मनरेगा से वीबी-जी राम जी तक: नई रोजगार व्यवस्था पर कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने

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ग्रामीण रोजगार व्यवस्था में बदलाव को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच राजनीतिक टकराव तेज हो गया है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) की जगह लागू की गई नई व्यवस्था ‘वीबी-जी राम जी’ को लेकर कांग्रेस ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर निशाना साधा है। पार्टी का आरोप है कि नई व्यवस्था से ग्रामीण मजदूरों के रोजगार अधिकार और सामाजिक सुरक्षा प्रभावित हो सकते हैं। कांग्रेस ने महाराष्ट्र के बीड जिले सहित कुछ क्षेत्रों में कथित फर्जी हाजिरी, मजदूरों के नाम पर दर्ज काम और मजदूरी भुगतान में अनियमितताओं के आरोप भी उठाए हैं। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड और स्वतंत्र जांच के निष्कर्षों से होना जरूरी है।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने महाराष्ट्र के बीड जिले में योजना के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने मीडिया रिपोर्ट में सामने आई कथित जमीनी जांच का हवाला देते हुए दावा किया कि कुछ स्थानों पर सरकारी रिकॉर्ड में मजदूरों के काम करने की जानकारी दर्ज थी, लेकिन मौके पर मजदूर काम करते हुए नहीं मिले। कांग्रेस के अनुसार, कुछ ग्रामीणों के नाम पर काम दर्ज होने के बावजूद उन्होंने लंबे समय से काम नहीं किया था। पार्टी ने आशंका जताई कि ऐसी अनियमितताओं के कारण वास्तविक जरूरतमंद श्रमिकों को उनके अधिकारों से वंचित होना पड़ सकता है। इन दावों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए संबंधित रोजगार रिकॉर्ड, उपस्थिति विवरण, भुगतान की जानकारी और प्रशासनिक जांच के नतीजे महत्वपूर्ण होंगे।

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों में भी कथित फर्जी हाजिरी और डिजिटल रिकॉर्ड में गड़बड़ी की शिकायतों का मुद्दा उठाया है। पार्टी नेताओं का दावा है कि कुछ मामलों में वास्तविक श्रमिकों की जगह गलत या दोहराई गई तस्वीरों का इस्तेमाल कर उपस्थिति दर्ज किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने नौ जिलों में कथित अनियमितताओं की जांच की मांग की है। पार्टी का कहना है कि यदि सरकारी रिकॉर्ड में गलत जानकारी दर्ज की जा रही है, तो इससे सार्वजनिक धन के इस्तेमाल और मजदूरों के अधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। हालांकि, इन आरोपों को प्रमाणित तथ्य मानने से पहले संबंधित विभागों की जांच और आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना आवश्यक है।

वीबी-जी राम जी का पूरा नाम ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ है। यह ग्रामीण रोजगार से जुड़ा नया कानूनी ढांचा है, जिसे मनरेगा की जगह लागू किया गया है। सरकार के अनुसार, इस कानून का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को मजदूरी आधारित रोजगार उपलब्ध कराने के साथ गांवों में टिकाऊ परिसंपत्तियों का निर्माण करना, आजीविका के अवसरों को मजबूत करना और ग्रामीण बुनियादी ढांचे का विकास करना है। नए कानून के तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार को एक वित्तीय वर्ष में 125 दिनों के अकुशल मजदूरी वाले रोजगार की वैधानिक गारंटी दी गई है, जबकि मनरेगा के तहत यह सीमा 100 दिनों की थी। नई व्यवस्था में जल संरक्षण, ग्रामीण बुनियादी ढांचे और आजीविका से जुड़ी परिसंपत्तियों के निर्माण पर जोर दिया गया है।

कांग्रेस की आपत्ति मुख्य रूप से नई व्यवस्था के प्रशासनिक ढांचे, वित्तीय जिम्मेदारियों और रोजगार उपलब्ध कराने की प्रक्रिया को लेकर है। पार्टी का कहना है कि मनरेगा ग्रामीण गरीबों के लिए केवल रोजगार उपलब्ध कराने वाली योजना नहीं थी, बल्कि बेरोजगारी, सूखे और आर्थिक संकट के दौरान आजीविका का महत्वपूर्ण सहारा भी थी। कांग्रेस नेताओं ने आशंका जताई है कि नई व्यवस्था में राज्यों की वित्तीय जिम्मेदारी बढ़ने और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में बदलाव से ग्रामीण मजदूरों को परेशानी हो सकती है। पार्टी ग्राम पंचायतों की भूमिका और स्थानीय स्तर पर रोजगार की मांग के अधिकार को लेकर भी सवाल उठा रही है। कांग्रेस के मुताबिक, रोजगार पाने की प्रक्रिया में तकनीकी या प्रशासनिक बाधाएं बढ़ने से गरीब परिवारों के लिए काम हासिल करना मुश्किल हो सकता है।

दूसरी ओर, केंद्र सरकार नई व्यवस्था को ग्रामीण रोजगार और विकास को अधिक प्रभावी बनाने वाला कदम बताती है। सरकार का कहना है कि रोजगार की वैधानिक गारंटी 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन करने से ग्रामीण परिवारों को अतिरिक्त रोजगार का अवसर मिलेगा। आधिकारिक विवरण के अनुसार, डिजिटल निगरानी, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और इलेक्ट्रॉनिक भुगतान जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ाने का प्रयास किया गया है। सरकार ने रोजगार के रिकॉर्ड की निगरानी, भुगतान प्रक्रिया को समयबद्ध बनाने और शिकायतों के निपटारे पर भी जोर दिया है। अधिनियम में निर्धारित शर्तों के अनुसार रोजगार नहीं मिलने पर बेरोजगारी भत्ते और मजदूरी भुगतान में देरी होने पर मुआवजे से संबंधित प्रावधान भी शामिल हैं।

नई व्यवस्था के वित्तपोषण को लेकर भी केंद्र और राज्यों के बीच जिम्मेदारियों का सवाल महत्वपूर्ण है। उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार, पूर्वोत्तर और निर्दिष्ट हिमालयी राज्यों तथा संबंधित केंद्रशासित प्रदेशों के लिए केंद्र और राज्य के बीच वित्तपोषण का अनुपात 90:10 रखा गया है, जबकि अन्य राज्यों और संबंधित केंद्रशासित प्रदेशों के लिए यह अनुपात 60:40 है। कांग्रेस का तर्क है कि राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ने से रोजगार उपलब्ध कराने की क्षमता प्रभावित हो सकती है, खासकर उन राज्यों में जहां संसाधन सीमित हैं। वहीं, केंद्र सरकार इन प्रावधानों को ग्रामीण विकास और रोजगार विस्तार की दिशा में उठाया गया कदम बताती है। इस व्यवस्था का वास्तविक प्रभाव जानने के लिए राज्यों के बजट, रोजगार की मांग, स्वीकृत कार्यों और मजदूरी भुगतान के आंकड़ों का अध्ययन जरूरी होगा।

इस राजनीतिक बहस के बीच तमिलनाडु सरकार की ओर से पात्र ग्रामीण परिवारों को अतिरिक्त रोजगार देने की पहल भी चर्चा में रही है। संबंधित रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार ने नई व्यवस्था के तहत निर्धारित 125 दिनों का रोजगार पूरा करने वाले पात्र परिवारों को राज्य के संसाधनों से 25 अतिरिक्त दिनों का मजदूरी रोजगार उपलब्ध कराने की बात कही है। इससे संबंधित परिवारों के लिए कुल रोजगार 150 दिनों तक पहुंच सकता है। रिपोर्ट में महिला मुखिया वाले परिवारों, अकेली रहने वाली महिलाओं, दिव्यांग सदस्यों वाले परिवारों और अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के पात्र लाभार्थियों को प्राथमिकता देने की जानकारी भी दी गई है। इस तरह की पहल से यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारें केंद्रीय रोजगार व्यवस्था के साथ अपने स्तर पर अतिरिक्त सहायता देने के विकल्प तलाश सकती हैं।

वीबी-जी राम जी को लेकर जारी विवाद के बीच ग्रामीण मजदूरों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि उन्हें वास्तविक रूप से कितना काम मिल रहा है और उनकी मजदूरी का भुगतान समय पर हो रहा है या नहीं। योजना की सफलता का आकलन केवल रोजगार के दिनों की कानूनी गारंटी के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए वास्तविक रोजगार उपलब्धता, भुगतान की समयसीमा, शिकायतों के निपटारे और गांवों में तैयार की गई परिसंपत्तियों की गुणवत्ता को भी देखना होगा। यदि किसी क्षेत्र में फर्जी हाजिरी, गलत तस्वीरों या भुगतान संबंधी अनियमितताओं की शिकायतें सामने आती हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए। साथ ही, डिजिटल प्रणाली के कारण पात्र मजदूरों को काम या भुगतान पाने में कठिनाई होने पर प्रशासन को समय पर समाधान उपलब्ध कराना चाहिए।

कुल मिलाकर, मनरेगा की जगह वीबी-जी राम जी व्यवस्था लागू होने के बाद ग्रामीण रोजगार नीति को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच बहस तेज हो गई है। कांग्रेस नई व्यवस्था को मजदूरों के अधिकारों के लिए चुनौती बता रही है और कथित अनियमितताओं की जांच की मांग कर रही है। वहीं, केंद्र सरकार रोजगार की गारंटी बढ़ाने, डिजिटल निगरानी मजबूत करने और ग्रामीण विकास को गति देने को नई व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएं बता रही है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई व्यवस्था के तहत ग्रामीण परिवारों को कितना वास्तविक रोजगार मिलता है, मजदूरी भुगतान कितना समयबद्ध रहता है और कथित अनियमितताओं पर प्रशासन क्या कार्रवाई करता है। इन्हीं आधारों पर ग्रामीण रोजगार व्यवस्था की प्रभावशीलता और मजदूरों की आजीविका सुरक्षा का आकलन किया जा सकेगा।

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