भारत अपनी सैन्य ताकत को मजबूत करने और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए स्वदेशी हथियार प्रणालियों के विकास पर लगातार जोर दे रहा है। इसी दिशा में नागास्त्र-2 लोइटरिंग म्यूनिशन यानी ऐसे मानवरहित हथियार की चर्चा हो रही है, जो लक्ष्य वाले क्षेत्र में कुछ समय तक उड़ान भर सकता है और उपयुक्त लक्ष्य मिलने पर हमला कर सकता है। इसे विशेष रूप से टैंकों और अन्य बख्तरबंद सैन्य वाहनों जैसे लक्ष्यों के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए विकसित किया गया है। इसकी तकनीक भारतीय सेना को दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों से निपटने के लिए एक अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध करा सकती है।
नागास्त्र-2 की चर्चा के बीच इसकी मारक दूरी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ दावों में इसकी रेंज 50 किलोमीटर तक बताई जा रही है, लेकिन उपलब्ध तकनीकी जानकारी से इस दूरी की स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती है। इसलिए इसकी मारक दूरी को आधिकारिक तौर पर प्रमाणित क्षमता मानने से पहले निर्माता या रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी विस्तृत तकनीकी जानकारी देखना जरूरी है। वहीं, इसकी उड़ान अवधि, एंटी-टैंक वारहेड और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग से निपटने की क्षमता जैसी विशेषताएं इसे आधुनिक युद्ध के लिहाज से महत्वपूर्ण बनाती हैं।
नागास्त्र-2 की सबसे बड़ी ताकत है एंटी-टैंक वारहेड
नागास्त्र-2 की प्रमुख विशेषता इसका विशेष एंटी-टैंक वारहेड है, जिसे टैंकों और अन्य बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए तैयार किया गया है। सामान्य निगरानी ड्रोन जहां मुख्य रूप से तस्वीरें लेने और दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने का काम करते हैं, वहीं लोइटरिंग म्यूनिशन निगरानी के साथ हमला करने की क्षमता भी रखते हैं। इससे सेना को उन परिस्थितियों में मदद मिल सकती है, जहां दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों को सीधे निशाना बनाना चुनौतीपूर्ण हो। हालांकि, इसकी वास्तविक प्रभावशीलता लक्ष्य की स्थिति, सुरक्षा व्यवस्था और युद्ध के मैदान में मौजूद परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
लगभग 90 मिनट तक उड़ान भरने की क्षमता
नागास्त्र-2 की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसकी बताई गई उड़ान अवधि है। उपलब्ध तकनीकी विवरणों के अनुसार, यह लगभग 90 मिनट तक हवा में रह सकता है। लंबे समय तक उड़ान भरने की क्षमता से किसी अभियान के दौरान निगरानी करने और लक्ष्य वाले क्षेत्र में बने रहने में मदद मिल सकती है। इससे सेना को परिस्थितियों के अनुसार अपने मिशन की योजना बनाने में अतिरिक्त सुविधा मिल सकती है। हालांकि, वास्तविक उड़ान अवधि मौसम, पेलोड और परिचालन परिस्थितियों के आधार पर अलग हो सकती है।
हल्का डिजाइन और आसानी से तैनाती
नागास्त्र-2 को पोर्टेबल सैन्य प्रणाली के रूप में विकसित किए जाने की जानकारी सामने आई है। उपलब्ध निर्माता-संबंधित तकनीकी विवरणों में इसके पूरे सिस्टम का वजन 25 किलोग्राम से कम बताया गया है और इसे दो लोगों की टीम द्वारा संचालित किए जाने का उल्लेख है। हल्के डिजाइन का उद्देश्य ऐसे उपकरणों को उन सैन्य इकाइयों तक पहुंचाना आसान बनाना है, जिन्हें अलग-अलग क्षेत्रों में तेजी से तैनात किया जाता है। पहाड़ी, सीमावर्ती और दुर्गम इलाकों में पोर्टेबल ड्रोन प्रणालियां सैनिकों की परिचालन क्षमता बढ़ाने में सहायक हो सकती हैं।
आधुनिक युद्ध में दुश्मन की संचार व्यवस्था और ड्रोन नियंत्रण प्रणाली को बाधित करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग का इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसी परिस्थितियों में संचार प्रणाली की विश्वसनीयता किसी भी मानवरहित सैन्य प्लेटफॉर्म के लिए महत्वपूर्ण होती है। नागास्त्र-2 की विशेषताओं में जैमिंग के प्रभाव को कम करने के लिए तैयार की गई संचार व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। इस तरह की तकनीक का उद्देश्य चुनौतीपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक वातावरण में सिस्टम की कार्यक्षमता बनाए रखने में मदद करना है। हालांकि, जैमिंग-रोधी तकनीक होने का अर्थ यह नहीं है कि कोई भी ड्रोन हर प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक हमले से पूरी तरह सुरक्षित रहेगा।
650 मिमी तक कवच भेदने की क्षमता का दावा
नागास्त्र-2 को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट में इसके 650 मिलीमीटर तक कवच भेदने की क्षमता का दावा किया गया है। यह विशेषता सही तकनीकी परिस्थितियों में बख्तरबंद लक्ष्यों के खिलाफ इसकी उपयोगिता को दर्शा सकती है। हालांकि, कवच भेदने की क्षमता को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि अलग-अलग प्रकार के टैंकों में कवच की बनावट, मोटाई और सुरक्षा तकनीक अलग होती है। किसी हथियार की वास्तविक क्षमता का आकलन केवल एक आंकड़े के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए परीक्षण की परिस्थितियों, इस्तेमाल किए गए वारहेड और आधिकारिक तकनीकी परिणामों की जानकारी भी आवश्यक होती है।
नागास्त्र-1 और नागास्त्र-2 में क्या अंतर है?
नागास्त्र-1 और नागास्त्र-2 एक ही व्यापक लोइटरिंग म्यूनिशन श्रेणी से जुड़े हैं, लेकिन उनकी भूमिका और तकनीकी विशेषताओं में अंतर है। नागास्त्र-1 को सामरिक लक्ष्यों के खिलाफ सटीक हमले के लिए विकसित किया गया है। इसके बारे में कम आवाज में उड़ान भरने, निगरानी करने और कुछ परिस्थितियों में मिशन रद्द करने जैसी सुविधाओं का उल्लेख किया गया है। दूसरी ओर, नागास्त्र-2 की चर्चा विशेष रूप से टैंकों और बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ इस्तेमाल किए जाने वाले एंटी-टैंक वारहेड के कारण हो रही है। दोनों प्रणालियों की उड़ान अवधि, मारक क्षमता और अन्य विशेषताओं की तुलना करते समय संबंधित संस्करण के आधिकारिक आंकड़ों को ही आधार बनाना चाहिए।
स्वदेशी रक्षा उद्योग के लिए क्यों महत्वपूर्ण है नागास्त्र-2?
नागास्त्र सीरीज का विकास नागपुर स्थित सोलर समूह की रक्षा इकाई से जुड़ा है। इसका विकास भारत में निजी क्षेत्र की रक्षा विनिर्माण क्षमता और स्वदेशी सैन्य तकनीक को बढ़ावा देने के प्रयासों का हिस्सा है। देश में ऐसे हथियारों का विकास होने से घरेलू रक्षा उद्योग को प्रोत्साहन मिल सकता है और विदेशी प्रणालियों पर निर्भरता कम करने के प्रयासों को बल मिल सकता है। इसके साथ ही, भारतीय परिस्थितियों और सेना की आवश्यकताओं के अनुरूप तकनीक विकसित करने की संभावनाएं भी बढ़ती हैं।
नागास्त्र-1 परिवार की प्रणालियों को लेकर भी भारतीय सेना की खरीद और आपूर्ति से संबंधित खबरें सामने आती रही हैं। नागास्त्र-1आर की आपूर्ति संबंधी रिपोर्टों को नागास्त्र-2 से अलग समझना जरूरी है, क्योंकि दोनों संस्करणों की तकनीकी विशेषताएं और परिचालन भूमिकाएं समान होना आवश्यक नहीं है। किसी विशेष संस्करण के सेना में शामिल होने, उसकी संख्या और परिचालन स्थिति की पुष्टि संबंधित आधिकारिक घोषणा से की जानी चाहिए।
निष्कर्ष
नागास्त्र-2 भारत की स्वदेशी रक्षा तकनीक के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रणाली के रूप में उभर रहा है। इसकी बताई गई लगभग 90 मिनट की उड़ान अवधि, पोर्टेबल डिजाइन, जैमिंग-रोधी संचार व्यवस्था और एंटी-टैंक वारहेड इसे सैन्य उपयोग के लिहाज से उल्लेखनीय बनाते हैं। इसकी कवच भेदने की क्षमता को लेकर भी रिपोर्टें सामने आई हैं, लेकिन इन दावों का आकलन आधिकारिक तकनीकी विवरणों और परीक्षण परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए।
जहां तक 50 किलोमीटर दूर से टैंकों को निशाना बनाने के दावे का सवाल है, उपलब्ध जानकारी से इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती। इसलिए इसे प्रमाणित क्षमता के रूप में प्रकाशित करने के बजाय एक अपुष्ट दावे के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित होगा। नागास्त्र-2 की वास्तविक मारक दूरी, सेना में इसकी तैनाती और परिचालन प्रदर्शन के बारे में अंतिम निष्कर्ष आधिकारिक जानकारी उपलब्ध होने के बाद ही निकाला जा सकता है।




