17वां वर्ष : 2017–18 – एक देश, एक बाजार और बदलती आर्थिक व्यवस्था

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प्रेम शंकर झा, आईआरएसएस

भारत में सड़कें राज्यों की सीमाओं से होकर गुजरती थीं, रेलें भी और व्यापार भी। लेकिन व्यापार का रास्ता केवल सड़क से तय नहीं होता। हर राज्य की अपनी कर व्यवस्था, अपनी दरें, अपने दस्तावेज और अपनी प्रक्रियाएं थीं। एक राज्य में बना माल दूसरे राज्य तक पहुंचते-पहुंचते कई तरह के करों और जांचों से गुजरता था। देश एक था, बाजार पूरी तरह एक नहीं था। इसी पुराने ढांचे को बदलने की सबसे बड़ी कोशिश 1 जुलाई 2017 की आधी रात से शुरू हुई। संसद के केंद्रीय कक्ष में विशेष मध्यरात्रि सत्र के दौरान वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी लागू हुआ। केंद्रीय उत्पाद शुल्क, सेवा कर और राज्यों के मूल्यवर्धित कर समेत अनेक अप्रत्यक्ष करों को एक साझा व्यवस्था में लाने वाला यह सुधार केवल करों को जोड़ने की कवायद नहीं था। इसके पीछे एक बड़ा प्रशासनिक विचार था कि भारत के भीतर कारोबार की अलग-अलग कर सीमाओं को धीरे-धीरे समाप्त कर एक साझा बाजार बनाया जाए। लेकिन जीएसटी की सबसे महत्वपूर्ण बात शायद उसका कर ढांचा नहीं, बल्कि उसकी निर्णय प्रक्रिया थी। भारत जैसे संघीय देश में केंद्र अकेले राज्यों की कर शक्तियों को एक नई व्यवस्था में नहीं बांध सकता था। इसलिए जीएसटी परिषद बनी, जिसमें केंद्र और राज्यों को साथ बैठकर कर दरों, छूट, नियमों और प्रक्रियाओं पर निर्णय लेना था। संविधान संशोधन के बाद बनी यह परिषद भारतीय सहकारी संघवाद के लिए भी एक नई संस्था थी। नरेन्द्र मोदी सरकार के सामने इसलिए दोहरी चुनौती थी। पहली, दशकों से चली आ रही अलग-अलग कर प्रणालियों को एक करना। दूसरी, ऐसा करते हुए राज्यों को यह विश्वास दिलाना कि साझा व्यवस्था उनके राजस्व और अधिकारों को कमजोर करने के बजाय उन्हें एक नए ढांचे में सुरक्षित करेगी। जीएसटी की शुरुआत से पहले महीनों तक इसी पर बातचीत होती रही। कानून बना, दरें तय हुईं, सॉफ्टवेयर तैयार हुआ और करदाताओं को नई व्यवस्था में लाने की तैयारी हुई।

फिर 1 जुलाई आया और कागज पर तैयार की गई व्यवस्था पहली बार करोड़ों कारोबारियों के सामने थी। यहीं से सुधार का सबसे कठिन हिस्सा शुरू हुआ। जीएसटी का उद्देश्य कर प्रणाली को सरल बनाना था, लेकिन शुरुआती महीनों में छोटे कारोबारियों के लिए यह व्यवस्था आसान नहीं थी। पंजीकरण, चालान, रिटर्न और डिजिटल अनुपालन की नई प्रक्रिया के साथ तकनीकी समस्याएं भी सामने आईं। जिन कारोबारियों के लिए कर व्यवस्था अब तक मुख्यतः स्थानीय और कागजी थी, उन्हें अचानक डिजिटल मंच पर नियमित अनुपालन करना था। आर्थिक सर्वेक्षण ने भी इस संक्रमण के दौरान छोटे कारोबारियों पर अनुपालन संबंधी दबाव और व्यवस्था में किए गए शुरुआती बदलावों को दर्ज किया। यहां 2017 की प्रशासनिक शैली का एक महत्वपूर्ण पक्ष दिखाई देता है। जीएसटी को अंतिम और अपरिवर्तनीय व्यवस्था मानकर नहीं चलाया गया। जीएसटी परिषद लगातार बैठती रही और कारोबारियों तथा राज्यों से मिल रही कठिनाइयों के आधार पर नियमों और दरों में बदलाव करती रही। नवंबर 2017 में 28 प्रतिशत वाली श्रेणी में शामिल वस्तुओं की संख्या 228 से घटाकर लगभग 50 कर दी गई। छोटे कारोबारियों की कुछ प्रक्रियागत परेशानियां भी कम की गईं। यानी सरकार के सामने पहला साल किसी तैयार मॉडल को लागू करने का नहीं, बल्कि चलते हुए मॉडल को सुधारने का था। यह अंतर महत्वपूर्ण है। बड़े आर्थिक सुधार अक्सर कानून बनते ही कागज पर सफल दिखाई देते हैं। उनकी वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि व्यापारी, उपभोक्ता, अधिकारी और राज्य उन्हें रोजमर्रा की जिंदगी में किस तरह अपनाते हैं। जीएसटी का पहला वर्ष इसी परीक्षा से गुजरा। इसका सबसे दिखाई देने वाला बदलाव माल की आवाजाही में था। पुराने समय में राज्यों की सीमाएं केवल प्रशासनिक सीमाएं नहीं थीं, वे कारोबार के लिए भी पड़ाव बन जाती थीं। अलग-अलग कर प्रक्रियाओं और जांच के कारण ट्रकों को रुकना पड़ता था। जीएसटी के साथ इस व्यवस्था को हटाने की दिशा में कदम बढ़ा और बाद में ई-वे बिल ने माल की अंतरराज्यीय आवाजाही को डिजिटल निगरानी से जोड़ने का काम किया। इसका उद्देश्य यह था कि कर चोरी रोकने के लिए हर सीमा पर भौतिक जांच जरूरी न रहे और कारोबार की गति भी बनी रहे। यहीं जीएसटी का असली अर्थ दिखाई देता है। यह केवल यह तय करने की व्यवस्था नहीं थी कि किसी वस्तु पर कितना कर लगेगा। इसका लक्ष्य यह बदलना था कि भारत के भीतर वह वस्तु किस तरह घूमेगी, उसका हिसाब कैसे दर्ज होगा और अलग-अलग राज्यों के बीच कारोबार कैसे होगा।

हालांकि इस परिवर्तन का समय आसान नहीं था। जीएसटी से कुछ महीने पहले ही नोटबंदी ने नकदी आधारित कारोबार को बड़ा झटका दिया था। छोटे व्यापार और असंगठित क्षेत्र अभी उस बदलाव से उबर ही रहे थे कि नई कर व्यवस्था लागू हो गई। इसलिए 2017–18 की आर्थिक गतिविधियों में आई कमजोरी को केवल जीएसटी के खाते में डालना उचित नहीं होगा। उस समय अर्थव्यवस्था एक साथ कई बड़े संरचनात्मक बदलावों से गुजर रही थी। फिर भी, इसी कठिन संक्रमण में नरेन्द्र मोदी सरकार के आर्थिक शासन की एक खास प्रवृत्ति उभरकर सामने आई। व्यवस्था बदलने के बाद उसके परिणामों को देखकर उसमें संशोधन करना। जीएसटी परिषद इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा मंच बनी। दरें बदलीं, प्रक्रियाएं बदलीं और छोटे कारोबारियों को राहत देने के लिए प्रावधानों में लगातार सुधार हुआ। यह व्यवस्था बाद के वर्षों में भी इसी तरह विकसित होती रही।

17वें वर्ष की कहानी केवल जीएसटी तक सीमित नहीं थी। आर्थिक व्यवस्था को एकीकृत करने की इस कोशिश के साथ सरकार का जोर उस बुनियादी सुविधा पर भी था जो नागरिक के जीवन में राज्य की मौजूदगी को सबसे सीधे ढंग से महसूस कराती है। 25 सितंबर 2017 को सौभाग्य योजना शुरू की गई। लक्ष्य था उन घरों तक बिजली का कनेक्शन पहुंचाना जो अब तक इससे वंचित थे। योजना का कुल परिव्यय 16,320 करोड़ रुपये रखा गया और उस समय राज्यों की रिपोर्ट के आधार पर करीब चार करोड़ घरों को संभावित रूप से कनेक्शन की जरूरत बताई गई थी। योजना में अंतिम छोर तक कनेक्शन पहुंचाने और उसकी निगरानी के लिए डिजिटल पोर्टल का भी इस्तेमाल किया गया।

यहां नरेन्द्र मोदी के गुजरात के वर्षों की एक प्रशासनिक सीख का राष्ट्रीय विस्तार देखा जा सकता है। केवल बिजली उत्पादन बढ़ा देना पर्याप्त नहीं था। सवाल यह था कि बिजली आखिरकार घर तक पहुंचे कैसे। सौभाग्य ने इसी अंतिम दूरी को लक्ष्य बनाया। दिसंबर 2018 तक सरकारी आंकड़ों के अनुसार 25 राज्यों में शत प्रतिशत घरेलू विद्युतीकरण दर्ज किया गया और योजना शुरू होने के बाद करीब 2.39 करोड़ घरों को कनेक्शन दिया जा चुका था। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी 2017–18 में एक बड़े बदलाव की नींव पड़ी। फरवरी 2018 के बजट में आयुष्मान भारत की घोषणा हुई और मार्च में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण मिशन को मंजूरी दी। योजना के तहत 10 करोड़ से अधिक गरीब और कमजोर परिवारों को प्रति परिवार पांच लाख रुपये सालाना तक का स्वास्थ्य कवर देने का प्रावधान रखा गया। यह योजना सितंबर 2018 में लागू हुई, इसलिए सत्रहवें वर्ष में इसका महत्व उसके परिणामों से अधिक उसकी तैयारी में था। यहां भी वही प्रशासनिक विचार दिखाई देता है जो जीएसटी में था। लक्ष्य केवल घोषणा करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करना था जिसे देश के अलग-अलग राज्यों और करोड़ों लाभार्थियों तक पहुंचाया जा सके। मार्च 2018 में नरेन्द्र मोदी ने अधिकारियों के साथ इसकी तैयारियों की समीक्षा भी की और फिर इसी वर्ष शासन के सामने आर्थिक सुधारों से बिल्कुल अलग प्रकृति की चुनौती आई। भूटान के डोकलाम क्षेत्र में भारत और चीन की सेनाएं आमने-सामने थीं। करीब दो महीने चले गतिरोध के बाद 28 अगस्त 2017 को दोनों पक्षों ने वहां से अपने सीमा कर्मियों को पीछे हटाया। विदेश मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट ने इसे शांतिपूर्ण समाधान बताया और दोनों पक्षों की राजनीतिक परिपक्वता का उल्लेख किया।

डोकलाम इस लेख का मुख्य विषय नहीं है, लेकिन 17वें वर्ष की व्यापक तस्वीर समझने के लिए इसका उल्लेख जरूरी है। एक तरफ सरकार देश के भीतर कर व्यवस्था और बुनियादी सेवाओं की संरचना बदल रही थी, दूसरी तरफ सीमा पर पैदा हुए तनाव को नियंत्रित करने की चुनौती सामने थी। शासन की कसौटी एक ही क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती।

2017–18 की सबसे बड़ी उपलब्धि इसलिए किसी एक योजना का आंकड़ा नहीं, बल्कि व्यवस्था को एक साथ कई स्तरों पर बदलने की कोशिश थी। जीएसटी ने बाजार को एक साझा कर ढांचे में लाने का प्रयास किया। सौभाग्य ने बिजली की आखिरी दूरी को कम करने का लक्ष्य रखा। आयुष्मान भारत ने स्वास्थ्य सुरक्षा को करोड़ों परिवारों तक ले जाने की तैयारी शुरू की। डोकलाम ने रणनीतिक निर्णय क्षमता की परीक्षा ली। इन सबके बीच जीएसटी सबसे महत्वपूर्ण प्रयोग था, क्योंकि उसने केंद्र और राज्यों दोनों की भूमिका बदल दी। एक कर व्यवस्था, जिसे लंबे समय से सुधार की जरूरत के रूप में देखा जा रहा था, अब रोजमर्रा के कारोबार का हिस्सा बन चुकी थी। इसकी शुरुआत में परेशानियां थीं, तकनीकी दिक्कतें थीं और अनुपालन का दबाव था। लेकिन इन्हीं कठिनाइयों ने सरकार को यह भी सिखाया कि भारत जैसी विशाल अर्थव्यवस्था में सुधार का अर्थ केवल नया कानून बनाना नहीं है। सुधार को लगातार सुनना, बदलना और सरल करना भी शासन का हिस्सा है। यही 2017–18 की सबसे महत्वपूर्ण सीख थी।

नरेन्द्र मोदी के लिए यह वर्ष घोषणाओं से अधिक संस्थाओं की परीक्षा का वर्ष था। जीएसटी परिषद ने केंद्र और राज्यों को एक साझा आर्थिक मंच पर खड़ा किया। कर सुधार ने बाजार की पुरानी सीमाओं को चुनौती दी। सौभाग्य ने प्रशासन की पहुंच को आखिरी घर तक ले जाने की कोशिश की और आयुष्मान भारत ने स्वास्थ्य सुरक्षा को बड़े पैमाने पर संगठित करने की तैयारी की। एकीकृत भारत केवल संसद में कानून बनाकर नहीं बनता। वह तब बनता है जब व्यापारी को राज्य की सीमा पर कम रुकना पड़े, करदाता की पहचान व्यवस्था में दर्ज हो, गांव का घर बिजली से जुड़े और गरीब परिवार के लिए बीमारी आर्थिक संकट में न बदले। 2017–18 में इस दिशा में कई बड़े कदम एक साथ उठे। उनकी मंजिल तत्काल दिखाई नहीं देती थी। लेकिन शासन की दिशा जरूर बदल रही थी। भारत को योजनाओं से नहीं, साझा व्यवस्थाओं से जोड़ने का दौर शुरू हो चुका था।

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