आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई को मजबूत बनाने के लिए भारत ने संयुक्त राष्ट्र में एक अहम मुद्दा उठाया है। भारत ने मांग की है कि मानवता के खिलाफ अपराधों की रोकथाम और दोषियों को सजा देने के लिए तैयार की जा रही प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय संधि में आतंकवाद से जुड़े गंभीर अपराधों को उचित स्थान दिया जाए। भारत का मानना है कि आतंकवाद केवल किसी एक देश की सुरक्षा के लिए खतरा नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन, सामाजिक स्थिरता, अंतरराष्ट्रीय शांति और मानवीय मूल्यों के लिए भी गंभीर चुनौती है। आतंकवादी हमलों में निर्दोष नागरिकों की जान जाती है और प्रभावित परिवारों को लंबे समय तक इसके दुष्परिणामों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आतंकवाद से निपटने के लिए अधिक प्रभावी कानूनी व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा की छठी समिति में मानवता के खिलाफ अपराधों से संबंधित प्रस्तावित संधि पर चर्चा के दौरान भारत ने अपना पक्ष रखा। भारत की प्रतिनिधि आर. मैथिली ने इस विषय पर देश का दृष्टिकोण सामने रखा। भारत का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून तैयार करते समय आतंकवाद से जुड़े गंभीर अपराधों की प्रकृति और उनके प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, किसी भी आतंकवादी गतिविधि को स्वतः मानवता के खिलाफ अपराध घोषित नहीं किया जा सकता। इसके लिए संबंधित घटना को अंतरराष्ट्रीय कानून में निर्धारित कानूनी मानकों पर खरा उतरना होगा। भारत की मांग का उद्देश्य आतंकवाद से जुड़े उन गंभीर अपराधों को लेकर कानूनी स्पष्टता और जवाबदेही को मजबूत करना है, जो मानवता के खिलाफ अपराधों की निर्धारित परिभाषा के अंतर्गत आ सकते हैं।
दरअसल, संयुक्त राष्ट्र में मानवता के खिलाफ अपराधों की रोकथाम और उनके लिए सजा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक अंतरराष्ट्रीय संधि तैयार करने की प्रक्रिया चल रही है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 4 दिसंबर 2024 को प्रस्ताव 79/122 के माध्यम से इस दिशा में आगे बढ़ने का निर्णय लिया था। इस प्रक्रिया के तहत वर्ष 2028 और 2029 में न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किए जाने की योजना है। इन सम्मेलनों में सदस्य देशों के प्रतिनिधि संधि के विभिन्न प्रावधानों पर बातचीत करेंगे और कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। इस संधि का प्रमुख उद्देश्य मानवता के खिलाफ अपराधों को रोकने, उनकी जांच करने, जिम्मेदार लोगों को न्याय के कटघरे में लाने और देशों के बीच कानूनी सहयोग को मजबूत बनाने के लिए एक साझा व्यवस्था विकसित करना है।
प्रस्तावित संधि में आतंकवाद से संबंधित अपराधों को शामिल करने की भारत की मांग इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि आतंकवादी हमलों और मानवता के खिलाफ अपराधों के बीच कानूनी संबंध को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा की आवश्यकता बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, मानवता के खिलाफ अपराधों का निर्धारण केवल इस आधार पर नहीं होता कि कोई घटना कितनी भयावह थी। इसके लिए अपराध की प्रकृति, नागरिक आबादी के खिलाफ हमले का व्यापक या व्यवस्थित स्वरूप और अन्य निर्धारित कानूनी शर्तों को ध्यान में रखा जाता है। हत्या, यातना, जबरन गायब करना और अन्य गंभीर कृत्य परिस्थितियों के आधार पर मानवता के खिलाफ अपराधों की श्रेणी में आ सकते हैं। इसलिए आतंकवाद से जुड़ी किसी घटना को इस श्रेणी में रखने के लिए भी लागू अंतरराष्ट्रीय कानूनी मानकों का पालन करना जरूरी होगा।
भारत लंबे समय से आतंकवाद के खिलाफ एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था बनाने की वकालत करता रहा है। वर्ष 1996 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में व्यापक अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद-विरोधी संधि यानी कॉम्प्रिहेंसिव कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल टेररिज्म का मसौदा प्रस्तुत किया था। इसका उद्देश्य आतंकवाद से निपटने के लिए एक व्यापक कानूनी ढांचा तैयार करना है। हालांकि, आतंकवाद की सर्वमान्य परिभाषा और कुछ कानूनी प्रावधानों को लेकर सदस्य देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समुदाय को एकजुट होकर काम करना चाहिए और आतंकवादी गतिविधियों को किसी भी आधार पर उचित नहीं ठहराया जाना चाहिए।
भारत का मानना है कि आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई केवल हमलों को रोकने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि आतंकवादी संगठनों को मिलने वाली वित्तीय और अन्य सहायता पर भी प्रभावी रोक लगाई जानी चाहिए। आतंकवादी नेटवर्क को आर्थिक मदद पहुंचाने वालों, उन्हें संसाधन उपलब्ध कराने वालों और उनकी गतिविधियों को समर्थन देने वाले तंत्र की जवाबदेही तय करना भी महत्वपूर्ण है। आधुनिक तकनीक और डिजिटल माध्यमों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच आतंकवाद के वित्तपोषण और संगठनात्मक नेटवर्क पर नियंत्रण स्थापित करना अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी हो गया है। भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्र में उठाए गए मुद्दे को इसी व्यापक आतंकवाद-विरोधी दृष्टिकोण के संदर्भ में देखा जा रहा है।
प्रस्तावित संधि को लेकर भारत ने देशों की संप्रभुता, राष्ट्रीय न्यायिक व्यवस्था और अधिकार क्षेत्र से जुड़े सवालों को भी महत्वपूर्ण माना है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवता के खिलाफ अपराधों की रोकथाम के लिए सहयोग आवश्यक है, लेकिन संधि के प्रावधान स्पष्ट और कानूनी रूप से संतुलित होने चाहिए। देशों की जिम्मेदारियों को निर्धारित करते समय उनकी न्यायिक प्रक्रियाओं, निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों और आरोपियों के कानूनी अधिकारों का भी ध्यान रखना जरूरी होगा। साथ ही, पीड़ितों को न्याय दिलाने और गंभीर अपराधों के लिए जिम्मेदार लोगों को दंडित करने की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। सदस्य देशों के बीच अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाओं और राष्ट्रीय हितों के कारण इस विषय पर सहमति बनाना एक बड़ी चुनौती हो सकती है।
आतंकवाद और मानवता के खिलाफ अपराधों के बीच अंतर को समझना भी इस बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा है। आतंकवाद में हिंसा या हिंसा की धमकी के माध्यम से लोगों में भय पैदा करना, नागरिकों को निशाना बनाना अथवा सरकारों और समाज पर दबाव डालना जैसी गतिविधियां शामिल हो सकती हैं। दूसरी ओर, मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून में विशिष्ट कानूनी शर्तें निर्धारित हैं। यदि कोई गंभीर अपराध नागरिक आबादी के खिलाफ व्यापक या व्यवस्थित हमले के हिस्से के रूप में किया जाता है और अन्य आवश्यक कानूनी तत्व मौजूद होते हैं, तो उसे मानवता के खिलाफ अपराध माना जा सकता है। इसलिए प्रत्येक आतंकवादी हमला स्वतः इस श्रेणी में नहीं आएगा। किसी मामले का अंतिम कानूनी वर्गीकरण उसके तथ्यों और लागू कानून पर निर्भर करेगा।
अब सभी की नजरें वर्ष 2028 और 2029 में प्रस्तावित संयुक्त राष्ट्र सम्मेलनों पर टिकी हैं। इन बैठकों में सदस्य देश मानवता के खिलाफ अपराधों की परिभाषा, उन्हें रोकने की जिम्मेदारी, राष्ट्रीय न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और दोषियों की जवाबदेही जैसे विषयों पर चर्चा करेंगे। आतंकवाद से जुड़े गंभीर अपराधों को संधि में किस रूप में शामिल किया जाएगा, यह आगे होने वाली बातचीत और सदस्य देशों के बीच बनने वाली सहमति पर निर्भर करेगा। भारत की मांग इस प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि अंतिम संधि में आतंकवाद को लेकर कौन-से विशिष्ट प्रावधान शामिल किए जाएंगे।
कुल मिलाकर, संयुक्त राष्ट्र में भारत की यह पहल आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक सहयोग को मजबूत बनाने और गंभीर अपराधों के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा सकती है। भारत चाहता है कि अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था तैयार करते समय आतंकवादी हिंसा के गंभीर मामलों पर भी पर्याप्त ध्यान दिया जाए और जहां कानूनी शर्तें पूरी होती हों, वहां मानवता के खिलाफ अपराधों से संबंधित प्रावधान लागू करने की संभावनाओं पर विचार किया जाए। आने वाले वर्षों में प्रस्तावित संधि पर होने वाली बातचीत यह तय करेगी कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस दिशा में किस तरह आगे बढ़ता है और आतंकवाद से जुड़े गंभीर अपराधों को नई कानूनी व्यवस्था में किस प्रकार स्थान मिलता है।




