अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भारत को भरोसा दिलाया है कि पाकिस्तान समेत किसी भी अन्य देश के साथ अमेरिका के संबंध भारत-अमेरिका साझेदारी की कीमत पर आगे नहीं बढ़ाए जाएंगे। भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक सहयोग को लेकर यह बयान ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के साथ बढ़ते संपर्कों को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। रूबियो ने बदलती वैश्विक परिस्थितियों का हवाला देते हुए कहा कि आज की दुनिया को 1970 के दशक के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। उस समय शीत युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समीकरण अलग थे, जबकि वर्तमान दौर में देशों के बीच संबंध आर्थिक, रणनीतिक, तकनीकी और सुरक्षा संबंधी जरूरतों से प्रभावित होते हैं।
अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों पर चर्चा करते हुए संकेत दिया कि वॉशिंगटन का इस्लामाबाद के साथ संवाद बनाए रखना भारत के साथ उसके संबंधों को कमजोर करने की कोशिश नहीं है। अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान के साथ अपने संपर्कों को अपनी रणनीतिक जरूरतों से जोड़कर देखता है। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति, क्षेत्रीय सुरक्षा में उसकी भूमिका और उसकी परमाणु क्षमताएं ऐसे कारक हैं, जिनके कारण अमेरिका उसके साथ बातचीत जारी रखना चाहता है। हालांकि, भारत की प्रमुख चिंता यह है कि पाकिस्तान के साथ अमेरिकी नजदीकी का इस्तेमाल भारत के सुरक्षा हितों को प्रभावित करने के लिए नहीं होना चाहिए।
भारत और अमेरिका के संबंध पिछले कुछ वर्षों में रक्षा, तकनीक, व्यापार और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में मजबूत हुए हैं। ऐसे में पाकिस्तान के साथ अमेरिकी संपर्कों को लेकर उठने वाले सवाल दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी के लिए महत्वपूर्ण हैं। रूबियो का बयान इन चिंताओं को दूर करने और भारत को यह भरोसा दिलाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है कि अमेरिका अपने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संबंधों को अलग-अलग रणनीतिक जरूरतों के आधार पर आगे बढ़ाना चाहता है। हालांकि, इस आश्वासन का वास्तविक प्रभाव आने वाले समय में दोनों देशों के बीच सहयोग और सुरक्षा संबंधी फैसलों से स्पष्ट होगा।
आतंकवाद के मुद्दे पर भी रूबियो ने अमेरिकी रुख को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका दुनिया में कहीं भी आतंकवाद का समर्थन करने वालों के खिलाफ है। भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद, आतंकवादी संगठनों को मिलने वाले समर्थन और उनके वित्तीय नेटवर्क के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई की मांग करता रहा है। भारत के लिए अमेरिका का आतंकवाद विरोधी रुख महत्वपूर्ण है, लेकिन नई दिल्ली की अपेक्षा यह भी है कि आतंकवादी गतिविधियों और उन्हें समर्थन देने वाले नेटवर्क के खिलाफ ठोस कदम उठाए जाएं। इसलिए दोनों देशों के बीच आतंकवाद विरोधी सहयोग और खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान को आने वाले समय में अहम माना जा रहा है।
चीन के संदर्भ में भी भारत-अमेरिका संबंधों का रणनीतिक महत्व बना हुआ है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन का बढ़ता प्रभाव, समुद्री सुरक्षा, रक्षा तकनीक और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं से जुड़े मुद्दे दोनों देशों की प्राथमिकताओं में शामिल हैं। अमेरिका चीन के साथ कूटनीतिक संवाद बनाए रखने के साथ-साथ भारत के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को भी मजबूत करना चाहता है। रूबियो का यह संदेश कि किसी तीसरे देश के साथ अमेरिका के संबंध भारत के हितों की कीमत पर नहीं होने चाहिए, इसी व्यापक कूटनीतिक दृष्टिकोण से जुड़ा है। हालांकि, पाकिस्तान पर केंद्रित इस बयान को चीन के प्रति अमेरिकी नीति में किसी औपचारिक बदलाव की घोषणा मानना उचित नहीं होगा।
रूबियो ने भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते की संभावनाओं पर भी सकारात्मक रुख व्यक्त किया। दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को व्यापक बनाने के लिए बाजार तक पहुंच, आयात शुल्क और व्यापार की शर्तों जैसे विषयों पर बातचीत महत्वपूर्ण है। किसी भी व्यापार समझौते के अंतिम स्वरूप पर पहुंचने के लिए दोनों पक्षों को अपने आर्थिक हितों के बीच संतुलन बनाना होगा। यदि बातचीत सफल रहती है, तो इससे भारतीय निर्यातकों, अमेरिकी निवेशकों और दोनों देशों की कंपनियों को नए अवसर मिल सकते हैं। रक्षा उत्पादन, ऊर्जा, महत्वपूर्ण तकनीक और निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ने से भी आर्थिक साझेदारी को मजबूती मिल सकती है।
रूबियो ने 1970 के दशक की परिस्थितियों और आज की दुनिया के बीच अंतर बताते हुए यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों को पुराने शीत युद्ध के समीकरणों से समझना पर्याप्त नहीं है। उस दौर में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच प्रतिस्पर्धा का वैश्विक राजनीति पर गहरा प्रभाव था। दक्षिण एशिया में भी अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों तथा भारत की विदेश नीति को लेकर अलग-अलग परिस्थितियां थीं। आज वैश्विक राजनीति में आर्थिक परस्पर निर्भरता, तकनीकी प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। भारत भी अपनी विदेश नीति के तहत अमेरिका, रूस, यूरोप और अन्य प्रमुख देशों के साथ राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंध बनाए रखता है।
भारत के लिए रूबियो का बयान इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे वॉशिंगटन की ओर से रणनीतिक साझेदारी को लेकर सकारात्मक संदेश मिलता है। फिर भी, भारत की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना होगी कि अमेरिका के साथ संबंधों में रक्षा सहयोग, आतंकवाद विरोधी कार्रवाई, व्यापार, ऊर्जा और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर ठोस प्रगति हो। केवल कूटनीतिक आश्वासन के आधार पर किसी साझेदारी की मजबूती का आकलन नहीं किया जा सकता; इसके लिए नीतिगत फैसलों और उनके परिणामों को देखना भी जरूरी है।
कुल मिलाकर, मार्को रूबियो ने बदलती वैश्विक परिस्थितियों का हवाला देते हुए भारत को भरोसा दिलाने की कोशिश की है कि पाकिस्तान समेत दूसरे देशों के साथ अमेरिकी संबंध भारत-अमेरिका साझेदारी के विरुद्ध नहीं होंगे। इस बयान से दोनों देशों के बीच रणनीतिक विश्वास बनाए रखने का संकेत मिलता है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह भरोसा व्यापार समझौते, सुरक्षा सहयोग और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में साझा रणनीतिक उद्देश्यों की दिशा में किस प्रकार की ठोस प्रगति में बदलता है।




