आईडीबीआई बैंक की बिक्री पर सियासी घमासान, राहुल गांधी ने मोदी सरकार को घेरा

SHARE:

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आईडीबीआई बैंक के प्रस्तावित निजीकरण को लेकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने बैंक के कर्मचारियों के समर्थन में एक पत्र जारी करते हुए सरकार के फैसले पर सवाल उठाए। राहुल गांधी का कहना है कि जिस बैंक को सार्वजनिक धन से स्थापित किया गया और जिसके कर्मचारियों ने अपनी मेहनत से उसे घाटे से निकालकर मुनाफे तक पहुंचाया, उसे निजी हाथों में सौंपने की क्या जरूरत है? उन्होंने कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा, जमाकर्ताओं के हितों और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण से जुड़े मुद्दों को भी उठाया।

राहुल गांधी ने 30 अक्टूबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया साझा करते हुए कांग्रेस और भाजपा सरकारों की बैंकिंग नीतियों की तुलना की। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में आईडीबीआई की स्थापना देश के औद्योगिक विकास को मजबूत करने के उद्देश्य से की गई थी, जबकि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में बैंक को बेचने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। उन्होंने अपने बयान में कहा, “कांग्रेस के समय बैंक बनते थे, मोदी के समय बिकते हैं।” राहुल गांधी ने यह भी स्पष्ट किया कि वह आईडीबीआई बैंक के कर्मचारियों के संघर्ष में उनके साथ खड़े हैं।

राहुल गांधी ने अपने पत्र में बताया कि मार्च 2025 में आईडीबीआई बैंक के कर्मचारियों का एक प्रतिनिधिमंडल संसद भवन में उनसे मिला था। कर्मचारियों ने अपनी चिंताएं साझा करते हुए सवाल किया था कि जिस बैंक को उन्होंने अपनी मेहनत से घाटे से निकालकर मुनाफे में पहुंचाया, सरकार उसे बेचने की तैयारी क्यों कर रही है। कर्मचारियों की मांगों और चिंताओं को गंभीरता से लेते हुए राहुल गांधी ने इस मुद्दे को लोकसभा में भी उठाया था। उन्होंने सरकार से पूछा था कि एक लाभ कमाने वाले सार्वजनिक बैंक का निजीकरण करने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है और इस प्रक्रिया के बाद बैंक के कर्मचारियों तथा खाताधारकों के हितों की सुरक्षा किस तरह सुनिश्चित की जाएगी।

आईडीबीआई बैंक के विनिवेश को लेकर केंद्र सरकार ने 14 अक्टूबर 2026 को महत्वपूर्ण फैसला किया था। आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) ने कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स से जुड़ी कंपनी 10955230 Canada Inc. को बैंक की रणनीतिक खरीदार के रूप में मंजूरी दी। इस सौदे का कुल मूल्य 52,878.08 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया है। प्रस्ताव के तहत केंद्र सरकार अपनी 30.48 प्रतिशत और भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) अपनी 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचेगा। इस तरह बैंक की कुल 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी निजी खरीदार को हस्तांतरित होगी। सौदा पूरा होने के बाद केंद्र सरकार के पास 15 प्रतिशत और एलआईसी के पास 19 प्रतिशत हिस्सेदारी बचने का प्रस्ताव है।

राहुल गांधी ने बैंक की वित्तीय स्थिति में आए सुधार का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कुछ साल पहले आईडीबीआई बैंक वित्तीय संकट और घाटे से जूझ रहा था, लेकिन कर्मचारियों की मेहनत और बेहतर प्रबंधन के कारण बैंक ने अपनी स्थिति में सुधार किया। वित्त वर्ष 2025-26 में बैंक ने 9,513 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह आंकड़ा 7,515 करोड़ रुपये था। इस तरह बैंक के मुनाफे में लगभग 27 प्रतिशत की वृद्धि हुई। राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि जब कोई सार्वजनिक बैंक मुनाफे में लौट आया है, तो उसे निजी हाथों में सौंपने की जरूरत क्यों है।

कांग्रेस नेता ने अपने विरोध के समर्थन में वर्ष 2003 में संसद में दिए गए एक आश्वासन का भी हवाला दिया। उनके मुताबिक, उस समय सरकार ने संसद को भरोसा दिलाया था कि आईडीबीआई में सरकार की हिस्सेदारी हमेशा कम से कम 51 प्रतिशत रखी जाएगी। राहुल गांधी का कहना है कि संसद में दिया गया आश्वासन केवल औपचारिक बयान नहीं, बल्कि जनता के प्रति सरकार की जवाबदेही से जुड़ा विषय है। प्रस्तावित विनिवेश के बाद केंद्र सरकार की हिस्सेदारी घटकर 15 प्रतिशत रह जाएगी। इसी आधार पर उन्होंने सार्वजनिक स्वामित्व और बैंक के प्रति सरकार की जिम्मेदारी को लेकर सवाल उठाए हैं।

आईडीबीआई बैंक के निजीकरण को राहुल गांधी ने सामाजिक न्याय के नजरिये से भी महत्वपूर्ण बताया है। उन्होंने आशंका जताई कि बैंक के निजी स्वामित्व में जाने के बाद अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को मिलने वाले आरक्षण के अवसर प्रभावित हो सकते हैं। उनका तर्क है कि सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों में सरकारी आरक्षण नीतियां लागू होती हैं, जबकि निजी क्षेत्र में सरकारी नौकरियों जैसी आरक्षण व्यवस्था सामान्य रूप से लागू नहीं होती। इसके अलावा उन्होंने मौजूदा कर्मचारियों की सेवा शर्तों, पेंशन, नौकरी की सुरक्षा और अन्य सुविधाओं को लेकर भी चिंता जताई है। हालांकि, इन मुद्दों पर वास्तविक प्रभाव सौदे की शर्तों और लागू कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करेगा।

बैंक कर्मचारी संगठन भी प्रस्तावित विनिवेश का विरोध कर रहे हैं। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि निजीकरण से उनकी नौकरी की सुरक्षा, पेंशन और भविष्य की सेवा शर्तों पर असर पड़ सकता है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, यूनाइटेड फोरम ऑफ आईडीबीआई ऑफिसर्स एंड एम्प्लॉइज ने 2 और 3 नवंबर को देशव्यापी भूख हड़ताल की योजना बनाई है। संगठन की प्रमुख मांगों में बैंक में सरकार की हिस्सेदारी कम से कम 51 प्रतिशत बनाए रखना, कर्मचारियों की सेवा शर्तों को कानूनी संरक्षण देना और पेंशन तथा अन्य कर्मचारी कल्याण सुविधाओं की सुरक्षा शामिल है।

दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने आईडीबीआई बैंक के विनिवेश को रणनीतिक पुनर्गठन का हिस्सा बताया है। वित्त मंत्रालय के अनुसार, बैंक पहले गंभीर वित्तीय संकट से गुजर रहा था और उसे केंद्र सरकार तथा एलआईसी की ओर से कई बार पूंजी उपलब्ध करानी पड़ी थी। भारतीय रिजर्व बैंक ने 5 मई 2017 को बैंक की खराब वित्तीय स्थिति और गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों के कारण उसे प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (पीसीए) फ्रेमवर्क के तहत रखा था। बाद में बैंक की वित्तीय स्थिति में सुधार होने पर 10 मार्च 2021 को आरबीआई ने प्रतिबंध हटा दिए थे।

सरकार के मुताबिक, बैंक की हिस्सेदारी बेचने के लिए स्वतंत्र मूल्यांकन एजेंसियों की मदद ली गई। मूल्यांकन में प्रति शेयर 75.99 रुपये का औसत उचित मूल्य निर्धारित किया गया, जबकि सफल बोली 81 रुपये प्रति शेयर की रही। सरकार का कहना है कि यह बोली निर्धारित उचित मूल्य से अधिक है और रणनीतिक निवेशक के आने से बैंक को नई पूंजी, बेहतर प्रबंधन तथा विकास के नए अवसर मिल सकते हैं। सरकार इस सौदे को बैंकिंग क्षेत्र में निवेश बढ़ाने और संस्थागत पुनर्गठन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मान रही है।

गौरतलब है कि आईडीबीआई बैंक की स्थापना 1964 में देश के औद्योगिक विकास को वित्तीय सहायता देने के उद्देश्य से एक विकास वित्तीय संस्थान के रूप में हुई थी। बाद में इसे वाणिज्यिक बैंक में परिवर्तित कर दिया गया। वर्ष 2019 में एलआईसी की हिस्सेदारी बढ़ने के बाद बैंक का नियंत्रण एलआईसी के पास चला गया था। अब प्रस्तावित विनिवेश के जरिए बैंक का प्रबंधन निजी रणनीतिक निवेशक को सौंपने की तैयारी है। हालांकि, इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए संबंधित नियामकीय मंजूरियां और अन्य औपचारिकताएं आवश्यक होंगी।

फिलहाल आईडीबीआई बैंक की बिक्री को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस तेज हो गई है। एक तरफ सरकार इसे रणनीतिक निवेश और बैंकिंग क्षेत्र के पुनर्गठन के रूप में पेश कर रही है, वहीं राहुल गांधी और बैंक कर्मचारी संगठन इसे सार्वजनिक संपत्ति, रोजगार सुरक्षा और सामाजिक न्याय से जुड़ा मुद्दा बता रहे हैं। आने वाले दिनों में कर्मचारी संगठनों का विरोध और सौदे से जुड़ी नियामकीय प्रक्रिया इस पूरे मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

Leave a Comment