मोदी का ‘ना’ और ट्रंप की नाराज़गी: क्या इसलिए बढ़े थे टैरिफ?

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हाल ही में चर्चा में आया अमेरिका का वह रुख, जिसमें भारत पर टैरिफ बढ़ाने की धमकी दी गई थी। लेकिन क्या यह सिर्फ व्यापार की लड़ाई है? या फिर इसके पीछे छिपे हैं राजनीतिक संदेश, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के संकेत — और शायद एक नोबेल की चाह भी? आइए जानते हैं इस पूरे घटनाक्रम की तह तक।

 नोबेल के लिए पैरवी — क्या वाकई में ट्रंप ने कोशिश की?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि उन्होंने शांति नोबेल के लिए परोक्ष रूप से पैरवी की थी। भारत के साथ दोस्ती, उत्तर कोरिया से बातचीत, और अफगानिस्तान में सैनिकों की वापसी जैसे कदम — इन सभी को उन्होंने अपने “शांतिदूत” अवतार के प्रमाण के तौर पर पेश किया।

हालांकि, आधिकारिक रूप से नोबेल समिति ने कभी इन दावों की पुष्टि नहीं की, लेकिन जानकारों का मानना है कि ट्रंप की नीतियाँ कई बार ‘छवि निर्माण’ के लिए थीं — जिसमें भारत के साथ संबंध भी एक मोहरा बने।

 न्योता नकारना — मोदी सरकार का संकेत?

ट्रंप प्रशासन के दौरान भारत को कई बार अमेरिका की ओर से उच्च-स्तरीय बैठकों और समझौतों का न्योता मिला, लेकिन मोदी सरकार ने कई बार इन प्रस्तावों को ठंडे बस्ते में डाला। खासकर “ट्रंप-मोदी” केमिस्ट्री के बावजूद कुछ व्यापार समझौते अधूरे रह गए। क्या यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का संकेत था? या फिर कूटनीतिक असहमति?

 टैरिफ की तलवार — असल वजह क्या है?

2018-2020 के दौरान ट्रंप प्रशासन ने भारत पर कई उत्पादों पर आयात शुल्क (टैरिफ) लगाने की धमकी दी। अमेरिकी तर्क था — “भारत व्यापार में बहुत लाभ कमा रहा है, लेकिन अमेरिकी उत्पादों के लिए बाजार बंद है।”

असल में, भारत की “लोकल फॉर वोकल” नीति, डेटा लोकलाइजेशन के नियम, और अमेरिकी कंपनियों को सीमित पहुंच देना — ये सभी बातें ट्रंप प्रशासन को खटकती थीं। टैरिफ की बात एक “प्रेशर टैक्टिक” भी थी — जिससे भारत को दबाव में लाया जा सके।

भारत और अमेरिका के रिश्ते बहुस्तरीय हैं — रणनीति, रक्षा, व्यापार और राजनीति से जुड़े हुए। ट्रंप के दौर में इन संबंधों को कई बार पॉपुलिज़्म, व्यक्तिगत छवि निर्माण और आक्रामक व्यापार नीति से जोड़ा गया।

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