्रभावित किया। नकदी, जो पहले घरों और कारोबारों में घूम रही थी, कुछ समय के लिए बैंक खातों में आ गई। इसी दौरान डिजिटल भुगतान को भी असाधारण गति मिली। यहां एक तथ्य ध्यान देने योग्य है। एकीकृत भुगतान प्रणाली यानी यूपीआई नोटबंदी के कारण पैदा नहीं हुई थी। उसका परीक्षण अप्रैल 2016 में शुरू हो चुका था। लेकिन नवंबर के बाद नकदी की कमी ने उस तकनीक को प्रयोग से निकालकर रोजमर्रा की जरूरत बना दिया। दिसंबर में भीम ऐप शुरू हुआ और डिजिटल भुगतान को सरकार की ओर से बड़े पैमाने पर प्रोत्साहन मिला।.बाद के वर्षों में यूपीआई जिस विशाल डिजिटल भुगतान व्यवस्था में बदला, उसका पूरा श्रेय नोटबंदी को देना भी सही नहीं होगा। डिजिटल भुगतान की अपनी तकनीकी और संस्थागत यात्रा पहले से चल रही थी। लेकिन नोटबंदी ने उस यात्रा को एक ऐसा सामाजिक दबाव दिया जिसमें करोड़ों लोगों को पहली बार नकदी के विकल्प का इस्तेमाल करना पड़ा। बाद के विश्लेषणों में भी नोटबंदी को डिजिटल लेनदेन और आर्थिक औपचारिकता की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण उत्प्रेरक माना गया है, हालांकि इसके प्रभाव की मात्रा और कारण को लेकर मतभेद बने रहे।
2016 की दूसरी बड़ी कहानी कहीं कम नाटकीय थी, लेकिन आर्थिक व्यवस्था के लिए शायद ज्यादा संस्थागत महत्व रखती थी। 28 मई को दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता लागू हुई। इसका उद्देश्य कंपनियों, साझेदारी फर्मों और अन्य पात्र संस्थाओं के दिवाला मामलों को एक समयबद्ध कानूनी प्रक्रिया में लाना था। भारत की बैंकिंग व्यवस्था में यह एक पुराना घाव था। बैंक कर्ज देते थे, कंपनियां उस कर्ज से कारोबार खड़ा करती थीं, लेकिन कारोबार बिगड़ने पर कर्ज की वसूली और कंपनी के भविष्य का फैसला वर्षों तक खिंच सकता था। अलग-अलग कानूनों और संस्थाओं में बंटी प्रक्रिया के कारण समय बीतता जाता और परिसंपत्तियों का मूल्य घटता जाता। बैंक का पैसा फंसता था और उसके साथ नई आर्थिक गतिविधि के लिए उपलब्ध पूंजी भी कम होती थी। दिवाला संहिता ने इस व्यवस्था का मूल प्रश्न बदला। कर्ज न चुका पाने वाली कंपनी के साथ क्या होगा, इसका निर्णय अनिश्चितकाल तक टलता नहीं रह सकता। समाधान की एक समयबद्ध प्रक्रिया होनी चाहिए, परिसंपत्ति का मूल्य बचाया जाना चाहिए और ऋणदाता तथा अन्य हितधारकों के अधिकारों के लिए स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए। कानून के घोषित उद्देश्यों में परिसंपत्तियों के मूल्य को अधिकतम करना, उद्यमिता को बढ़ावा देना और ऋण की उपलब्धता मजबूत करना शामिल था। यहीं 2016 की दो सबसे बड़ी आर्थिक घटनाएं एक दूसरे से जुड़ती हैं। नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था के बाहर घूम रही नकदी को बैंकिंग व्यवस्था के सामने ला खड़ा किया। दिवाला संहिता ने बैंकिंग व्यवस्था के भीतर फंसे कर्ज के समाधान का रास्ता बनाया। एक का असर करोड़ों नागरिकों की जेब पर पड़ा, दूसरे का असर कंपनियों और बैंकों के संबंध पर। दोनों में एक साझा आग्रह था, आर्थिक गतिविधि ऐसी व्यवस्था में हो जहां उसका हिसाब हो, उसका जोखिम पहचाना जा सके और संकट आने पर उसके समाधान की संस्थागत प्रक्रिया मौजूद हो। इसी वर्ष रियल एस्टेट क्षेत्र के लिए नया नियामक ढांचा आया और आधार को भी वैधानिक आधार मिला। इन कदमों को नोटबंदी के साथ जोड़कर देखना इसलिए महत्वपूर्ण है कि 2016 में औपचारिकता केवल नकदी का प्रश्न नहीं रही। संपत्ति, पहचान, कर्ज और लेनदेन, आर्थिक व्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों को अधिक स्पष्ट नियमों के भीतर लाने की कोशिश दिखाई देने लगी। लेकिन 2016 की कहानी में सबसे जरूरी बात शायद यह है कि व्यवस्था बदलने की कोशिश और व्यवस्था बदल जाने की वास्तविकता एक ही चीज नहीं होती। नरेन्द्र मोदी सरकार ने नोटबंदी के जरिए जिस गति से परिवर्तन लाने की कोशिश की, उसकी कीमत भी उतनी ही तेज थी। छोटे कारोबार और नकदी पर निर्भर लोगों के लिए वह समय आसान नहीं था। बैंकिंग व्यवस्था को भी इतनी बड़ी मात्रा में मुद्रा बदलने के लिए असाधारण दबाव झेलना पड़ा। उस फैसले ने यह साफ कर दिया कि भारत जैसे देश में औपचारिक अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना केवल सरकार की इच्छा का प्रश्न नहीं है। उसके रास्ते में करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की आर्थिक आदतें और उनकी वास्तविक परिस्थितियां भी आती हैं। दूसरी तरफ दिवाला संहिता का रास्ता अलग था। वहां कोई एक रात नहीं थी, कोई अचानक बदलाव नहीं था। अदालतें, बैंक, कंपनियां और नई संस्थागत व्यवस्था धीरे-धीरे उसकी परीक्षा लेने वाली थीं। इसलिए 2016 में एक ही सरकार की आर्थिक सोच के दो रूप दिखाई दिए। एक तरफ तत्काल और असाधारण हस्तक्षेप, दूसरी तरफ कानून के जरिए धीरे-धीरे बदलती संस्था।
नरेन्द्र मोदी के लिए 2016 की सबसे बड़ी चुनौती शायद यही थी कि भारतीय अर्थव्यवस्था को अधिक औपचारिक बनाने का अर्थ केवल नकदी कम करना नहीं था। उसे ऐसी व्यवस्था बनानी थी जिसमें व्यक्ति बैंकिंग प्रणाली से जुड़ा हो, कारोबार का लेनदेन दर्ज हो, कर्ज की जवाबदेही तय हो और संकटग्रस्त कंपनी के मामले का समाधान वर्षों तक लंबित न रहे। नोटबंदी अपने घोषित उद्देश्य के हर हिस्से में अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकी। लगभग पूरी विमुद्रीकृत नकदी का बैंकिंग प्रणाली में लौटना इसका सबसे स्पष्ट प्रमाण था। लेकिन उसी दौर में डिजिटल भुगतान को तेज गति मिली और आर्थिक गतिविधियों की औपचारिकता पर राष्ट्रीय बहस पहले से कहीं अधिक व्यापक हुई। दिवाला संहिता ने दूसरी ओर वित्तीय क्षेत्र में एक ऐसा संस्थागत ढांचा बनाया जिसका प्रभाव किसी एक रात में नहीं, बल्कि समय के साथ मापा जाना था। इसलिए 2016 को केवल नोटबंदी का वर्ष कहना उसके अर्थ को छोटा करना होगा। यह उस वर्ष की कहानी थी जिसमें नरेन्द्र मोदी ने अर्थव्यवस्था की दो छिपी हुई कमजोरियों को सामने लाने की कोशिश की बाहर घूमती नकदी और भीतर फंसा हुआ कर्ज। एक को झटके से बैंकिंग व्यवस्था तक लाया गया, दूसरे के लिए कानून के जरिए रास्ता बनाया गया। 2016 का असली महत्व इसी तनाव में है। शासन ने पहली बार इतनी स्पष्टता से यह सवाल सामने रखा कि भारत की आर्थिक ताकत केवल उत्पादन और उपभोग में नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की पारदर्शिता, वित्तीय अनुशासन और संस्थागत क्षमता में भी है जिसके भीतर यह सब होता है। नोटबंदी ने इस प्रश्न को पूरे देश के अनुभव में बदल दिया। दिवाला संहिता ने उसे आर्थिक संस्थाओं के भीतर उतारा। और यहीं से 2016, नरेन्द्र मोदी के आर्थिक शासन की कहानी में एक अलग अध्याय बनता है।




